सूफी खान
मदीना में मस्जिद ए नबवी से महज २५ किलोमीटर दूर हुए बस हादसे में भारत के हैदराबाद और उसके आसपास के जिलों से उमरा के लिए गए जायरीन की मौत हो गई थी। मदीना में मस्जिद ए नबवी से महज २५ किलोमीटर दूर हुए बस हादसे में जान गंवाने वाले भारत के हैदराबाद और उसके आसपास के जिलों से उमरा के लिए गए जायरीन की मौत हो गई थी। मक्का से मदीना जा रहे उमरा यात्रियों की बस एक ऑयल टैंकर से टकरा गई और बस में भयंकर आग लग गई। अब बड़ी खबर आ रही है कि मारे गए लोगों की तदफीन यानी आखिरी रसूमात या यूं कहें कि अंतिम संस्कार जन्नतुल बकी में हो सकता है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, फिलहाल इस हादसे में जान गंवाने वाले लोगों की डीएनए जांच की जा रही है और दूसरी फॉर्मेलिटी पूरी की जी रही हैं।
हादसे में जान गंवाने वाले जायरीन की पहचान करने के लिए हर मुमकिन कोशिश की जा रही है, लेकिन अधिकारियों को कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि दुर्घटना में लाशें पूरी तरह जल गई हैं। मदीना के पास एक ईंधन टैंकर से टकराने के कारण ४४ भारतीयों की मौत हो गई थी। जिनमें से ४२ मुसलमान तेलंगाना के थे। हादसे में बस में सवार यात्रियों में से केवल एक भारतीय जिंदा बचा है, जो अभी इलाज के लिए अस्पताल में है। लेकिन मरहूमीन को जन्नतुल बकी में जगह मिलेगी, इस खबर को सुनकर दुखी परिजनों को थोड़ी राहत जरूर मिल सकती है। मदीने में गुंबदे खजरा के पास वो जगह यहां दुनिया का हर मुसलमान दफन होने की ख्वाहिश रखता है। मस्जिद ए नबवी के परिसर में वो कब्रिस्तान जहां आज भी दुनिया भर से लाखों मुसलमान पहुंचते हैं। कहा जाता है कि पैगम्बरे इस्लाम ने अपने असहाब की तदफीन यानी अपने लोगों को मौत के बाद दफनाने के लिए खुद इस जगह का चुनाव किया था।
हालांकि मदीने में मस्जिद ए नबवी और गुम्बद ऐ खिजरा के पीछे जन्नतुल बकी प्रबंधन की तरफ से अभी तक कोई अधिकारिक बयान नहीं आया है। लेकिन इस सबसे पहले इस्लामिक कब्रिस्तान में मुमकिन है कि मदीना हादसे में जान गंवाने वाले भारतीयों को दफनाया जाए। गौरतलब है कि हज या उमरा के लिए जाने वाले किसी भी देश के मुस्लिम नागरिक से सऊदी अरब सरकार पहले ही एक फार्म पर दस्तखत ले लेती है कि अगर सऊदी में उसकी किसी भी हादसे में जान जाती है या फिर वो बीमारी का शिकार होकर काल के गाल में समाता है तो उसकी लाश सऊदी में ही दफनाई जाएगी। उसके देश वापस नहीं भेजी जाएगी। यही वजह है कि मदीना में हुए बस हादसे के शिकार लोगों का शव भी भारत नहीं आएगा, मुमकिन है कि उन्हे जन्नतुल बकी कब्रिस्तान में जगह मिल जाए।
साल २०२४ में भी हज के दौरान शदीद गर्मी की मार से बेहाल कई आजमिन ए हज ने अल्लाह के घर के नजदीक शहादत का पैâज हासिल किया था। मक्का में तेज गर्मी की मार से १००० तीर्थयात्रियों ने दम तोड़ दिया था। जिनमें से हिंदुस्तानी मुसलमानों की तादाद भी ९० पहुंच गई थी। उस वक्त मक्का शहर में टेंपरेचर ५२ डिग्री सेल्सियस पहुंच गया था। जिसकी वजह से हाजियों को डिहाइड्रेशन और सन स्ट्रोक की शिकायत पेश आई। लेकिन भारतीय हज यात्रियों की डेड बॉडी को भारत नहीं लाया जा सका बल्कि मुकद्दस सरजमीं में ही सुपुर्द ए खाक किया गया था।
