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संपादकीय : जामनेर की मौसी!

तमाशा महाराष्ट्र की लोककला का एक महत्वपूर्ण अंग है। तमाशा में कलाकारों की टोली होती है। उसमें एक ‘मौसी’ होती है। कई बार इस मौसी की भूमिका कोई नचनिया ही साड़ी पहनकर निभाता है। महाराष्ट्र की सरकार एक भ्रष्ट पैसों का तमाशा है और गिरीश महाजन इसमें फिलहाल मौसी की अजरामर भूमिका निभा रहे हैं। यह मौसी हर मामले में ‘भ्रष्ट’ होने के कारण उसे मंत्री पद की साड़ी-चोली मिलती रहती है। सत्ता की साड़ी-चोली के कारण इस नचनिया में मैं ‘मर्द’ हूं की भावना जाग उठती है और इसी वजह से उसके व्यवहार और बोलने का संतुलन बिगड़ जाता है। शिवसेना के छह बेईमान सांसदों ने मिंधे गुट का रास्ता अपनाया। इस मौसी का मानना है कि शिवसेना कहीं कांग्रेस में विलीन न हो जाए, इस चिंता में उन्होंने मिंधे का रास्ता चुना। मौसी को कांग्रेस से इतनी नफरत है, यह समझ सकते हैं, लेकिन आज उनकी ही भाजपा ने दिल्ली और महाराष्ट्र में भी एक-एक कर सभी कांग्रेसियों को अपने में समा लिया है। उन्हें मान-सम्मान दिया है और भाजपा के मूल कार्यकर्ता कल आए कांग्रेसियों की जूठी थालियां उठा रहे हैं। कोई दरी बिछा रहा है। हिंदुत्व, वीर सावरकर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को गालियां देने वाले नितेश राणे, विखे-पाटील जैसे अनगिनत लोग मौसीबाई की गोद में बैठे हैं। वीर सावरकर को ‘माफीवीर’, संघ को ‘हाफ चड्डी’ वगैरह कहने वाले ये लोग आज भाजपा की अस्मिता के प्रतीक बन गए हैं। जामनेर की मौसीबाई को क्या यह पता नहीं है? भाजपा एक तरह से कांग्रेस बन गई है और मौसी जैसे नचनिया इस कांग्रेसी विचार के वाहक बन गए हैं। इसलिए मौसी का कांग्रेस से नफरत करना ठीक नहीं है। कांग्रेस के ही धुरंधर लोग फडणवीस मंत्रिमंडल में बैठे हैं और सरकार चला रहे हैं। मौसी को इतिहास पता होना चाहिए कि, कांग्रेस पार्टी ने
स्वतंत्रता संग्राम की आग
भड़काई। कांग्रेस के लोग जेल गए। कई लोगों ने शहादत दी। उन्होंने देश के लिए अपनी संपत्ति का त्याग किया। तब जाकर देश को आजादी मिली। इस राष्ट्रीय संघर्ष में मौसी के पूर्वज कहीं भी नहीं थे। उल्टा वे स्वतंत्रता सेनानियों की ‘मुखबिरी’ कर रहे थे। यानी अंग्रेजों को आंदोलन की खबर देकर इनाम ले रहे थे। चापेकर बंधुओं की खबर अंग्रेजों को देने वाले और इन तीन क्रांतिकारियों को फांसी पर चढ़वाने में मदद करने वाले ‘मुखबिर’ मौसी के पूर्वज थे, वे कांग्रेसी नहीं थे। लोकमान्य तिलक कांग्रेस के उग्र नेता थे और चापेकर बंधु तिलकभक्त थे। ऐसी कई क्रांतिकारी घटनाओं से कांग्रेस का इतिहास सजा हुआ है। मौसी के पूर्वजों के बारे में अगर ऐसी कोई जानकारी हो तो बताएं। अगर कांग्रेस स्वतंत्रता संग्राम में नहीं होती तो मौसी और उसके लोग आजीवन अंग्रेजों की गुलामी, जासूसी करते रहते और अंग्रेजों के टुकड़ों