महाराष्ट्र मंत्रिमंडल में शिंदे गुट की कीमत चने-कुरमुरे जितनी भी नहीं है। फिर भी ये चने-कुरमुरे किसी न किसी मुद्दे पर बड़बड़ाते रहते हैं। मुंबई में ‘हम नाराज हैं’ कहने वाले और अमित शाह के पैर पखारने दिल्ली जाने वाले शिंदे गुट की नाराजगी मंगलवार को फट पड़ी और वैâबिनेट बैठक का बहिष्कार कर दिया। क्या वाकई इन लोगों में मुख्यमंत्री फडणवीस के मंत्रिमंडल का बहिष्कार करने की हिम्मत है? शिंदे की पार्टी के लोगों को भाजपा तोड़ रही है। राज्य में चल रहे स्थानीय निकाय चुनावों में भाजपा अपने सहयोगियों को कमजोर करने के लिए ‘ऑपरेशन लोटस’ शुरू कर रही है। बेशक, इसमें नया क्या है? भाजपा की राजनीति दशकों से इसी तरह चलती आ रही है। फिर भी, इस तोड़-फोड़ का सदमा मिंधे गुट को ज्यादा लगा होगा। इसी बेचैनी में नाराजगी के नाटक का एक और असफल प्रयोग हुआ होगा। शिंदे खुद पहले भी नाराजगी की ऐसी नौटंकी प्रस्तुत कर चुके हैं। कभी वो सातारा जाकर अपने ही खेत में गुस्से से बैठ जाते हैं, तो कभी दिल्ली जाकर मोदी-शाह के सामने अपना रोना रोते हैं। लेकिन इसका भाजपा पर कितना असर पड़ा है, ये जगह-जगह भाजपा द्वारा की जा रही पार्टी विभाजन के खेल से साफ जाहिर है। फिर भी मंगलवार की वैâबिनेट बैठक में शिंदे गुट ने
नाराजगी नौटंकी की नई प्रस्तुति
की ही। वैâबिनेट बैठक के बाद, शिंदे के नाराज मंत्रियों ने मुख्यमंत्री से मुलाकात की और यह कहते हुए कि भाजपा गठबंधन धर्म का पालन नहीं कर रही है, बिना आवाज के फुस्स हो चुके पटाखे फोड़े। कहते हैं कि मुख्यमंत्री ने अपनी विशेष ‘फडणवीस मुस्कान’ के साथ, उनके पटाखों की बाती निकाल ली और शिंदे गुट को उनके द्वारा किए गए पार्टी तोड़-फोड़ का आईना दिखाया। सच या झूठ, केवल वे दोनों ही जानते हैं, लेकिन बाद में भाजपा के चंद्रशेखर बावनकुले ने इस संबंध में एक विशेष ‘भाजपाई’ खुलासा किया। ‘भाजपाई’ का अर्थ है पहले गले से गले मिलना फिर धीरे-धीरे उसी गले को काटना और फिर दिखावा करना कि उन्होंने कुछ किया ही नहीं। मुख्यमंत्री खुद एक तरफ कहते हैं कि महागठबंधन अभेद्य है और दूसरी तरफ यह कहकर ‘भेद’ करते हैं कि गठबंधन-आघाड़ी के पैâसले स्थानीय स्तर पर होंगे। पार्टी की बैठक में बोलते हुए, वे पदाधिकारियों को ‘याद रखना सहयोगी दल तुम्हारे हैं’ कहते हुए उपदेशामृत देते हैं और अगर वे ही पदाधिकारी मित्रपक्ष तोड़ दें, तो आंख मूंद लेते हैं। अब मंगलवार की नाराजगी के बाद भी शिंदे गुट को चार बातें ‘जो पहले हुआ सो हो गया, अब से महायुति में शामिल पार्टी नेता एक-दूसरे की पार्टियों में शामिल नहीं होंगे’, समझाते हुए उन्हें विदा कर दिया। यह खुलासा फिर से मुख्यमंत्री ने नहीं, बल्कि भाजपा के मंत्री बावनकुले ने किया। उन्होंने ऐसा क्यों किया? यह सवाल नहीं है, लेकिन इस मौके पर भाजपा का बहुरूपिया चेहरा एक बार फिर सामने आ गया। असल में जिसने अपनी मां की पीठ में छुरा घोंपा और
सत्ता हेतु किसी और के साए में
चले गए हो क्या उन्हें तोड़-फोड़ पर अपना गुस्सा निकालने का, नाराजगी का राग अलापने का नैतिक अधिकार है? आप खुद ही इसे खो चुके हैं और भाजपा यह बखूबी जानती है। इसीलिए वे पहले तोड़ते हैं और फिर ‘बस, अब और नहीं’ कहकर मरहम पट्टी की नौटंकी करते हैं। भाजपा ने जो ‘अब और नहीं’ की फूंक मारी है, वह इसी जातिकुल का है और शिंदे और उसके चेले-चपाटों के पास दूसरा विकल्प ही कहां है? इसलिए ‘ऑपरेशन लोटस’ आदि के नाम पर आपका गला फाड़ने का कोई मतलब नहीं है। आप अपनी खुशी से पानी के नीचे ‘कमल’ के अदृश्य जाल में फंस गए हैं। वह जाल धीरे-धीरे आपका गला घोंटेगा और पानी पर ‘कमल’ शान से खिलेगा। भाजपा ने जब आपको तोड़ा, तो खुशी और सत्ता के लालच में खुद को ही तुड़वा दिया। अब यह कहकर कि भाजपा तुम्हारे गुट को तोड़ रही है, स्यापा करने से क्या फायदा? आपकी नाराजगी की धूल बेरंग है और हर बार यह धूल उड़ते-उड़ते नीचे बैठ जाती है। भाजपा वालों की आंखों में जरा भी नहीं जाती। आप सत्ता में जरूर हैं, लेकिन भाजपा वाले न तो आपसे ‘राजी’ करने की जहमत उठाते हैं और न ही आपकी ‘नाराजगी’ को गंभीरता से लेते हैं। शिंदे गुट ने जो बोया है, उसका फल उन्हें मिल रहा है। इसलिए ‘अपने कर्मों का फल भोगो’ हम तो बस इतना ही कह सकते हैं।
