करोड़ों की आबादी में लगभग ९२,३०० टॉयलेट
द्रुप्ति झा / मुंबई
हर साल १९ नवंबर को शौचालय दिवस मनाया जाता है और इस बार भी बुधवार को शौचालय दिवस मनाया गया, लेकिन हर बार की तरह इस बार भी मुंबई की महिलाओं ने शौचालय की संख्या में कमी पड़ने से सरकार के प्रति नाराजगी जाहिर की है। भले ही हर साल विश्व शौचालय दिवस मनाया जाता है, लेकिन मुंबई जैसी राजधानी में अभी भी शौचालयों की भारी कमी है और जो शौचालय हैं भी, वे या तो बेहद गंदे हैं या फिर जर्जर। शहर के सभी सार्वजनिक शौचालयों की हालत इतनी खराब है कि मुंबईकर भी वहां जाना नहीं चाहते। शौचालय आखिर है कहां? किसी को पूछने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी। क्योंकि शौचालय के आस-पास पैâली दुर्गंध से सबको शौचालय का पता चल जाता है।
मुंबई में सार्वजनिक शौचालय पहले सुलभ शौचालय के नाम से संचालित होते थे। आज भी १,२५० से ज्यादा सार्वजनिक शौचालय निजी संस्थाओं द्वारा संचालित किए जाते हैं। इनमें से कुछ शौचालय इस्तेमाल करने लायक हैं। इसके अलावा, कुछ संस्थानों के शौचालय भी बहुत अच्छे नहीं हैं। फिर भी लाखों मुंबईकरों के साथ-साथ देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों को गंदे और बदबूदार शौचालयों का इस्तेमाल करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। एक सर्वेक्षण के अनुसार, पानी और बिजली से रहित शौचालयों की संख्या ४९ प्रतिशत है। एक रिपोर्ट के अनुसार, मुंबई शहर और उपनगरों में झुग्गी-झोपड़ियों सहित वर्तमान में लगभग ९२,३०० शौचालय हैं।
बदबूदार शौचालयों का
इस्तेमाल करने पर लोग मजबूर
महिलाओं के लिए शौचालयों की भारी कमी है, हर पांच में से केवल एक सार्वजनिक शौचालय महिलाओं के लिए उपलब्ध है। प्रत्येक पुरुष सामुदायिक शौचालय का उपयोग ८६ पुरुष करते हैं, जबकि प्रत्येक महिला शौचालय का उपयोग ८१ महिलाएं करती हैं। महिला यात्री रीता जाधव ने कहा सार्वजनिक शौचालय में पांच रुपए लिए जाते हैं, लेकिन साफ सफाई कुछ नहीं, कभी पानी नहीं तो कभी दरवाजे टूटे तो कभी कूड़ों के ढेर ही मिलते हैं, नाक पर रूमाल रख कर जाना पड़ता है, मजबूरी होती है हमारे लिए उस नर्क में जाना।
