हिमांशु राज
काशी—भारत की आध्यात्मिक राजधानी, आत्मा का नगर, वह स्थान जहाँ विश्वास जल बनकर बहता है और संस्कृति सुर बनकर गूंजती है। इसे कहा गया ‘गले की बनारस’—क्योंकि यहाँ कला, संगीत और भक्ति एक-दूसरे की नसों में समाहित हैं। यह शहर किसी धर्म, किसी जाति का नहीं, बल्कि राग का नगर है, जहाँ मंदिर की घंटियों की अनुगूँज भी संगीत का आलाप बन जाती है। जब शाम ढलती है, गंगा का जल सोने-सा दमकता है, और अस्सी घाट से लेकर मणिकर्णिका तक आरती की लहरियाँ हवा में गूंजती हैं, तब लगता है जैसे पूरा बनारस किसी शाश्वत ठुमरी में डूब गया हो। उसी संगीत की जड़ में थी एक जगह—दालमण्डी,जिसे अब हकीम मोहम्मद ज़ाफ़र मार्ग कहा जाता है। यही वह धरती थी जहाँ संगीत सिर्फ कला नहीं, आत्मा की भाषा बन गया। दालमण्डी का नाम आते ही निगाहों के आगे हवेलियों की छतें, खिड़कियों पर झुकी झालरें और महफ़िलों की हल्की रौशनी कौंध उठती है। वहाँ से उठती थी घुँघरुओं की झंकार, तबले की थपक और सरोद के नाद। वहाँ स्त्रियाँ थीं जो समाज द्वारा हाशिए पर रखी गईं, पर अपनी कला से उस हाशिए को केंद्र बना गईं। वे साधिकाएँ थीं—अपने हर दर्द को राग में, अपने हर अपमान को लय में और अपने हर आँसू को गीत में बदल देने वाली साधिकाएँ।रसूलनबाई की ‘लगन मोरी छूटे ना’ और बृजबाला की करुण बंदिश आज भी हवाओं में तैरती हैं। कहा जाता है, उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ ने अपनी आत्मा का पहला सुर इन्हीं तवायफ़ों की गोद में पाया था। उन्होंने कहा था—“अगर तवायफ़ें न होतीं, तो बिस्मिल्लाह भी न होता।” यह उनके नम्रता नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक योगदान की स्वीकृति थी जिसने शहनाई को जनमानस तक पहुँचाया। दालमण्डी वह तर्ज थी जहाँ नृत्य भक्ति बन गया था और संगीत साधना। जानकीबाई ‘छप्पन छुरी’ के ठुमके में जितनी ऊर्जा थी, उतनी ही गहराई सिद्धेश्वरी देवी की गायकी में थी। गौहरजान—भारत की पहली रिकॉर्ड की गई आवाज़—ने जो तान लगाई, वह केवल गीत नहीं, युगों की स्मृति बन गई। रसूलनबाई की रागिनी हो या गिरजा देवी की तान, सबमें काशी की गंध थी, उसके घाटों की गूँज थी, उसकी हवाओं की आत्मा थी।
उनके संग थी धनेसरा बाई की ठुमरी, चम्पा बाई की नाज, हुस्नाबाई की अदा, काशीबाई की गहराई, कमलेश्वरी देवी की मृदुता, राजेश्वरी बाई का आत्मविश्वास, दुर्गेशनन्दिनी की लचक, शाहजहाँ बेगम का शाही ठाट, भौंफटी केसर का तेज़, छोटी मोती का कौशल, रहीमी बाई की कोमलता, गुलाबजामुनबाई का रसीला स्वर, फिज़ा जान की छेड़ और नफ़ीसा बेगम की नफासत। इन सबके नाम सिर्फ इतिहास नहीं हैं, बल्कि भारतीय संगीत का धड़कता हुआ वंश-वृक्ष हैं। उनकी महफ़िलें किसी इश्क़ की नहीं, आदर की धरती थीं। वहाँ बैठना सौभाग्य था। वहाँ शब्दों की तहज़ीब और व्यवहार की मर्यादा सीखी जाती थी। उस्ताद असद अली खाँ, अली बख्श, वज़ीर खाँ और बिस्मिल्लाह खाँ जैसे कलाकार उन्हीं के दरबारों में शिष्यत्व के भाव से बैठते थे। उनकी कठोर दिनचर्या, सख्त रियाज़ और अपनी कला के प्रति अपार निष्ठा ने उन्हें केवल कलाकार नहीं, संत बना दिया। उनकी ज़िन्दगी में साजिशें भी थीं, तिरस्कार भी, पर उन्होंने कभी अपनी कला को अपवित्र नहीं होने दिया। वे कहती थीं—“साज का राग ही हमारी इबादत है।”
