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संपादकीय : स्थानीय निकाय चुनाव, मार्ग खुला है, लेकिन…

मोदी राज में केंद्रीय एजेंसियों के घोड़े अदालत की फटकार खाए बिना आगे नहीं बढ़ते। ईडी से लेकर चुनाव आयोग तक, सभी एजेंसियों के हालात इसी तरह हैं। अब सुप्रीम कोर्ट ने भी स्थानीय निकाय चुनावों को लेकर महाराष्ट्र चुनाव आयोग को फटकार लगाई है। सत्ताधारी दल पिछले तीन वर्षों से इन चुनावों को टालते रहे हैं अब ३१ जनवरी २०२६ तक करा लें, इसके बाद कोई मोहलत नहीं दी जाएगी। राज्य की जनता को इसके लिए न्याय व्यवस्था का आभार ही मानना चाहिए। हुक्मरानों की मनमानी के चलते पिछले तीन-साढ़े तीन वर्षों से मुंबई समेत राज्य की २७ महापालिका, जिला परिषदों और नगरपालिकाओं पर जनता का राज नहीं है। सारा कामकाज सरकार द्वारा नियुक्त प्रशासकों के जरिए चलाया जा रहा है। जब भी इन चुनावों का विषय आता, वे कोई न कोई बहाना बना देते और जब वह खत्म हो जाते, तो नए-नए बहाने बनाकर चुनाव टालते रहते। पिछले महीने, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्वयं इन चुनावों का कार्यक्रम दिए जाने के बावजूद, फडणवीस-शिंदे मंडली की
पूंछ टेढ़ी की टेढ़ी
थी। सरकार का रोना-धोना जारी था कि वॉर्ड प्रभाग रचना का काम चल रहा है, ईवीएम की कमी है, परीक्षाओं के चलते स्कूल उपलब्ध नहीं है जिसके कारण मतदान केंद्र नहीं बनाए जा सकते और वे एक बार फिर समयसीमा बढ़ाने का आग्रह कर रहे थे। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने सत्ताधारियों के इस स्यापे पर फुल स्टॉप लगा दिया है, जो बढ़िया ही हुआ। वॉर्ड गठन का बहाना इन चुनावों को टालने के लिए काम नहीं आएगा। कोर्ट ने आदेश ही दे दिया है कि यह काम ३१ अक्टूबर तक पूरा कर लिया जाए। अब, राज्य के राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने कहा, ‘चुनाव आयोग अदालत द्वारा दी गई समयसीमा के अनुसार इस चुनाव प्रक्रिया को पूरा करेगा।’ ३ सालों तक चुनाव टालने वाले आप किस मुंह से ‘डेड लाइन ‘ की बात कर रहे हैं? मूल रूप से, इन चुनावों को बार-बार टालने का कारण सत्ताधारियों का हार का डर था। इसीलिए वे ‘सही मुहूर्त’ का इंतजार करते हुए चुनावों को टालते रहे। इस दौरान प्रशासकों के जरिए इन संस्थाओं को लूटने का उनका एकतरफा कार्यक्रम भी बिना किसी रोक-टोक के चलता रहा। वसई-विरार नगर आयुक्त अनिल पवार और अहिल्यानगर नगरपालिका के ३००-४०० करोड़ रुपए
‘कागजी’ सड़कों
के मामलों ने इसे साबित कर दिया। हार को लंबा खींचने और सरकारी खजाने की लूट जारी रखने के उद्देश्य से स्थानीय निकाय चुनाव बार-बार टाले गए। हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने खुद सत्ताधारियों की डोर काट दी। इसलिए उन्हें अदालत द्वारा दिए गए समय के भीतर चुनाव कराने ही होंगे। यह अच्छी बात है कि अदालत ने स्थानीय निकाय चुनावों पर लगी ‘सरकारी बेड़ियां’ तोड़ दीं, लेकिन क्या इन संस्थाओं पर सचमुच ‘लोकतंत्र’ स्थापित हो पाएगा? क्या गारंटी है कि विधानसभा की तरह इन चुनावों में भी वोटों में धांधली और मतदाता सूचियों में गड़बड़ी नहीं होगी? क्या ईवीएम की कमी का हवाला देकर मध्य प्रदेश से २५,००० ईवीएम यहां लाने के पीछे इस मंडली की यही साजिश है? क्या वीवीपैट मशीनों के इस्तेमाल न करने का पैâसला इसी वजह से लिया गया है? ऐसे सवाल अनुत्तरित हैं। यह सच है कि सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई समेत राज्य में तीन साल से लंबित २७ महापालिका, नगरपालिकाओं और जिला परिषदों के चुनावों का मार्ग साफ कर दिया है, लेकिन डर इसी बात का है कि सत्तारूढ़ पार्टी उस मार्ग पर भी ‘वोट चोरी’ के कांटे उगाएगी और विधानसभा की तरह गोलमाल करेगी!

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