एक सुध एक पन्ने पर लिखी थी
ऐसे ढेरों पन्ने जोड़ कर
किताब प्यार की लिखी थी ।
पुस्तक प्यार की किसी कोने में दब गई
वक्त की हवा से पन्ने खुल गए
गोया हम आज भी वही अड़े हुए हैं
जहां पहले पृष्ठ पर कभी खड़े थे।
पहला और अंतिम शब्द
एक ही है ‘प्यार’ जो आज तक
रेशमी धागों सा अनसुलझा है।
किताब पर धूल नहीं जमीं
धुंध हमारी आंखों में छाई है
शायद मास पोश का कुहासा हमारे
मस्तिष्क पर पसरा हुआ है।
कभी कोई तुषार कण हिम सा जमा
टपक जाता है कटीली याद बन।
जलते नहीं सुलगते रहे
न धुआ ही उठा न कभी चिंगारी
धीरे धीरे सुलगते हुए राख हो गए
कब बुझ कर सर्द हुए पता नहीं।
ठंडी मुट्ठी भर राख मेरी किताबों की
शेल्फ पर जमी है।
झड़ती है पुनः जमती है।
हमारे चेहरों के नक्शे बदल गये
गली की पहचान अब तक याद है
हां नुक्कड़ का हैंडपंप नहीं है वहां
गली भी हो के पक्की टाइलों से सजी है।
पुरानी किताबें पढ़ने की फुर्सत कहां
नज़र पड़ती है मुख्य खबरों तक
नशा ब्लातकार से आगे कुछ नहीं
प्यार की किताब हमने कब लिखी थी
क्यों और कैसे खबर नहीं।
-बेला विरदी
