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पड़ताल : कांदिवली का ‘शताब्दी अस्पताल’ बना शर्म का प्रतीक …‘ओवरलोडेड’ होने से सिस्टम हो रहा फेल!

धीरेंद्र उपाध्याय

-टूटी सुरक्षा व्यवस्था से सांसत में जान
-हर चौथे बेड पर दो मरीज, खून के लिए दर-दर भटकते परिजन
-दवाओं की कमी ने किया परेशान
-आठ साल बाद भी नहीं सुधरी सफाई व्यवस्था
-चूहों के बाद अब कुत्ते-बिल्लियों का कब्जा
मुंबई के कांदिवली स्थित ‘शताब्दी अस्पताल’ का हाल दिनोंदिन बद से बदतर होता जा रहा है। कभी जनसेवा के लिए शुरू हुआ यह अस्पताल अब ‘शर्म का प्रतीक’ बन चुका है। ‘ओवरलोडेड’ सिस्टम के चलते यहां का पूरा तंत्र चरमरा गया है। आलम यह है कि यहां न बेड पर्याप्त हैं, न स्टाफ का हाल ही बेहतर है। सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह ‘टूटी’ हुई है, जिससे मरीजों और उनके परिजनों की जान सांसत में है। हालात इतने गंभीर हैं कि हर चौथे बेड पर दो-दो मरीज इलाज के लिए मजबूर हैं, जबकि खून की व्यवस्था के लिए परिजन दर-दर भटकने को विवश हैं। दवाओं की कमी ने मरीजों की परेशानी और बढ़ा दी है। वहीं, आठ साल बाद भी सफाई व्यवस्था में सुधार नहीं हुआ। अस्पताल के गलियारों में अब चूहों के साथ कुत्ते और बिल्लियों का कब्जा दिखाई देता है। इस वजह से जनता की उम्मीदों का केंद्र रहा ‘शताब्दी’, अब लापरवाही, अव्यवस्था और दुर्दशा की मिसाल बन गया है।
उल्लेखनीय है कि सिर्फ गंदगी ही नहीं, बल्कि शताब्दी अस्पताल का पूरा सिस्टम अब ओवरलोड से कराह रहा है। ४४४ बेड वाले इस अस्पताल में आज बेड ऑक्युपेंसी १२९ फीसदी तक पहुंच चुकी है यानी हर चौथे बेड पर दो मरीज लेटे हैं। अस्पताल के मंजूर ४४४ में से ४१६ बेड ही चालू हैं, जिनमें ५८ एमआईसीयू, पीआईसीयू और एनआईसीयू बेड शामिल हैं। हालांकि मानसून आते ही स्थिति और भयावह हो जाती है, जब मरीजों को फर्श पर लिटाना या स्ट्रेचर पर घंटों इंतजार कराना आम बात है। वर्ष २०२४ में अस्पताल ने ३९,२४२ भर्ती और ३६,२१९ डिस्चार्ज दर्ज किए, जबकि १,४९९ मरीजों ने यहीं दम तोड़ा। ओपीडी में रोजाना २,००० से २,५०० मरीज आते हैं, जो बरसात के महीनों में तीन हजार से ऊपर पहुंच जाते हैं। यह अस्पताल केवल कांदिवली ही नहीं, बल्कि बोरीवली, मालाड, दहिसर, गोरेगांव, मीरा-भायंदर और पालघर जैसे दूर-दराज के इलाकों के गरीब मरीजों के लिए एकमात्र उम्मीद है।
मरीज को दो घंटे तक नहीं मिला उपचार
अस्पताल की लापरवाही की हद उस वक्त पार हो गई जब एक प्रâेक्चर मरीज को आपातकालीन कक्ष में पहुंचाने के बाद भी करीब दो घंटे तक कोई उपचार नहीं मिला। डॉक्टर और ड्रेसर्स आपस में उलझे रहे कि प्लास्टर कौन लगाए। डॉक्टरों का कहना था कि यह काम ड्रेसर्स करें, जबकि ड्रेसर्स का जवाब था कि डॉक्टरों को ही जिम्मेदारी लेनी चाहिए। इस रस्साकशी में मरीज दर्द से तड़पता रहा, पर किसी को फुर्सत नहीं मिली।
अत्यधिक भीड़ और थका सिस्टम
साल २०१३ में उद्घाटन के साथ यह अस्पताल पश्चिम उपनगरों के लाखों लोगों के लिए अत्याधुनिक स्वास्थ्य सुविधा के रूप में शुरू हुआ था। लेकिन अब यह भीड़, गंदगी, रखरखाव की कमी और कुप्रबंधन की समस्या से जूझ रहा है। गरीब और निम्न-आय वर्ग के लोगों के लिए यह अस्पताल ही एकमात्र सस्ते इलाज का विकल्प है। लेकिन मरीजों की भारी संख्या से व्यवस्था चरमराई हुई है।

स्वच्छता की जमीनी हकीकत
सामाजिक कार्यकर्ता विपुल वोरा के मुताबिक, स्वच्छता अस्पताल की सबसे पुरानी और गंभीर समस्या बनी हुई है। शौचालय गंदे रहते हैं। कॉरिडोर में कचरा और बदबू रहती है। चूहे, आवारा कुत्ते और बिल्लियां अस्पताल के अंदर घूमते रहते हैं। यहां तक कि बाल रोग विभाग में भी यही स्थिति है। बाहर परिसर में भी कुत्तों का झुंड रहता है। अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. अजय गुप्ता के मुताबिक, आवारा कुत्ते एक बड़ी चुनौती हैं। एक समय पर परिसर में २६ कुत्ते पकड़े गए थे। मनपा ने उन्हें पकड़कर नसबंदी कराई। लेकिन कानूनी प्रावधानों के कारण वापस परिसर में छोड़ना पड़ा।

आपातकालीन सेवाएं कब तक चढ़ती रहेंगी अहंकार और जवाबदेही की कमी की भेंट
यह सवाल उठाता है कि आखिर मुंबई जैसे शहर में मनपा द्वारा संचालित अस्पतालों में आपातकालीन सेवाएं कब तक कर्मचारियों के अहंकार और जवाबदेही की कमी की भेंट चढ़ती रहेंगी। शताब्दी अस्पताल में यह पहला मामला नहीं है, बल्कि एक ऐसा सिलसिला बन चुका है, जहां मरीज इलाज से पहले प्रशासनिक झगड़ों और व्यवस्था की सुस्ती से जूझते हैं।

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