‘फडणवीस हैं तो मुमकिन है’; पब्लिक का फूटा गुस्सा
सामना संवाददाता / मुंबई
मुंबई में एक बार फिर जनता की संपत्ति पर डाका डालने का आरोप लगा है। इस बार निशाना बना है जुहू का एक बेशकीमती भूखंड, जिसकी कीमत ८०० करोड़ रुपए से भी ज्यादा आंकी गई है। आरोप है कि यह भूखंड बुलेट ट्रेन की रफ्तार से रातों-रात मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के एक करीबी बिल्डर दोस्त की झोली में डाल दिया गया है। इस पूरे खेल में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि ‘आश्रय योजना’ की पूरी तरह से अनदेखी की गई है, जिसका मकसद जरूरतमंदों को आवास मुहैया कराना था। विपक्ष ने आरोप लगाया है कि इस घोटाले में कुछ प्रभावशाली लोगों को लाभ पहुंचाने के लिए नियम-कानूनों को ताक पर रख दिया गया है। इस संबंध में नाराज मुंबईकरों का कहना है कि ‘फडणवीस हैं तो कुछ भी मुमकिन है’।
जुहू के भूखंड घोटाले की करो न्यायिक जांच!
दोषियों पर हो कड़ी कार्रवाई, विपक्ष की मांग
-सरकार ने पसंदीदा बिल्डर मित्र को अवैध रूप से दी जमीन
-विपक्ष में रहते हुए फडणवीस ने किया था विरोध
फडणवीस सरकार ने अपने लाडले बिल्डर दोस्त के लिए सभी नियम और कानून को दरकिनार कर सरकारी भूखंड आवंटित कर दिया है। जुहू में स्थित एक बड़ा भूखंड इस सरकार ने अपने पसंदीदा बिल्डर मित्र को अवैध रूप से दे दिया है। इस भूखंड के लिए मनपा ने बुलेट ट्रेन जैसी तेजी से मंजूरी दी और केवल चार दिनों में भूखंड बिल्डर की झोली में डाल दी गई। विशेष बात यह है कि यह एसआरए के लिए आरक्षित भूखंड है, जिस पर देवेंद्र फडणवीस ने विरोधी दल में रहते हुए विरोध किया था। ऐसे में इस ८०० करोड़ रुपए के भूखंड घोटाले की न्यायिक जांच हो और दोषियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की जाए, इस तरह की मांग मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष व सांसद वर्षा गायकवाड ने की है।
गायकवाड ने कहा कि हमने भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम की शुरूआत में जुहू की ४८,४०७ वर्ग फुट के मुंबई मनपा कर्मचारियों के आवास के लिए आरक्षित भूखंड पर चल रहे भ्रष्टाचार का पर्दाफाश किया। भाजपा नेता के शत प्रतिशत मालिकाना हक वाली कंपनी को जुहू का सीटीएस क्र. २०७ वाला भूखंड दिया गया।
१९५० में बनी थी कॉलोनी
१९५० में मनपा ने यहां सफाई कर्मचारियों के लिए कॉलोनी बनाई थी। अप्रैल २०२५ तक यह कॉलोनी यहीं थी। तीन जुलाई २०२५ को राज्य के नगर विकास विभाग ने एक अधिसूचना जारी की और डीसी नियमों में बदलाव कर दिया। इसके तहत अब निजी बिल्डर ऐसे सार्वजनिक व मनपा के मालिकाना भूखंड पर भी एसआरए प्रोजेक्ट चला सकते हैं।
मनपा ने पूरी नहीं की प्रक्रिया
चौंकानेवाली बात यह कि सरकार ने इस बदलाव पर जनता से कोई सुझाव या आपत्ति लेने की अनिवार्य प्रक्रिया भी पूरी नहीं की। इस निर्णय से केवल मुंबई की विकास योजना ही खतरे में नहीं है, बल्कि हर आरक्षित, सार्वजनिक और मनपा के मालिकाना भूखंड के लिए भी खतरे का रास्ता खुल गया है।
आयुक्त ने भी दिखाई जल्दबाजी
वर्षा गायकवाड ने कहा कि ८ अप्रैल २०२५ को बिल्डर ने मनपा आयुक्त भूषण गगराणी को एक पत्र भेजा और ४ मार्च २००९ को एसआरए के सीईओ को पहले रद्द की गई एनओसी बहाल करने की मांग की। इस एनओसी का उद्देश्य मनपा के भूखंड को ‘झोपड़पट्टी’ घोषित कर बिल्डर को इसके आसपास एसआरए योजना के तहत विकसित करने की अनुमति देना था। नौ अप्रैल को आयुक्त गगराणी ने तुरंत वेरिफाई और सबमिट ऑर्डर का निर्देश दिया। कागजों से पता चलता है कि २८ अप्रैल और ६ मई २०२५ को बिल्डर के प्रतिनिधियों ने उपायुक्त डॉ. किरण दिघावकर के साथ बैठक की और बिल्डर के प्रस्ताव को स्वीकार किया। इसके बाद ९ जून २०२५ को डॉ. दिघावकर के कार्यालय ने औपचारिक प्रस्ताव पेश किया और १३ जून २०२५ को आयुक्त गगराणी के कार्यालय ने मंजूरी दे दी।
