मुख्यपृष्ठस्तंभतड़का : जूते की दुर्गंध

तड़का : जूते की दुर्गंध

कविता श्रीवास्तव

एक उम्रदराज वकील ने सर्वोच्च न्यायालय में जूता फेंकने का प्रयत्न करके एक संवेदनशील चर्चा को तूल दे दिया है। वह अपनी आस्था को लेकर अत्यधिक ही संवेदनशील है। उसने अपनी हरकत से बेफिक्र होकर यह कहकर चौंका दिया कि उसने स्वयं कुछ नहीं किया, उससे परमात्मा ने यह करवाया। इस मामले पर सोशल मीडिया में धर्म और जाति आधारित टिप्पणियों की भरमार लग गई है। यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में आई एक याचिका पर सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी को लेकर प्रतिक्रिया के रूप में सामने आया है। उन्होंने याचिकाकर्ता को भगवान की शरण में जाने की बात कही थी। वकील ने उस टिप्पणी से आहत सा महसूस किया है। उसने अपना गुस्सा जूता फेंककर व्यक्त किया। लेकिन यह प्रतिक्रिया व्यावहारिक जीवन में अशोभनीय है और कानूनन अपराध है। किसी के वक्तव्य पर अपनी असहमति, नाराजगी अथवा विरोध प्रदर्शित करने के अन्य कई तरीके हैं। लेकिन ऐसी हरकत बर्दाश्त नहीं की जा सकती है। हालांकि, ईश्वर के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हुए चीफ जस्टिस ने वकील को माफ कर दिया है, परंतु बार काउंसिल ने उसे निलंबित कर दिया है। वकील की इस हरकत पर अनेक लोगों ने प्रदर्शन भी किए हैं। लेकिन दूसरी ओर एक वर्ग ने इस वकील के कदम का समर्थन भी किया है। उनका मानना है कि इस समय लोकतंत्र के प्रमुख आधारस्तंभों पर आम लोगों का भरोसा कहीं न कहीं कुछ कम हो रहा है। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मार्वंâडेय काटजू का बयान भी सामने आया है। उनका कहना है कि जजों को कोर्ट में कम बोलना चाहिए। उन्हें प्रवचन, उपदेश या व्याख्यान नहीं देना चाहिए। यह बात इसलिए भी समझने योग्य है क्योंकि अक्सर देखा गया है कि कई जज अपनी कार्रवाई के साथ-साथ कई बार कुछ टिप्पणियां भी कर जाते हैं। हालांकि, जजों की कई टिप्पणियां सकारात्मक और अनुकरणीय भी होती हैं। कई बार वे कोई बात समझाने के लिए भी ऐसा करते हैं। इस पर सहमति-असहमति हो सकती है, लेकिन हमारी अदालतें आज भी न्याय का मंदिर ही समझी जाती हैं। फिर भी न्यायिक व्यवस्था को लेकर अक्सर ही प्रतिकूल टिप्णियां भी सुनी जाती हैं। इसका अनुभव रखनेवाले ही इस पर बेहतर राय दे सकते हैं। क्योंकि किसी भी क्षेत्र की सच्चाई क्या है, यह उसके भीतर रहनेवाले ही बेहतर जानते हैं। फिर भी अक्सर गलतफहमियां भी विवाद का कारण बनती हैं। इसलिए गलतफहमियों को दूर करके सामाजिक सौहार्दता और परस्पर विश्वास बढ़ाने के लिए प्रयत्न होने चाहिए। देश में न्यायिक प्रणाली को चुस्त-दुरुस्त बनाए रखना जरूरी है। यह शासन-प्रशासन के साथ ही अदालतों में काम करनेवाले जजों और वकीलों को भी ध्यान रखना चाहिए। आम आदमी की अपेक्षा यही होती है कि अदालती व्यवहार संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर बना रहे। अदालत सबको समान दृष्टि से देखे। अदालत में कोई जूता फेंके और उसकी दुर्गंध पैâले, यह ठीक नहीं। ऐसी नौबत न आए, यह सबको ध्यान रखना होगा।

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