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अर्थ शास्त्र : बिहार विधानसभा चुनाव-२०२५… अपनी ‘बदनामी’ के लिए भी बदनाम है बिहार..!!

मनोहर मनोज

बिहार में हो रहे विधानसभा चुनावों के पहले दौर का चुनाव प्रचार इन पंक्तियों के लिखे जाने तक समाप्त हो जाएगा, लेकिन अभी पूरा एक पखवाड़ा विधानसभा चुनावों की सरगर्मी जारी रहेगी। इस पूरे समय बल्कि ज्यादातर समय में बिहार की जब भी राजनीतिक चर्चा होती है तो उसका सबसे प्रमुख विषय होता है- बिहार की नाकामियां। क्या सचमुच बिहार इस कदर नाकाम है या वास्तव में बिहार अपनी ‘बदनामी’ के लिए भी बदनाम है?
इन विधानसभा चुनावों में राजनीतिक दलों और मीडिया दोनों के द्वारा बिहार की जो आर्थिक तस्वीर पेश की जा रही है, वह वास्तव में विभ्रम पैदा करनेवाली है क्योंकि पेश किए जा रहे आंकड़ों में प्रदेश की सकल घरेलू उत्पाद, प्रतिव्यक्ति आय, शहरी आबादी का प्रतिशत, औद्योगिक क्षेत्र का योगदान और कमोबेश मानव विकास की साधारण हासिल दर।
जीडीपी!
बिहार की तस्वीर देश के कई प्रदेशों से बेहतर है। दरअसल, बिहार के आर्थिक विकास के आंकड़ों का मिथक इसीलिए सुनहरी तस्वीर नहीं दिखा पाता, क्योंकि बिहार में देश के अन्य राज्यों की तरह बड़े पूंजीपति और कॉरपोरेट समूह नहीं हैं। यहां देश के तीन बड़े राष्ट्रस्तर के व्यवसायियों का कोई भी निवेश नहीं है। यही नहीं बिहार में पटना के अलावा इसके समक्ष समकक्ष का कोई दूसरा शहर नहीं है, क्योंकि झारखंड के अलग होने के बाद दस लाख की आबादी के करीब के तीन बड़े शहर इस प्रदेश से निकल गये हैं। अभी करीब २५ लाख आबादी वाला पटना प्रदेश का एकमात्र बड़ा शहर है, जबकि इसके बाद राज्य के दूसरे बड़े शहर पांच-पांच लाख की आबादी तक भी नहीं पहुंचे हैं। तीसरी बात यह भी है कि बिहार में देश के अन्य राज्यों की तरह कोई भी विशेष औद्योगिक शहर भी नहीं है। साथ ही बिहार में कृषि प्रधान प्रदेश होने की वजह से औद्योगिक विस्तार के लिए ज्यादा भूमि भी उपलब्ध नहीं है। वास्तव में ये चार ऐसे पैâक्टर हैं, जिससे किसी भी राज्य के सकल घरेलू उत्पाद पर बड़ा प्रभावी असर पड़ता है। लेकिन अगर बिहार के समकक्ष देश के अन्य बीमारू राज्यों मसलन- यूपी, एमपी और राजस्थान से इसकी तुलना की जाए तो इन राज्यों की जैसी परिस्थितियां भी बिहार में नहीं हैं। उदाहरण के लिए पड़ोसी राज्य यूपी को ही लें तो यहां राजधानी लखनऊ के समकक्ष करीब आधे दर्जन शहर हैं।
यूपी में राजधानी दिल्ली की सीमा से सटे नोएडा, ग्रेटर नोएडा और गाजियाबाद के रूप में बड़े औद्योगिक शहर मौजूद हैं। यूपी के सकल घरेलू उत्पाद में इन तीन शहरों का अकेले उत्पादन १५ प्रतिशत के बराबर है। इसी तरह एमपी को खनिज और पर्यटन तथा राजस्थान को खनन और पर्यटन का लाभ है। इस तरह का लाभ बिहार के पास नहीं है। अभी बिहार में मुश्किल से १२ प्रतिशत आबादी ही शहर निवासी है, जबकि यूपी की करीब २८ प्रतिशत और करीब-करीब इतनी ही मध्य प्रदेश व राजस्थान की आबादी शहरवासी है।
निष्क्रियता!
