धीरेंद्र उपाध्याय
मुंबई और महाराष्ट्र के सरकारी अस्पताल लाखों नागरिकों के लिए जीवनरेखा हैं। ये वे संस्थाएं हैं, जहां आम आदमी, मजदूर, रिक्शाचालक और गरीब परिवार अपने सबसे कठोर समय में सहारे की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं, लेकिन आज यही जीवनरेखा टूटती और बिखरती नजर आ रही है। डॉक्टरों की भारी कमी, दवाइयों का अभाव और टूटी हुई जांच मशीनों के बीच मरीजों की पीड़ा सरकार और प्रशासन की अनदेखी का एक मूक सबूत बनकर रह गई है।
मुंबई और महाराष्ट्र के सरकारी अस्पताल आज गंभीर संकट से जूझ रहे हैं। ये अस्पताल, जो लाखों गरीब और मध्यम वर्गीय नागरिकों के लिए जीवनरेखा समान हैं, वर्तमान में डॉक्टरों की भारी कमी, दवाइयों का अभाव और टूटे हुए मेडिकल उपकरणों के बोझ तले दबे हुए हैं। सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की यह दुर्दशा कोई नई समस्या नहीं है, बल्कि यह एक लंबे समय से चली आ रही व्यवस्थागत उपेक्षा का परिणाम है, जो अब एक गहन संकट का रूप ले चुकी है। इस संकट के मूल में कई गहरी व्यवस्थागत विफलताएं काम कर रही हैं। सबसे पहले, हजारों डॉक्टरों और नर्सों के पद सालों से खाली पड़े हैं, जिसके चलते मौजूदा कर्मचारी अमानवीय कार्यभार उठा रहे हैं। भर्ती प्रक्रियाओं में आनेवाली देरी, राजनीतिक हस्तक्षेप और बजट की कमी इस समस्या के प्रमुख कारण हैं। दूसरे, दवाइयों की आपूर्ति शृंखला पूरी तरह से चरमराई हुई है। टेंडर प्रक्रियाओं में भ्रष्टाचार, खराब इन्वेंट्री प्रबंधन और धन के दुरुपयोग के कारण जरूरी दवाइयां और चिकित्सा सामग्री अस्पतालों तक नहीं पहुंच पाती। तीसरे, महंगे मेडिकल उपकरण महीनों तक खराब पड़े रहते हैं, क्योंकि उनकी मरम्मत के लिए पर्याप्त बजट या प्रशिक्षित तकनीशियन उपलब्ध नहीं होते।
देनी होगी सर्वोच्च प्राथमिकता
सबसे बड़ी आवश्यकता स्वास्थ्य सेवा को वास्तविक राजनीति में प्राथमिकता देनी की है। स्वास्थ्य को राजनीति से ऊपर उठाकर देखना होगा और नागरिकों के स्वास्थ्य के अधिकार को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। एक स्वस्थ समाज के निर्माण के बिना विकास और समृद्धि की कोई भी कहानी अधूरी रहेगी। सरकारी अस्पतालों की स्थिति में सुधार केवल संसाधनों का मामला नहीं है, बल्कि यह मानवीय संवेदनशीलता और राजनीतिक इच्छाशक्ति का प्रश्न है।
स्वास्थ्य बजट में की जानी चाहिए पर्याप्त वृद्धि
इस गंभीर समस्या के समाधान के लिए एक व्यापक और बहु-स्तरीय रणनीति की आवश्यकता है। सबसे पहले स्वास्थ्य बजट में पर्याप्त वृद्धि की जानी चाहिए, जिससे संसाधनों की कमी को दूर किया जा सके। डॉक्टरों और नर्सों के रिक्त पदों को तुरंत भरने के लिए एक विशेष अभियान चलाया जाना चाहिए। साथ ही स्वास्थ्यकर्मियों के कार्यभार को कम करने और उन्हें बेहतर वेतन-सुविधाएं देकर प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। दवाइयों की खरीद और वितरण प्रक्रिया को पारदर्शी और डिजिटल बनाना होगा, ताकि भ्रष्टाचार पर अंकुश लग सके और दवाइयों की उपलब्धता सुनिश्चित हो सके। रियल-टाइम इन्वेंट्री मैनेजमेंट सिस्टम लागू करना भी अत्यंत आवश्यक है।
अस्पताल प्रबंधन को बनना होगा जवाबदेह
उपकरणों के नियमित रखरखाव के लिए निश्चित बजट और तकनीशियनों की नियुक्ति करनी होगी। प्रत्येक बड़े अस्पताल के प्रबंधन को सीधे तौर पर जवाबदेह बनाना होगा और स्वास्थ्य विभाग द्वारा नागरिकों के फीडबैक के आधार पर अस्पतालों का रेटिंग सिस्टम शुरू करना होगा। जिन अधिकारियों का काम अच्छा हो, उन्हें पुरस्कृत किया जाए और जो लापरवाही बरतें, उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाए।
जनमत
सगीर अंसारी
सरकारी अस्पताल लाखों नागरिकों के लिए जीवनरेखा हैं। डॉक्टरों की भारी कमी, दवाइयों का अभाव और टूटी हुई जांच मशीनों के बीच मरीजों की पीड़ा सरकार और प्रशासन की अनदेखी का एक मूक सबूत है। सवाल यह है कि आखिर क्यों इस समस्या को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है और इसका समाधान क्या है?
मरीज भटकते हैं
कई बार सभी आधुनिक जांच और इलाज की सुविधाएं उपलब्ध होते हुए भी प्रबंधन और व्यवस्था के अभाव में सेवा व लाभ जनता तक नहीं पहुंच पाते। मानवीय संवेदनशीलता और सरकारी डॉक्टरों और कर्मचारियों द्वारा किया जानेवाला व्यवहार कई बार अमानवीय और असंवेदनशील होता है। यह संवेदनशीलता के अभाव, लचर व्यवस्था और जवाबदेही न होने का परिणाम है। मरीज और उनके परिजन अक्सर अपने हक के लिए भटकते हैं।
जमील खान
सुविधाएं बढ़ानी चाहिए
हम मिडिल क्लास लोग प्राइवेट अस्पतालों में बिलों की लंबी लिस्ट से डरते हैं, हम इसलिए सरकारी अस्पतालों में जाते हैं, ताकि कम से कम दामों में इलाज हो सके। लेकिन जब हम सरकारी अस्पताल जाते हैं तो इलाज कम और भागना दौड़ना पड़ता है। मुझे ऐसा लगता है कि सरकार को इन सभी समस्याओं पर ध्यान देकर सुविधाएं बढ़ानी चाहिए।
समाजसेवक सागर त्रिपाठी
लेना-देना नहीं
सरकारी अस्पतालों की बदहाली का असली कारण संसाधनों का अभाव नहीं, बल्कि लापरवाह प्रबंधन, कर्मचारियों और डॉक्टरों की मनमानी और संवेदनहीनता है। यह लापरवाही और प्रशासनिक निकम्मापन किसी से छिपा नहीं है। अस्पतालों में गंदगी रहती है। दवाओं किल्लत और आधारभूत सुविधाओं का अभाव और कर्मचारियों की हाजिरी बस औपचारिकता भर रह गई है। अधिकांश सरकारी अस्पताल केवल कागजों पर आधुनिक सुविधाओं से लैस दिखते हैं। हकीकत में मरीजों को इलाज के लिए भटकना पड़ता है। डॉक्टर अपना ‘ड्यूटी टाइम’ पूरा करने आते हैं और मरीजों की परेशानी से कोई लेना-देना नहीं रखते।
-नसीम खान
