मुख्यपृष्ठस्तंभइस्लाम की बात : किसके संग जाएगा मुस्लिम समाज?

इस्लाम की बात : किसके संग जाएगा मुस्लिम समाज?

सैयद सलमान, मुंबई

बिहार की राजनीति एक बार फिर अपने उबाल पर है। चुनावी बिगुल बज चुका है और सूबे की हर सीट पर सियासी हलचल तेज हो गई है। ६ और ११ नवंबर को दो चरणों में चुनाव होंगे। इस बार सभी की निगाहें उन इलाकों पर टिकी हैं जहां मुसलमान मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं। किशनगंज, पूर्णिया, अररिया, कटिहार, सीवान, दरभंगा, मधुबनी, भागलपुर जैसी दर्जनों सीट ऐसी हैं, जो मुस्लिम जनसंख्या के लिहाज से बेहद अहम हैं। यही वे इलाके हैं जहां हर पार्टी का चुनावी गणित मुस्लिम वोटों की दशा और दिशा पर टिका है। राजनीतिक दलों की होड़ जारी है। राजद को परंपरागत तौर पर मुस्लिम-यादव समीकरण का भरोसा हमेशा रहा है। कांग्रेस खुद को धर्मनिरपेक्ष छवि का प्रतिनिधि बताकर मैदान में है। जनसुराज पार्टी अपने नए विकल्प की छवि गढ़ने में जुटी है, जबकि एमआईएम सीमांचल में अपनी जड़ें और मजबूत करने की कोशिशों में लगी है। वहीं आम आदमी पार्टी भी अपने सीमित दायरे में वोटों का जुगाड करने की कोशिश कर रही है। इन सबके बीच जेडीयू और भाजपा जैसे दल भी ‘पसमांदा मुस्लिम’ यानी ओबीसी मुस्लिम मतदाताओं के जरिए उस वर्ग में जगह बनाने का प्रयास कर रहे हैं, जो अब तक मुख्यधारा की राजनीति से कुछ दूरी बनाए हुए था।
आत्ममंथन-असली मुद्दा!
बिहार के मुस्लिम समाज के लिए यह चुनाव महज राजनीतिक नहीं, आत्ममंथन का भी समय है। क्योंकि सवाल अब सिर्फ किसी पार्टी या प्रत्याशी को जिताने का नहीं, बल्कि यह सोचने का है कि वोट से क्या हासिल होगा और अगली पीढ़ी की तस्वीर वैâसी बनेगी। दशकों से मुस्लिम मतदाता को वोट बैंक समझा गया, उसके नाम पर नारे लगे, सवाल उठे और चुनाव के बाद वही हाशिए पर छोड़ दिया गया। अब समय है कि मुस्लिम समाज अपने अधिकारों और जरूरतों को प्राथमिकता देते हुए अपनी रणनीति खुद तय करे।
सच यह है कि सीमांचल हो या मध्य बिहार, मुस्लिम मतदाताओं के बीच राजनीतिक वफादारी बिखर रही है। युवा तबका रोजगार, शिक्षा, सुरक्षा और सम्मान के मुद्दे पर सोचने लगा है। उसके लिए अब मजहबी पहचान या धार्मिक भावनाएं वोट की पहली कसौटी नहीं रहीं। यह एक सकारात्मक संकेत है। अगर यह जागरूकता सामूहिक सोच में बदले तो राजनीति की दिशा भी बदल सकती है, लेकिन इसके साथ ही सावधानी की जरूरत भी है। देश की मौजूदा परिस्थितियों में जहां नफरत और विभाजन की राजनीति अक्सर माहौल बिगाड़ने की कोशिश करती है, वहां मुसलमान मतदाता का हर कदम नपे-तुले अंदाज में होना चाहिए। सड़कों पर अनावश्यक विरोध, मोर्चे या धरने देकर किसी भी प्रकार का ध्रुवीकरण करने की स्थिति न बने इस बात का ध्यान रखना जरूरी है। क्योंकि जितना शोर बढ़ेगा, उतना ही असली मुद्दा पीछे छूटेगा।
सियासत-सोच!
मुसलमानों को यह समझना होगा कि आज उनका सबसे बड़ा प्रश्न रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा है। पहचान की लड़ाई भी एक मुद्दा है, लेकिन उसके लिए सड़कों पर उतरने की जरूरत नहीं है। इसके लिए वे जिस उम्मीदवार या दल को चुनें, उससे यह सवाल जरूर पूछें कि अल्पसंख्यक इलाकों में स्कूल-कॉलेज क्यों पिछड़े हैं? क्यों औद्योगिक निवेश और रोजगार के अवसर सीमांचल जैसी भूमि पर न के बराबर हैं? क्यों स्वास्थ्य सुविधाएं अब भी शहरों से दूर हैं? जब तक ये प्रश्न राजनीति की केंद्ररेखा में नहीं आते, तब तक भले ही कोई जीते या हारे, समाज वहीं खड़ा रहेगा जहां आज है।
राजद, कांग्रेस या एमआईएम जैसे सभी दलों को अपनी रणनीति में जमीन से जुड़े मुद्दों को प्राथमिकता देनी होगी। यह देखना होगा कि सिर्फ टिकट बांटने या भाषण देने से भरोसा नहीं जीता जा सकता, उसे हकीकत की नीतियों और निभाई गई बातों से कायम रखना पड़ता है। जेडीयू और भाजपा के लिए भी यह परीक्षा की घड़ी है कि वे मुस्लिम समाज को केवल ‘पसमांदा मंच’ का हिस्सा बनाकर न देखें, बल्कि उसे बराबरी के नागरिक के रूप में स्थान दें।
बिहार का मुस्लिम मतदाता यदि सोच-समझकर, दूरदर्शिता से वोट डाले तो यह चुनाव एक नए संदेश की नींव रख सकता है। मुस्लिम समाज यह संदेश दे सकता है कि मुसलमान अब किसी का वोट बैंक नहीं, एक जागरूक और निर्णायक नागरिक वर्ग है। यह वही आवाज है जो लोकतंत्र को ताकत देती है, उसे भावनाओं से नहीं, विवेक से जीता है। यही वक्त है कि मुस्लिम समाज अपनी ऊर्जा को नारों या टकराव में नहीं, बल्कि मतदान केंद्रों तक पहुंचाने में लगाए। जोश के साथ होश रखे। सियासत बदलनी है तो सोच बदलनी होगी। सोच के दायरे में अपनी पहचान के साथ भविष्य को शामिल करना बुद्धिमानी है। लकीर का फकीर बनने से कहीं बेहतर है, पूरे समाज का हित सोचा जाए।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक और देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

अन्य समाचार