बिहार के विकास के पैरोकार शुरू से ही इस बात की बड़ी दुहाई देते रहे हैं कि आजादी के बाद भाड़ा समानीकरण की नीति की वजह से अविभाजित बिहार को अपने स्थानीय खनिज संपदा का कोई विशेष फायदा नहीं मिला, ताकि वे अपने स्थानीय उद्योग, प्रसंस्करण और रोजगार का व्यापक सृजन कर सकते। यही कारण है कि आजादी के शुरुआती दो दशक में देश में सबसे बेहतर गवर्निंग स्टेट का टैग पाने के बावजूद बिहार की मौजूदा स्थिति यह है, जबकि यहां स्थानीय उद्योग, प्रसंस्करण और कुटीर उद्योगों का घना जाल खड़ा हो सकता था।
वर्ष २००५ के बाद बिहार में चौतरफा टर्नअराउंड हुआ, इस बात की स्वीकारोक्ति नीतिश कुमार के विरोधी भी करते हैं। मगर सवाल यही है कि बिजली, सड़क, पानी, कानून व्यवस्था और आपदा राहत के कार्यों के इतर बिहार में औद्योगिक प्लांट, शहरी विस्तार और शिक्षा व रोजगार के व्यापक नेटवर्क क्यों नहीं विकसित हो पाए? कुछ पुरानी चीनी मिलें, सीमेंट और उर्वरक के कारखाने पुन: शुरू होने के अलावा यहां बड़े उद्योग बड़े पैमाने पर नहीं आए। शायद इसका कारण यह भी है कि राज्य सरकार का सदैव मानना रहा है कि कृषि प्रधान राज्य में भूमि अधिग्रहण के जरिये सामाजिक अशांति लाना उचित नहीं है। ये बात सही है कि इस वजह से बिहार में किसानों की आत्महत्या, जमीनों का ऊसर होना तथा औद्योगिक अशांति जैसी स्थिति कभी उत्पन्न नहीं होती। मगर एक मामले में नीतिश सरकार की निष्क्रियता निश्चित रूप से सवालिया निशान पैदा करती है।
बिहार से हर तरह की पढ़ाई के इच्छुक छात्रों के लिए उच्च व पेशेवर शिक्षा का आधारभूत ढांचा सालों बाद भी निर्मित नहीं हो पाया। यही वजह है कि बिहार में औद्योगिक अशांति तो नहीं पैदा होती, लेकिन महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट भी नहीं आए। जबकि आज देश के अनेक राज्य चाहे उत्तराखंड हो, राजस्थान हो, मध्य प्रदेश हो या दक्षिण के सारे राज्य सभी ने अपने यहां एजुकेशन सिटी और इंप्रâास्ट्रक्चर की भरमार कर ली है। लेकिन बिहार में केवल सार्वजनिक क्षेत्र के कुछ चंद शैक्षिक संस्थानों को छोड़ दें तो निश्चित ही स्थिति निराशाजनक है। बिहार से श्रमिकों के पलायन की बात करें तो इसे ऐसे पेश किया जाता है, जैसे ये वहां की कोई कुप्रथा हो और बिहार भारत का हिस्सा न हो, जिस कारण यहां के कामगार बिहार से बाहर जाकर कोई अवैध कार्य कर रहे हों।
ऐसे लोगों को यह बात समझनी चाहिए की समूचा भारत देश अपने आप में एक आर्थिक प्लेटफार्म है, जहां देश के हर इलाके व प्रांत के उत्पादन के सभी कारक अपने-अपने एडवांटेज के मुताबिक, गतिशील रहते हैं, क्योंकि किसी भी अर्थव्यवस्था में श्रमिकों का गतिशील होना एक सकारात्मक स्थिति है। श्रमिकों की मांग और आपूर्ति नियम के तहत बिहार के श्रमिकों की यदि देशव्यापी मांग होती है तो यह बिहार के लिए एक बेहतर बात है। वैसे भी इन लोगों को यह जान लेना चाहिए कि बिहार की अर्थव्यवस्था में श्रमिकों की बाहर से भेजी गई आय की एक बड़ी भूमिका है। साथ ही वहां के ग्रामीण परिवार के जीवन स्तर को बढ़ाने में इसका योगदान उल्लेखनीय है। यह ठीक वैसे ही है जैसे केरल की अर्थव्यवस्था में पेट्रो-डॉलर का योगदान है। इसके अलावा पेशेवर शिक्षा का व्यापक नेटवर्क, शहरीकरण और औद्योगिकीकरण बिहार के विकास के भावी एजेंडे हैं। इससे कोई भी सत्तारूढ़ दल अपने को विलग नहीं रख पाएगा।
(लेखक वरिष्ठ आर्थिक पत्रकार तथा ‘इकोनॉमी इंडिया’ पत्रिका संपादक हैं)

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