इस साल मानसून में अतिवृष्टि और बादल फटने की घटनाओं से मराठवाड़ा समेत राज्य के कई जिलों में भयंकर बाढ़ आई और भारी नुकसान हुआ, वहीं दूसरी ओर वापसी की बारिश ने मराठवाड़ा और पड़ोसी जिलों सोलापुर और नगर में बुरी तरह कहर बरपाया है। ऐसे हालात में जब मराठवाड़ा में गीले अकाल का हाहाकार मचा रखा है वहीं विडंबना देखिए सरकार और प्रशासन कहीं नजर नहीं आ रहे। अगस्त में बादल फटने जैसी भारी बारिश ने मराठवाड़ा के किसानों की फसलों को खेतों में कीचड़ में बदल दिया। उसमें से जो बची-खुची फसलें थीं, वे भी पिछले तीन दिनों की बारिश से बरबाद हो गई हैं। पिछले तीन दिनों से मराठवाड़ा में कई जगहों पर बादल फटने जैसी बारिश हो रही है। धाराशिव और बीड जिलों में बारिश ने कहर बरपाया है। धाराशिव के २४ मंडलों और बीड के २९ मंडलों में रातभर भारी बारिश हुई। अगस्त से लगातार हो रही बारिश के कारण जहां नदी-नाले पहले से ही उफान पर थे, वहीं रविवार रात हुई भारी बारिश के कारण इन दोनों जिलों की सभी नदियों-नालों में बाढ़ आ गई और बाढ़ का पानी अपने रास्ते छोड़कर खेतों में घुस गया। कई गांवों में पानी भर गया। इतना ही नहीं, महाराष्ट्र को कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश से जोड़नेवाला धुले-सोलापुर राष्ट्रीय राजमार्ग भी दो किलोमीटर तक पानी में डूब गया। चौसाला में धुले-सोलापुर
राजमार्ग ने नदी का रूप
ले लिया। यहां दोनों तरफ का यातायात रोक दिया गया है। प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती दोनों राज्यों को जोड़नेवाले अवरुद्ध यातायात को साफ करना है, क्योंकि पानी निकलने की जगह नहीं है। सोलापुर जिले के नलदुर्ग के पास राजमार्ग पर भी बाढ़ का पानी बह रहा है। छत्रपति संभाजीनगर और जालना जिलों में भी रविवार रात और सोमवार सुबह बारिश का कहर टूट पड़ा है। अहिल्यानगर जिले में भी कई जगह पर भारी वर्षा हुई। नासिक से छत्रपति संभाजीनगर तक जायकवाडी बांध के पली ओर के सभी २१ बांध उफनकर बह रहे हैं, जिसकी वजह से इस मानसून में पैठण के नाथसागर के दरवाजे जुलाई से अभी तक पांचवीं बार खोलने पड़े हैं। जायकवाडी से गोदापात्रा में जानेवाला पानी का तूफान अतिवृष्टि की वजह से पहले ही जर्जर हो चुके जालना, बीड, परभणी, नांदेड़ जिले को अपनी चपेट में ले रहा है। बीड जिला तो मई महीने से ही मानसून की चपेट में है और यहां पर पिछले ५० सालों में सबसे ज्यादा बारिश दर्ज की गई है। इस दफा के मानसून ने खेत के सोयाबीन, कपास, उड़द, मूंग, तुअर और मक्का जैसी फसलों को तो नष्ट किया ही है साथ-साथ केले की फसल और तैयार गन्ने को भी खत्म कर दिया है। अतिवृष्टि के चलते पैâसलें और फल के बाग बर्बाद तो हुए ही हैं, लेकिन यह खेत की मिट्टी तक को बहा ले गई है। मिट्टी बह जाने से मृदा संरचना को जो नुकसान हुआ है, उसकी
भरपाई नामुमकिन
है। छत्रपति संभाजीनगर जिले में डेढ़ लाख हेक्टेयर, जालना जिले को १ लाख हेक्टेयर, धाराशिव जिले में तकरीबन ढाई लाख हेक्टेयर, लातूर जिले में लगभग ३ लाख हेक्टेयर, परभणी जिले में १.५ लाख हेक्टेयर, हिंगोली जिले में ३ लाख हेक्टेयर और बीड और नांदेड़ जिलों में क्रमश: ४ लाख और ६.५० लाख हेक्टेयर में लगी फसलें बर्बाद हो गई हैं। बुलढाणा जिले में सोयाबीन और तुअर को भी भारी नुकसान हुआ है। अगर इसमें पिछले दो दिनों के नुकसान के आंकड़े शामिल किए जाएं तो अकेले मराठवाड़ा में २५ लाख हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्र में फसलों को नुकसान पहुंचा है। सोलापुर जिले में भी ११ में से ६ तालुकाओं में भारी बारिश के कारण १ लाख ३५ हजार हेक्टेयर में १ लाख ५५ हजार किसानों की फसलें बर्बाद हो गई हैं। पिछले दो महीनों में बादल फटने या भारी बारिश ने मराठवाड़ा में कहर बरपाया है। इसके अलावा, पिछले तीन दिनों से हो रही बारिश ने मराठवाड़ा से सटे बीड, धाराशिव, लातूर और सोलापुर जिलों के खेतों को झीलों में बदल दिया है और पूरी फसल कीचड़ में डूब गई है। हमेशा सूखे की मार झेलनेवाला मराठवाड़ा को इस साल बारिश के अकाल ने अपना रौद्र रूप दिखाया है। मराठवाड़ा और सोलापुर के लाखों किसानों की २७ लाख हेक्टेयर जमीन पर लगी सारी फसलें बर्बाद हो गई हैं। किसानों के सामने यह अब तक का सबसे बड़ा संकट है। सरकार को तुरंत गीला अकाल घोषित करना चाहिए। साथ ही, हताश किसानों को मुआवजा और पूरी कर्ज माफी देकर राहत भी पहुंचानी चाहिए। राज्य की जनता सोच रही है कि जब वापसी की बारिश ने मराठवाड़ा समेत राज्य के कई हिस्सों में हाहाकार मचा रखा है, ऐसे वक्त में सरकार कहां गायब है?
