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न्यूज स्कैन : डायन बताकर मार डाला, पुलिस आई और चली गई

खुशबू सिंह

बिहार के नवादा जिले से इंसानियत को शर्मसार कर देनेवाला ये मामला अगस्त महीने का है, जहां एक ७० वर्षीय बुजुर्ग दंपति को अंधविश्वास के नाम पर ऐसी बर्बरता का शिकार बनाया गया कि पति की मौत हो गई और पत्नी गंभीर हालत में अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच पहुंच गई। ये घटना हिसुआ थाना क्षेत्र के पांचूगढ़ मुसहरी की है, जहां मोहल्लेवालों ने दंपति को डायन बताकर
मॉब लिंचिंग को अंजाम दिया।
सिर मुंडवाया, चूना लगाया और जूते-चप्पल की माला पहनाई
स्थानीय लोगों ने पहले ७० वर्षीय गया मांझी और उनकी पत्नी को डायन बताकर उनके साथ क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं। बुजुर्ग महिला का जबरन सिर मुंडवाया गया, उसके सिर पर चूना लगाया गया और फिर दोनों के गले में जूते-चप्पलों की माला डालकर पूरे मोहल्ले में घुमाया गया। आरोपियों ने महिला को पेशाब तक पिलाया और रास्ते में बेरहमी से पीटते हुए पूरे इलाके में जुलूस निकाला।
विरोध करने पर पति की हत्या
इस अमानवीय कृत्य का विरोध करने पर भीड़ ने गया मांझी को इतनी बुरी तरह पीटा कि उनकी मौके पर ही मौत हो गई। उनकी पत्नी गंभीर रूप से घायल होकर जमीन पर पड़ी रही, लेकिन बेरहम भीड़ का कहर थमता नहीं दिखा। बताया जा रहा है कि अगली सुबह भीड़ ने महिला को उसके मृत पति के साथ जिंदा जलाने की तैयारी कर ली थी।
पुलिस की बड़ी लापरवाही,
मौके से लौट गई टीम
मिली जानकारी के अनुसार, घटना की जानकारी उस रात ११२ पुलिस टीम को दी गई थी। हैरानी की बात है कि पुलिस मौके पर तो पहुंची, लेकिन भीड़ को देखकर बिना किसी कार्रवाई के चुपचाप वापस लौट गई। यदि समय पर हस्तक्षेप होता, तो शायद गया मांझी की जान बच सकती थी। बाद में जब स्थिति पूरी तरह बिगड़ गई, तब पुलिस को फिर से सूचना दी गई।
इसके बाद हिसुआ थाना की टीम मौके पर पहुंची और शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया। गंभीर रूप से घायल महिला को हिसुआ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराया गया।
कई आरोपियों की पहचान
हिसुआ थाना में तैनात एसआई रूपा कुमारी ने बताया कि दंपति को डायन बताकर भीड़ ने न सिर्फ मारपीट की, बल्कि उन्हें जिंदा जलाने का प्रयास भी किया। उन्होंने ये भी पुष्टि की कि दंपत्ति का सिर मुंडवाकर और जूते-चप्पल की माला पहनाकर पूरे मोहल्ले में घुमाया गया था। शव और घायल महिला को श्मशान घाट के पास से बरामद किया गया।
यह घटना एक बार फिर इस कड़वी हकीकत को उजागर करती है कि अंधविश्वास और भीड़तंत्र आज भी समाज के लिए खतरनाक रूप से जिंदा है।

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