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सरोकार : मुंबई के प्रोजेक्ट प्रभावितों की जिंदगी अंधकारमय … विकास की रफ्तार में दब गई झुग्गियों की आवाज

नागेंद्र शुक्ला

मुंबई में मेट्रो, रेल, सड़क और नाले जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स तेजी से चल रहे हैं, लेकिन इस विकास की चमक के पीछे हजारों गरीब परिवारों का जीवन अंधकारमय हो गया है।

हर साल सैकड़ों झोपड़पट्टीवासी अपने घर खो दे रहे हैं, बदले में जो घर उन्हें दिए जाते हैं, वे न तो घर हैं, न ही रहने योग्य जगहें। प्रोजेक्ट प्रभावित शब्द सुनते ही प्रशासन की मानसिकता यह होती है जैसे कि ये प्रोजेक्ट प्रभावित लोग अपराधी हैं।
गौरतलब है कि मुंबई में विकास की अंधी दौड़ में इंसान पीछे छूटा जा रहा है। विकास का नाम देकर वर्षों से अपने कुनबे के साथ रहनेवाले परिवारों को जबरन मनपा और एमएमआरडीए द्वारा बनाए गए माहुल और कुर्ला प्रीमियर के घरों में इन परिवारों को जबरन धकेल दिया जा रहा है। इन घरों की हालत नरक जैसी है, जहां पानी, सीवेज, सड़क, स्वास्थ्य, स्कूल जैसी मूलभूत सुविधाएं नहीं हैं। इतना ही नहीं, माहुल में रासायनिक प्रदूषण और दुर्गंध के कारण लोगों को सांस की बीमारियां हो रही हैं। यहां तक कि नगरपालिका कर्मचारी भी यहां रहने से इनकार कर चुके हैं, जिसके चलते हजारों फ्लैट आज भी खाली पड़े हैं।
अधिकारियों के लिए मलबार हिल, गरीबों के लिए माहुल। स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि अधिकारी खुद आलीशान घरों में रहते हैं, लेकिन जब गरीबों के घर की बात आती है तो उन्हें गंदगी, दुर्गंध और बीमारियों से भरे इलाकों में धकेल दिया जाता है। कई जगहों पर तो पुलिस की मदद से लोगों से जबरन घर खाली करवाए जाने की घटनाएँ सामने आई हैं।

नागरिकों की मांग
पुनर्वास कॉलोनियों का स्वतंत्र सर्वे कराया जाए। हर घर में मूलभूत सुविधाओं की गारंटी दी जाए। माहुल और कुर्ला जैसे इलाकों से परिवारों को सुरक्षित जगहों पर बसाया जाए।

भ्रष्टाचार की जड़ में
अफसरशाही की मिलीभगत
घर आवंटन में फर्जी लाभार्थी जोड़ने, घूस लेकर नाम हटाने और मलाईदार पद पाने जैसी बातें अब आम हैं। अधिकारी एक प्रोजेक्ट से दूसरे में ट्रांसफर होकर खुद का पुनर्वास कर लेते हैं, पर गरीबों की फाइलें सालों तक दफ्तरों में धूल खाती रहती हैं। गरीबों के घर तोड़े जा रहे हैं, लेकिन घोटालेबाज अफसर अपने पद मजबूत कर रहे हैं। वहीं शहरी विकास विशेषज्ञों का कहना है कि यदि प्रशासन ने अभी से योजना बनाते समय रोशनी, हवा, स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र और परिवहन जैसी सुविधाओं का ध्यान नहीं रखा तो ये इमारतें अगले १० वर्षों में पूरी तरह झोपड़पट्टियों में बदल जाएंगी।

पुनर्वास की नई पहचान- खड़ी झोपड़पट्टियां
कुर्ला, धारावी, माहुल और भांडुप जैसी जगहों पर बनी पुनर्वास कॉलोनियां आज वर्टिकल स्लम्स बन चुकी हैं। यहां गलियां इतनी तंग हैं कि धूप और हवा घरों तक नहीं पहुंचती। बच्चे खेलने के लिए जगह ढूंढते हैं और बुज़ुर्ग सीलन से भरे कमरों में दिन काटते हैं। क्षय रोग (टीबी) और फेफड़ों की बीमारियां लगातार बढ़ रही हैं।

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