विमल मिश्र
मुंबई और नवी मुंबई में मेट्रो सेवा शुरू हुए अरसा बीत चुका है। जल्दी ही ठाणे के साथ मुंबई के दूसरे ठिकाने भी मेट्रो का लाभ उठाने लगेंगे। इस सेवा का पूर्ण लाभ तभी मिलेगा, जब हम मेट्रो शिष्टाचार का पालन करेंगे।
मुंबई की पहली अंडरग्राउंड मेट्रो रेल को अपना आपरेशन पूरी तरह शुरू किये एक महीने से ज्यादा हो गया है, पर परिवहन के इस आधुनिकतम माध्यम को लेकर भी वे ही दिक्कतें पेश आने लगी हैं, जो महानगर के सार्वजनिक स्थानों को लंबे समय से परेशान कर रही हैं: अतिक्रमण, गंदगी, अनुशासनहीनता और असभ्य व्यवहार। खूबसूरत मेट्रो रेल मुंबई की शान है, पर इसके कोच व साफ-सुथरे, सुव्यवस्थित स्टेशनों के प्लेटफार्मों व परिसर के बाहर पान व गुटखे की पीक के दाग और ‘तांत्रिक बाबा’ के विज्ञापन नजर आने लगे हैं। एक ऐसी हिमाकत, जिसे करने के बारे में सिंगापुर, टोक्यो, दुबई और अमेरिका व यूरोप में सोचा भी नहीं जा सकता।
बीते गुरुवार सुबह के पीक आवर में जब हम छत्रपति शिवाजी महाराज मेट्रो स्टेशन पर थे तो हमने प्रत्यक्ष देखा स्नैक्स, ट्रिंकेट और मोबाइल एक्सेसरीज बेचने वाले अवैध फेरीवाले किस तरह मेट्रो परिसर के बाहर मजमा लगाए हुए थे। एक्वा लाइन-३ के एंट्री और एग्जिट पॉइंट पर उनके कब्जे से रास्ते तंग हो गए थे, जो आने-जाने वालों को परेशानी की वजह तो थे ही, सुरक्षा के लिए भी खतरा पैदा कर रहे थे। यही हालात आस-पास की अप्रोच रोड और फुटपाथ पर थे, जो पहले से ही अवैध हॉकरों के कब्जे से परेशान हैं। एक फेरीवाले ने शान बघारी, ‘बीएमसी वाले चेकिंग करके हमें हटा देते हैं, पर उनके जाते ही हम फिर आ जाते हैं। आखिर रोजी-रोटी है यह हमारी।’ यही हालत शाम के पीक ऑवर में थी। मुंबई सेंट्रल जैसे व्यस्त मेट्रो स्टेशनों का हाल तो सबसे बुरा है।
परेशान हाल यात्री रमेश वैद्य ने बताया, ‘हमने मुंबई एक मॉडर्न और कुशल मेट्रो सिस्टम बनाने के लिए करदाताओं के ३७,००० करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च किए, इस पर भी यात्रियों का यह हाल है। बीएमसी और पुलिस में कार्रवाई करने की इच्छाशक्ति ही नहीं दिखती।’ अन्य यात्री सीमा दलवी ने बताया, ‘सरकार को नए प्रोजेक्ट्स की घोषणा करने के बजाय मौजूदा प्रोजेक्ट्स पर ठीक से अमल करने पर ध्यान देना चाहिए।’ एक अन्य यात्री ने एक कदम आगे बढ़ते हुए यह सुझाव दे डाला, ‘हमें इन अवैध धंधेबाजों का बहिष्कार कर देना चाहिए।’
दुश्वारियों का सामना
यह तो मेट्रो परिसर के बाहर की हालत है। मेट्रो-३ और दूसरी मेट्रो के ये यात्री परिसर के भीतर भी सामना कर रहे हैं दूसरी दुश्वारियों का। जोर-जोर से बात करना, फोन स्पीकर मोड पर और म्यूजिक बगैर ईयर फोन के सुनना दूसरे देशों में अशिष्ट व्यवहार माना जाता रहे, पर हमारे देश की मेट्रो में यह आम बात है। कोई बात कर रहा होता है, कोई फिल्म, क्रिकेट मैच या रील देख रहा होता है तो कोई गाने सुन रहा या विडियो देख रहा होता है- आवाज के साथ और बगैर ईयरफोन या ईयर बड के। जापान, कोरिया, चीन, ब्रिटेन, अमेरिका और यूरोप सहित कई जगहें ऐसी हैं, जहां मेट्रो में फोन पर बात करना अशिष्ट माना जाता है। पूरे सफर में फोन ‘साइलेंट मोड’ में रखा जाता है और जरूरी हुआ तो मैसेज के जरिये बात होती है।
