सैयद सलमान, मुंबई
अमेरिका की विदेश नीति पर लंबे समय से यह आरोप लगाया जाता रहा है कि वह दोस्ती का हाथ बढ़ाकर भी अंतत: अपना ही स्वार्थ साधता है। भारत उसका बड़ा उदाहरण है। साझेदारी और रणनीतिक सहयोग के ढेरों वादों के बीच वाशिंगटन ने कई बार ऐसे कदम उठाए जिससे भारत की स्थिति कमजोर हुई। पाकिस्तान को सैन्य मदद देना, अफगानिस्तान से जल्दबाजी में वापस लौटना, भारत को अक्सर ‘चीन को रोकने’ के औजार के रूप में प्रस्तुत करना जैसे कई सारे उदाहरण बताते हैं कि दिल्ली-वाशिंगटन के रिश्ते बराबरी के नहीं, बल्कि अमेरिकी हितों की शर्तों पर आधारित हैं। नई दिल्ली जैसी ताकत कभी–कभी इसका जिक्र करती भी है, लेकिन हालात यह दिखाते हैं कि अमेरिका की दोस्ती अवसर की राजनीति है, भरोसे की बिल्कुल नहीं है।
चीन पर बढ़ता भरोसा!
खाड़ी क्षेत्र में यह चालाकी और भी साफ दिख रही है। कतर के साथ हालिया घटनाक्रम इसका ताजा उदाहरण है। इजरायल द्वारा कतर में किए गए ड्रोन हमलों की खबरें आने पर कई अरब विश्लेषक और मीडिया संस्थान खुले तौर पर कह रहे हैं कि इसके पीछे अमेरिकी तकनीकी मदद और सहमति रही होगी। अमेरिका खुद को मध्यस्थ बताता है, लेकिन हमलों के बाद उसकी चुप्पी और ज्यादा गहरी भागीदारी का आभास देती है। जिन विमानों और हथियारों से हमला होता है, वह तकनीक किसकी है, यह सवाल मुस्लिम देशों के सामने बार–बार उठ रहा है। अमेरिकी दावों और जमीनी सच्चाई में यही सबसे बड़ा अंतर है।
अब मुस्लिम देशों का गुस्सा खुलकर सामने आ रहा है। इराक और सीरिया में अमेरिकी ठिकानों पर जनता लगातार प्रदर्शन कर रही है। तुर्की और ईरान खुलकर बयान दे रहे हैं कि वाशिंगटन अब क्षेत्र का ‘विश्वसनीय साथी’ नहीं रहा। खाड़ी की बैठकों में कई देशों ने पहली बार यह चिंता जताई है कि अमेरिका का भरोसा हर मौके पर टूट जाता है। यह बदलाव छोटा नहीं है, क्योंकि दशकों तक यही अमेरिका सुरक्षा गारंटी और तेल बाजारों का असली मालिक बना रहा है।
लेकिन हालात अब बदल रहे हैं। २०२३ में जब सऊदी अरब और ईरान के बीच समझौता हुआ और चीन ने इसमें मध्यस्थता निभाई, तो यह पूरी तस्वीर बदल गई। यही काम कभी अमेरिका करता था। अब वही भूमिका बीजिंग निभा रहा है। और आश्चर्य यह कि अरब नेतृत्व को यह बात पसंद आ रही है। चीन न हथियार थोपता है, न शासन बदलवाने की कोशिश करता है, बल्कि व्यापारी साझेदार की तरह रिश्ता निभाता है। अरब देशों को लगता है कि चीनी मॉडल में स्थिरता है, जबकि अमेरिकी मॉडल में वर्चस्व और दबाव है। यही कारण है कि आज उनका झुकाव चीन की ओर बढ़ रहा है।
साख खोता अमेरिका!
मुस्लिम देशों के नजरिए से भरोसा टूटना स्वाभाविक है। फिलिस्तीन का मुद्दा इस अविश्वास की बुनियाद है। दशकों से अमेरिका शांति की भाषा बोलकर इजरायल को हर मंच पर समर्थन देता आया है। दो–राष्ट्र समाधान की बातें दोहराई तो जाती हैं, लेकिन जमीनी खेल यही है कि अमेरिकी हथियार इजरायली कब्जे को और मजबूत करते हैं। अब यही चेहरा कतर के मामले में भी दिख गया। जब हमले हुए और आम लोग मारे गए तो मुस्लिम समाज को लगा कि उनकी जान और इज्जत की अमेरिकी नजर में कोई अहमियत नहीं है। यह आक्रोश भावनात्मक भी है और राजनीतिक भी।
मौजूदा माहौल में वॉशिंगटन की कथनी और करनी का फर्क मुस्लिम दुनिया से छिपा नहीं है। हर तरफ गुस्सा है, मीडिया की सुर्खियों में अविश्वास है और शासकों की बैठकों में बेचैनी है। जो अमेरिका कभी ताकत और सुरक्षा का प्रतीक माना जाता था, अब वही देशों को डर और शक की वजह लगने लगा है। इसकी कीमत उसे धीरे–धीरे चुकानी पड़ेगी।
अगर खाड़ी देश अमेरिका से दूरी बनाते हैं और चीन, रूस या अपने भीतर नए गठजोड़ तलाशते हैं तो यह उस भू–राजनीति को बदल देगा जिसके सहारे दशकों तक अमेरिका वर्चस्व जताता रहा। ऊर्जा के दाम तय करने, मार्गों की सुरक्षा से लेकर हथियारों की खरीद तक, हर जगह नए परिवर्तन होंगे। मुस्लिम देश अब मजबूरी में चुप रहने को तैयार नहीं दिखते। वे विकल्प तलाश रहे हैं और चाहते हैं कि अब भरोसा वहीं किया जाए जहां ‘छल’ और ‘छलावा’ के बजाय बराबरी और सम्मान मिले।
भारत समेत उन देशों को भी सचेत रहना चाहिए, जिनसे अमेरिका फिलहाल घनिष्ठता दिखा रहा है, क्योंकि अनुभव यही कहता है कि अमेरिकी रिश्ते अवसरवादी हैं, स्थाई नहीं। मुस्लिम देशों ने यह अनुभव शायद कर लिया है। जो नहीं समझ रहे वह भी एक दिन समझ जाएंगे। अब सवाल यह नहीं है कि अमेरिका अपनी खोई साख क्या वापस पाएगा? बड़ा सवाल यह है कि क्या अमेरिका अपनी कूटनीतिक चालों से इसी तरह अशांति पैâलाता रहेगा? और क्या मुस्लिम देश एक-एक कर इसी तरह तबाह और बर्बाद होते रहेंगे?
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक और देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)
