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`महायुति’ का ‘ठंडा’ भ्रष्टाचार … तीन लाख में खरीदे रु. ९० हजार के फ्रिज!

– स्वास्थ्य विभाग ने लगाया करोड़ों का चूना
– २,००० रेफ्रिजरेटर-डीप  फ्रीजर का हुआ था सौदा
सामना संवाददाता / मुंबई
महायुति सरकार की नीतियों पर एक और घोटाले का साया गहराता जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग की खरीद प्रक्रिया में हुआ यह खुलासा चौंकाने वाला है। बाजार में ६५ से ९० हजार रुपए में मिलने वाले फ्रिज ३ लाख रुपए तक में खरीदे गए। महायुति के इस ‘ठंडे’ भ्रष्टाचार के कारण सरकारी खजाने को करोड़ों रुपए का चूना लगा है। इस सौदे के तहत करीब दो हजार रेफ्रिजरेटर और डीप फ्रीजर खरीदे गए हैं।
फिलहाल, इसे लेकर चार महीने पहले स्वास्थ्य निदेशालय की ओर से गठित जांच समिति की तरफ से कोई नतीजा सामने नहीं आया। शिकायतकर्ता ने स्वास्थ्य मंत्री और मंत्रालय को एक विस्तृत शिकायत भेजी थी, जिसमें आरोप लगाया गया कि वर्ष २०२४ में मंजूर उच्च गुणवत्ता के उपकरणों की जगह कम गुणवत्ता वाले उपकरण मंगवाए गए। लेकिन उनकी कीमतें उसी स्तर पर रखी गईं, जो उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादों के लिए स्वीकृत थीं। उदाहरण के तौर पर जिस आईएलआर की वास्तविक लागत ७०,००० रुपए बताई गई है, उसे ३.०५ लाख रुपए में खरीदा गया। वहीं ६५,०००-७०,००० हजार रुपए के डीप  फ्रीजर को २.४५ लाख रुपए में खरीदा गया था।
वैक्सीन का भंडारण
महायुति सरकार ने राज्यभर में वैक्सीन के भंडारण के उपयोग के लिए ये रेफ्रिजरेटर और डीप फ्रीजर खरीदे हैं। इनकी कुल लागत क्रमश: ३३ करोड़ और २९ करोड़ रुपए बताई गई है।

आपूर्ति से पहले ही
शुरू हुआ भुगतान!
‘महायुति’ सरकार का फ्रिज खरीद घोटाला

महायुति राज में  फ्रिज और डीप फ्रिज की खरीद में भारी भ्रष्टाचार होने की शिकायत आई है। इस संबंध में की गई शिकायत में यह आरोप लगाया गया कि वास्तविक आपूर्ति से पहले ही करोड़ों रुपए की भुगतान प्रक्रिया शुरू कर दी गई और कुछ स्थानों पर उसी दिन एक ही समय पर उपकरणों की डिलिवरी दर्ज की गई, जो संदेहास्पद मानी जा रही है। हालांकि, प्रारंभिक ऑडिट रिपोर्ट में स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों और कंपनियों को क्लीन चिट दी गई थी, लेकिन शिकायतकर्ता ने इसे अपूर्ण और पक्षपातपूर्ण बताया है। इस संबंध में दो महीने पहले स्वास्थ्य विभाग की ओर से एक उच्च स्तरीय जांच समिति गठित की गई थी। अभी तक समिति की रिपोर्ट नहीं आई है। समिति की रिपोर्ट के आधार पर दोषियों पर कार्रवाई की संभावना है। जानबूझकर टेंडर प्रक्रिया को तोड़-मरोड़कर महज दो कंपनियों के पक्ष में मोड़ा गया, जिसमें एक कंपनी को पीछे हटाकर दूसरी को ठेका दिलाया गया।

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