मेट्रो यात्री हड़बड़ी, लापरवाही और सही जानकारी के अभाव में गलतियां करते रहते हैं, जिससे दूसरे यात्रियों के साथ मेट्रो के परिचालन में भी बाधाएं आती हैं। सीढ़ी, एस्केलेटर या लिफ्ट में चढ़ने से लेकर डिब्बे में चढ़ने-उतरते समय हम स्व-अनुशासन का पालन नहीं करते। प्लेटफार्म पर चढ़ने-उतरने वालों के लिए तीर के निशान बने हुए होते हैं। प्रवेश और निकास के समय यात्री अगर पीली रेखा से आगे बढ़ जाते हैं तो पल्ले नहीं खुलते।
चीन में पदस्थ रह चुके भाषाविज्ञानी व पत्रकार-लेखक अजय ब्रह्मात्मज बताते हैं, ‘इन परेशानियों की सबसे बड़ी वजह है कि हमें मेट्रो शिष्टाचार के बारे में कायदे से बताया ही नहीं गया है।’ उनके अनुसार, बस, थोड़ी सी सावधानी बरतकर हम आधुनिक सभ्य नागरिक समाज में दूसरे देशों में यात्रियों द्वारा स्वीकृत सलीके और शिष्टाचार के तौर-तरीकों का आसानी से अनुसरण कर सकते हैं। उनके कुछ सुझाव इस प्रकार हैं:
ट्रेन आने पर दरवाजों के खुलते ही डिब्बे में घुसने का प्रयास नहीं करें। उतरने वाले यात्रियों को प्राथमिकता दें। जब वे उतरेंगे, तभी तो आपके लिए भीतर जगह खाली होगी।
सीढ़ी और एस्केलेटर पर बाई तरफ खड़े रहें। दायीं तरफ की जगह खाली रखें, ताकि कोई आगे जा सके। किसी के साथ सफर कर रहे हों तो आगे-पीछे खड़े हों, न कि अगल-बगल।
वरिष्ठ नागरिकों, दिव्यांगों, गर्भवती या बच्चों के साथ सफर कर रही औरतों के लिए आरक्षित सीटों पर उन्हें बैठने दें। लिफ्ट में भी उन्हें और सामान लेकर चल रहे यात्रियों को पहले जाने दें।
प्लेटफार्म और डिब्बे सहित मेट्रो परिसर में खाना – पीना, थूकना और धूम्रपान मना होता है। कचरे को फैलाएं नहीं, कचरा पेटी में ही डालें। बारिश के दिनों में छाते के लिए प्लास्टिक कवर रखें।
बैकपैक पीछे और सूटकेस आदि भारी सामान सीटों के बीच में न रखें।
डिब्बे में बीच के खंभे और हैंडल्ा आपकी सुरक्षा और सुविधा के लिए ही लगाए गए हैं। इन्हें पकड़ कर न खड़े रहेंगे तो ट्रेन के रुकने और छूटने के समय झटका लगकर गिरने की नौबत आ सकती है।
आज दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई, लखनऊ, बेंगलुरु, हैदराबाद समेत देश के २० शहरों में मेट्रो की सुविधा है। महाराष्ट्र के भी पुणे, नागपुर सरीखे दूसरे शहर भी इस सेवा से जुड़ चुके हैं। अनुमानतः पूरे देश में इस समय लगभग एक करोड़ से अधिक यात्री मेट्रो से रोजाना सफर करते हैं। यह संख्या अगले कुछ सालों में दोगुनी से भी ज्यादा हो जाने वाली हैं। अगर हम स्व-विवेक का पालन करें तो हमारी मेट्रो यात्रा और आनंददायक हो जाएगी। मेट्रो अधिकारियों को भी चाहिए कि वे अभियान चलाकर मुंबईकरों को इस बारे में जागरूक बनाएं।
(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर
संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)
