श्रीकिशोर शाही
फरीदाबाद के अल-फलाह यूनिवर्सिटी से जुड़े कुछ डॉक्टरों पर हाल ही में गंभीर आतंकी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप सामने आए। इन्हीं की करतूत ने दिल्ली में हुए कार ब्लास्ट जैसी त्रासदी को जन्म दिया, जिसमें कई निर्दोष जानें चली गईं। यह घटना एक गहरे सवाल के साथ हमारे सामने खड़ी होती है, अगर जान बचाने की शपथ लेने वाले ही जान लेने लगें, तो समाज किस पर भरोसा करे? सफेद कोट की पवित्रता पर यह बड़ा दाग है, क्योंकि डॉक्टरी पेशा सदियों से विश्वास, सेवा और करुणा का पर्याय माना जाता रहा है।
जांच एजेंसियों के रडार पर अब ऐसे लगभग २०० डॉक्टर होने की खबरें भी सामने आ रही हैं। सोशल मीडिया पर तमाम तरह की चीजें वायरल हो रही हैं। इससे अब आम आदमी का मन और भी सशंकित हो उठा है। क्या यह हमारी शिक्षा-प्रणाली की विफलता है? या वह समाज, जो डिग्री तो दे देता है पर चरित्र की प्रैक्टिकल फाइल कभी नहीं खोलता? शायद कमी वहीं रह गई, जहां हमने मान लिया कि डिग्री मिलते ही इंसान अपने आप ‘मानवता-विशेषज्ञ’ बन जाता है।
डॉक्टर डेथ जैसे कुछ अपवाद पूरे पेशे को कटघरे में खड़ा कर देते हैं, जबकि लाखों ईमानदार डॉक्टर आज भी दिन-रात सेवा में लगे हैं। पर भरोसा वह तो एक बार टूटे, तो फिर स्टेथोस्कोप से भी नहीं जुड़ता। यह सब इसलिए भी खतरनाक है क्योंकि चिकित्सा-पेशा सिर्फ दवाइयों और सर्जरी तक सीमित नहीं, यह विश्वास पर चलता है। एक बार यदि मरीज का भरोसा हिल गया, तो अस्पताल का सबसे महंगा उपकरण भी उसकी धड़कनों को शांत नहीं कर सकता। ऐसे समय में जरूरी है कि सिस्टम सिर्फ गिरफ्तारी और आरोप तक सीमित न रहे, बल्कि यह भी समझे कि संदेह का वायरस समाज में बहुत तेजी से पैâलता है। अस्पताल के हर कॉरिडोर में जो खामोशी गूंजती है, वह सिर्फ मरीज की नहीं, बल्कि डॉक्टर और पेशे के आत्मसम्मान की भी होती है। हमें यह तय करना होगा कि हम अपराधियों को पकड़ें या पेशे पर शक की धूल जमने दें। क्योंकि अगर कल को मेहनत और नीयत वाले डॉक्टर भी शक की निगाह से देखे जाने लगे, तो इलाज से ज्यादा खतरा अविश्वास का हो जाएगा।
