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टीबी का नया चेहरा …शरीर के हर हिस्से में पहुंच रहा है ‘खामोश कातिल’!

-२० मामले एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी के आए सामने
-देर से पकड़ में आती है बीमारी सिर्फ दांत, बाल और नाखून रोग से दूर
सामना संवाददाता / मुंबई
टीबी अब सिर्फ फेफड़ों की बीमारी नहीं रही, बल्कि यह शरीर के लगभग हर हिस्से में अपने घातक पंजे पैâला चुकी है। दांत, बाल और नाखून को छोड़कर यह संक्रमण अब मस्तिष्क, हड्डियों, गुर्दे, त्वचा, लसीका ग्रंथियों और प्रजनन अंगों तक पहुंच चुका है। चिकित्सा जगत में इसे एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी कहा जाता है, जो अब टीबी का नया चेहरा बन चुकी है। यह एक ऐसा ‘खामोश कातिल’ है, जो बिना स्पष्ट लक्षणों के शरीर को भीतर से खोखला कर देता है। देशभर में टीबी के कुल रोगियों में जहां ८० प्रतिशत मामले फेफड़ों से जुड़े हैं, वहीं २० प्रतिशत मरीज एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी से जूझ रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, लक्षणों की भ्रामक प्रकृति, समय पर जांच प्रक्रिया और पहचान न हो पाने के कारण यह बीमारी अक्सर देर से पकड़ में आती है, जिससे इलाज और भी कठिन हो जाता है।
मुंबई में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन में वरिष्ठ पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. अनिल कुमार सिंघल ने बताया कि भले ही फुफ्फुसीय टीबी का पता लगाने में तकनीकी और चिकित्सकीय स्तर पर उल्लेखनीय प्रगति हुई हो, लेकिन एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी यानी ईपीटीबी की पहचान और प्रबंधन अब भी एक कठिन और जटिल चुनौती बना हुआ है।
लंबा और जटिल होता है इलाज
विशेषज्ञों का मानना है कि ईपीटीबी का उपचार न केवल लंबा, बल्कि अत्यधिक जटिल होता है, क्योंकि इसकी दवा-प्रतिक्रिया फेफड़ों की टीबी से भिन्न होती है। कई मामलों में संक्रमण कई अंगों तक पहुंचने से स्थाई विकलांगता या अंग-हानि का खतरा बढ़ जाता है। मरीजों में लक्षणों की अस्पष्टता और दवा पालन में कमी इसे नियंत्रण में लाने में सबसे बड़ी बाधाएं हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, समय रहते ईपीटीबी की पहचान और उपचार न किया गया, तो यह टीबी उन्मूलन के राष्ट्रीय लक्ष्य को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है। चिकित्सा समुदाय का फोकस केवल संक्रमण को रोकने पर नहीं, बल्कि सटीक निदान और रोगी के दीर्घकालिक फॉलो-अप पर केंद्रित है, ताकि इस ‘खामोश कातिल’ को जड़ से समाप्त किया जा सके।

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