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने अपने व्यंग्य में लिखा था—
“आधी काशी भाट भंडोरिया बाम्हन औ संन्यासी,
आधी काशी रंडी मुंडी राँड़ खानगी खासी।”
यह सिर्फ तंज नहीं, उस द्वैत का दस्तावेज़ था जहाँ एक तरफ़ भक्ति का गजब आलोक था और दूसरी तरफ़ संगीत की सजीव लहरें। मुंशी प्रेमचन्द का ‘सेवासदन’ और अमृतलाल नागर की ‘ये कोठेवालियाँ’ इसी द्वैत को मानवीय दृष्टि से परखते हैं। जद्दनबाई ने तो इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उसे आधुनिक रंगमंच और सिनेमा तक पहुँचाया। उनकी बेटी नरगिस, उनकी आत्मा की अगली पीढ़ी थी—जिसमें बनारस का संगीत और दालमण्डी की तहज़ीब दोनों बहते थे। जब नरगिस पर्दे पर भाव के साथ बोलती थीं, तो वह अभिनय नहीं, अपनी माँ और उनकी परंपरा का प्रतिध्वनि था। अवध की मशहूर उमराव जान ने भी अपने जीवन के उत्तर चरण में काशी को अपना अंतिम आश्रय बना लिया। गोविंदपुरा की सँकरी गलियों में वह साधना में डूबी रहीं, जहाँ लोग उन्हें ‘उमराव साहिबा’ कह कर संबोधित करते। उन्होंने अपने जीवन का अंतिम रियाज़ वहीं किया, जैसे स्वयं को गंगा की लहरों में समर्पित कर दिया हो। दालमण्डी का हर कोना, हर दीवार, हर खिड़की उन कलाकार स्त्रियों की स्मृतियों से भरी है। आज जब वहाँ की हवेलियाँ बूढ़ी हो चुकी हैं, उनकी झिलमिल रोशनियाँ बुझ चुकी हैं, तब भी हवा में कोई धीमा आलाप फूट पड़ता है। ऐसा लगता है जैसे रसूलन, सिद्धेश्वरी, जानकीबाई, चम्पा, हुस्नाबाई, गौहरजान और अनगिनत आत्माएँ अब भी किसी अनकहे गीत की पुनरावृत्ति में मग्न हों। दालमण्डी को किसी लाल बत्ती क्षेत्र से तुलना करना उसके गौरव का अपमान होगा। यह वह भूमि थी जहाँ देह पूजन नहीं, आत्मा अर्चन थी; जहाँ कला श्रम से जन्म लेती थी और भक्ति की तरह निभाई जाती थी। यहाँ हर घुँघरू एक मंत्र था, हर ठुमरी एक प्रार्थना। काशी आज भी गा रही है। गंगा की लहरों पर, घाटों की सीढ़ियों पर, किसी पुरानी हवेली के झुके झरोखों में अब भी वही संगीत तैरता है। फर्क केवल इतना है कि श्रोताओं के कान बदल गए हैं, पर सुर वही हैं—अमृत से भी गहरे, काल से भी परे।
कभी नफासत व नज़ाकत बोलचाल संगीत साहित्य का नायाब केंद्र रही दाल मंडी आज टूट रही है। हवेलियों की चौखटें बेमकसद हैं, और नफासत की हवा अब धूल में बदल चुकी है, और नज़ाकत कब का दम् तोड़ चुकी है । वह रौनक, वह तहज़ीब, सब जैसे वक्त की गर्द में गुम होते जा रहे हैं — इतिहास एक आह बनकर रह गया है। हम कैसे भूल सकते दालमण्डी स्वर संगीत नृत्य की जीवित स्मृति की वह विरासत को जिसने भारत की संस्कृति को आत्मा दी। यह वह आलोक है जिसमें नारी ने अपने आँसुओं को गीत बनाया, अपने संघर्ष को राग में ढाला और अपनी कला को चिरस्थायी कर दिया। जब तक गंगा बहेगी, बनारस की तान सजेगी —दालमण्डी के स्वर संगीत की धड़कन बने रहेंगे।
(क्रमशः -)