पर गुलामी का जीवन जीने में ही वे आनंद मानते। महाराष्ट्र की राजनीति को ‘मौसी’ टाइप लोगों ने कोठा बना दिया है। यहां विचार, भावना, नैतिकता की कोई कीमत नहीं रह गई है। दौलत ही उनका नशा है। इस कोठे पर नाचने वाली मौसियों और अक्काबाई मंडली ने राज्य को बर्बाद कर दिया है। शिवसेना के छह सांसद बेईमान हो गए। वे मशाल चिह्न पर और उद्धव ठाकरे के चेहरे पर चुनकर आए। उनके प्रचार के लिए जामनेर की मौसी का ‘नाच’ कार्यक्रम नहीं रखा गया था। शिवसैनिकों ने मेहनत करके उन्हें जिताया। उद्धव ठाकरे की शिवसेना कांग्रेस की गोद में बैठ जाएगी, इस चिंता से छह सांसद बेईमान हो गए, मौसी का यह कहना मूर्खतापूर्ण है। दरअसल इन सबने महाविकास आघाड़ी के उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा था। उस आघाड़ी में कांग्रेस एक महत्वपूर्ण घटक है। मंच पर
प्रचार में
कांग्रेस थी। शिर्डी में तो कांग्रेस नेता बालासाहेब थोरात ने ‘उंदीर’ चौरे की जीत के लिए बड़ी मेहनत की। हर जगह इन लोगों ने कांग्रेस की मदद ली। फिर अब अचानक कांग्रेस की चिंता के कीड़े उनके शरीर में क्यों कुलबुलाने लगे और वे कीड़े जामनेर की मौसी को गुदगुदी क्यों कर रहे हैं? पुलिस बंदोबस्त में मौसी बिना मूंछों के भी मूंछों पर ताव देती फिरती है। मौसी एक नंबर की डरपोक है। अगर सत्ता न हो, पुलिस का कवच-कुंडल न हो तो मौसी विचारधारा की ऐसी की तैसी कर के पाला बदले बिना नहीं रहेगी। बल्कि, कांग्रेस-राष्ट्रवादी से पूरी तरह फूली हुई भाजपा ७५ फीसदी खाली हो जाएगी। छह सांसदों को कहते हैं कि ‘कांग्रेस’ विचार मंजूर नहीं। तो क्या मिंधे कोई एरिस्टॉटल, सॉक्रेटिस, आचार्य रजनीश जैसे विचारक हैं? भ्रष्टाचार का पैसा इस्तेमाल कर लोगों को खरीदना ही इनकी विचारधारा है। दरअसल छह में से ‘पांच’ तो कांग्रेस के ही कबाड़ में पड़े हुए लोग थे। वे उद्धव ठाकरे के चरणों में आए और सांसद बने। इसलिए आज उनका भाव बढ़ गया और पचास करोड़ में वे बिक गए। अब वे बिल में छिपकर बैठे हैं। पुलिस ने उन्हें विशेष सुरक्षा दी है। जामनेर की मौसी कहती है, शिवसेना के पास ‘राड़ा’ करने की ताकत नहीं है। सब खत्म हो गया है। अरी मौसी, सब खत्म हो गया है। तो गद्दारों की सुरक्षा के लिए इतना सशस्त्र बंदोबस्त क्यों? वो भी जनता के पैसों से। खुद मौसी के बंदोबस्त में पुलिस की पूरी फौज है। भ्रष्टाचारियों और गद्दारों को डर लगता है, यह अच्छी बात है। फिर भी एक दिन मौसी, तेरा भरे बाजार में वस्त्रहरण होगा ही। तिलचट्टों से भी डरने वाले तुम, मर्दानगी का जोश किस बात का दिखाते हो? कुंभ मेले में, राम मंदिर में डाका डालने वाले तुम, नैतिकता की बातें किस मुंह से करते हो? तुम सत्ता का अमर-पट्टा बांधकर नहीं आए हो, यह याद रखना। रहा सवाल शिवसेना के नए गद्दारों का। उनका ‘ऑपरेशन तोड़ो’ होकर ही रहेगा!

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