मुख्यपृष्ठस्तंभअवधी व्यंग्य : नोबल पुरस्कार

अवधी व्यंग्य : नोबल पुरस्कार

एड. राजीव मिश्र मुंबई

सुबह-सुबह मनोहर अपने दुआरे खटिया पर बइठे अखबार पढ़त रहें तब तक झुलई परधान तमतमाये आइके धड़ाम से रखी कुर्सी पर बइठ गए। काहें गुस्सा के गाजियाबाद होइ रहे हो झुलई? तुम तो बातइ मत करो मनोहर! रोज अखबार पढ़त हौ अउर हमका एक बार तक नही बतायो। का नही बताए झुलई? मनोहर झुंझलात बोले। अरे यार मनोहर, नोबल पुरस्कार के घोषणा होइ गयी अउर हमका खबर तक नही लगी। हम तो ट्रंप से जबरा दावेदार रहे। बस फरक इतनय है कि उ दुनिया में शांति स्थापना में लगे हैं अउर हम गाँव मे शांति स्थापना कई रहे हैं। याद है जब तुम्हरे साथ जोखई के झगड़ा भवा रहा, हमही अइसन रहा कि थाना में जाइके तुम दूनहूँ लोग में समझौता कराय के शांति कराए रहे। हाँ तो भइया, अगियव तुमही लगाए रह्यौ अउर थाना में समझौता में बदले दलाली लिह्यौ उ अलग। अरे यार, तुम्हरी जान बचाये ओहिकर कउनउ पोस नही है, बस आग लगाइ दिहो। अच्छा ई छोड़व उ भुलई, जब जोन्हरी के खेत में फुलमतिया के साथ धराये रहे तब बीच-बचाव कइके दूनउ टोला में शांति के स्थापना के किहे रहा, हमही न? हाँ, पर उहूँ में तुम्हरी कारस्तानी जियादा रही। फुलमतिया के बहकाई के भुलई के फसवाय दिहो। अब ज्यादा चौधरी न बनो इहाँ बात समस्या के नही समाधान के होइ रही है। हम तो गांवय मा आगि लगाय के बुझावै के महान कारज में लगे अउर उ ट्रंपवा? उ तो अफगानिस्तान से लइके यूक्रेन, पाकिस्तान से लइके फिलिस्तीन हर जगह शांति की कोशिश में लागि हैं न? जब उ नोबल माँगि सकत हैं तो हम काहें नही माँगि सकत? अइसा है, तुम अउर तुम्हार ट्रंप दूनहूँ लोग अब शांति की कोशिश करय छोड़ि देव, कहिके तुम दूनहूँ जन अगर अइसइ लगा रहियौ तो गाँव से लइके दुनिया भर में बहुत शांति होइ जाई, जवन न दुनिया चाहत है न गाँव। अउर जहाँ तक पुरस्कार के बात है दीवाली पर एक अखिल भारतीय कबी सम्मेलन है दूनउ लोग आइ जाओ अउर साहित्य शिरोमणि के पुरस्कार लेइ जाओ।

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