हृदयनारायण दीक्षित
विश्व का कोई भी राष्ट्र-राज्य अपने गौरवशाली अतीत और पूर्वजों को अपमानित नहीं करता, लेकिन भारत का गौरवशाली अतीत, पूर्वज और संस्कृति तथाकथित सेकुलर लोगों के निशाने पर है। सेकुलरवादियों ने देश की संस्कृति और सभ्यता को अपमानित करने वाली साजिश रची। इनकी मानें तो भारत के मूल निवासी ‘हम भारत के लोग’ विदेशी हैं और पूर्वज आर्य पश्चिम एशिया से भारत पर चढ़ आए। उन्होंने हड़प्पा सभ्यता को नष्ट किया। वे बर्बर हमलावर थे। बच्चे यही इतिहास पढ़ते हैं। इतिहास राष्ट्र का जीवन चरित्र और संस्कृति प्राण होता है। इतिहास में सार और असार, अनुकरणीय और अकरणीय, दोनों ही तत्व होते हैं। करणीय, अकरणीय और अनुकरणीय का बोध संस्कृति देती है। इतिहास बेशक बीती हुई गाथा है, लेकिन ‘इतिहास बोध’ अतीत से शक्ति प्राप्त करने का महाविज्ञान है। इतिहास की वैज्ञानिक समझ से वर्तमान को बदलना मार्क्सवादी लक्ष्य था, उन्होंने वर्तमान की निजी जरूरतों के मुताबिक, इतिहास बदला। यही काम अंग्रेजों ने किया। उन्होंने अंग्रेजी राज को जायज ठहराने के लिए भारत का नया इतिहास लिखाया। इतिहास से सीखकर वर्तमान बदलना अच्छा विचार है, लेकिन अपनी आवश्यकतानुसार इतिहास बदलना महापाप है। इतिहास ने उन्हें दंडित किया। मार्क्सवादी इतिहास शेष रहे, लेकिन दोनों के विषाणु भारत में आज भी मौजूद हैं। भारत पर अंग्रेजी शासन के लिए भाषा, इतिहास, सभ्यता और संस्कृति का ज्ञान जरूरी था। बेशक पश्चिमी विद्वानों ने मेहनत की। पश्चिम की संस्कृति का मूलाधार यूनान था, लेकिन विलियम जोंस ने थर्ड एनुअल डिसकोर्स एशियाटिक रिसर्चेज में कहा, ‘यूनानी दार्शनिक पाइथागोरस और प्लेटो के उत्कृष्ट अनुभव प्राचीन भारतीय ऋषियों के अनुरूप थे। हिंदू कला व शौर्य में विलक्षण थे।
प्रशासन में सुयोग्य, विधि निर्माण में बुद्धिमान और ज्ञान में प्रवीण थे। डेविड कोफ जैसे विद्वानों को भारतीय समाज वैदिक आदर्शों से भटका हुआ लगा। वैदिक काल में मूर्ति पूजा नहीं थी।’ यह अध्ययन ईसाई मिशनरियों के लिए खतरनाक था। उनकी नजर में शासन के लिए अंग्रेजी और परमात्मा के मार्ग के लिए प्रभु ईशु ही विकल्प थे। इस चुनौती से जूझे एक अंग्रेज जेएस मिल। जेएस मिल ने ‘हिस्ट्री ऑफ ब्रिटिश इंडिया’ लिखकर भारत के सनातन ज्ञान पर हल्ला बोला। इतिहास में उन्हें ‘उपयोगितावादी चिंतक’ की सही संज्ञा मिली।
बच्चे पढ़ें कि आर्यों ने ईरान के रास्ते आकर हड़प्पा सभ्यता नष्ट की। किले तोड़े। वे चरवाहे और लुटेरे थे। मोहन जोदड़ो और हड़प्पावासी सभ्य थे। हड़प्पा सभ्यता का पतन दरअसल १७५० ई. पूर्व के आस-पास हुआ। कालीबंगा की खोदाई से मिले तथ्यों में यही समय सरस्वती के सूखने का भी है। ऋग्वेद में सरस्वती भरी पूरी वेगवती आराध्य नदी है। ऋग्वेद के बाद रचे गए यजुर्वेद में भी सरस्वती पूरे यौवन और उफान पर है। ऋग्वेद, यजुर्वेद के बाद सरस्वती सूखी और हड़प्पा सभ्यता का ह्रास हुआ। सरस्वती समय विभाजक रेखा है। उसे पार करके ही आर्य आक्रमण के झूठ का प्रचार संभव है। ऋग्वेद हड़प्पा सभ्यता से पुराना है। मिस्र और सुमेर की सभ्यता से भी प्राचीन। दयाराम साहनी व आर. के. बनर्जी ने हड़प्पा और मोहनजोदड़ो नामक दो प्राचीन नगरों की खोज (१९२१-२२) की। हड़प्पा रावी तट पर था, मोहनजोदड़ो सिध पर।
वाम प्रभावित विद्वानों के अनुसार, हड़प्पा सभ्यता इराक और प्राचीन सुमेरी सभ्यता से प्रेरित थी। इसी आधार पर ब्रिटिश पुरातत्वविद् मार्टिमर व्हीलर ने आर्य आक्रमण का सिद्धांत चलाया। व्हीलर के मुताबिक, आर्यों ने १५०० ई.पू. भारत पर हमला बोला। व्हीलर पाकिस्तान को ऐतिहासिक सामग्री दे रहे थे। पाकिस्तान व व्हीलर के इस सिद्धांत का जन्म एक ही समय (१९४७) हुआ। व्हीलर ने पाकिस्तानी र्क्वाटरली (१९४९) में ‘पाकिस्तान चार हजार वर्ष पहले’ नामक झूठा लेख लिखा। इन्होंने ही सिर्फ एक साल बाद अर्थात् १९५० में एक हजार साल बढ़ाकर ‘पाकिस्तान के पांच हजार साल-एक पुरातात्विक रूपरेखा’ नामक पुस्तक लिखी।
राम प्रसाद चंद ने आर्यों को हड़प्पा सभ्यता के नाश का अभियुक्त ठहराया। चंद ने ऋग्वेद का सहारा लिया। उन्होंने ‘पणि’ को इन नगरों का मूल निवासी बताया। इंद्र को पुरहा-पुरंदर ध्वंसक बताया। चंद के अनुसार इंद्र ने आर्य दिवोदास के लिए दास शंबर के पुर जीते। शंबर ‘दास‘ था। पहाड़ पर रहता था, जबकि सच यह है कि पहाड़ पर न मोहन जोदड़ो था और न ही हड़प्पा। फिर ऋग्वेद (९.६१.२) में दिवोदास के शत्रुओं की सूची में शंबर के साथ यदु और तुर्वस जैसे आर्य भी हैं यानी कथित आर्य हमले में दोनों तरफ आर्य थे। सवाल पेंचीदे हैं। उन्होंने ऋग्वेद को गवाह बनाया है यानी ऋग्वेद हड़प्पा सभ्यता के नाश (सरस्वती के सूख जाने) के बाद रचा गया। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के पुरातत्वविद् रेनप्रâीव ने लिखा- ‘आर्य आक्रमण का समय निर्धारण नि:संदेह डांवांडोल है।’ ऋग्वेद १०-१५ हजार वर्ष से ज्यादा पुराना है। पश्चिम के विद्वान भी इसे २५००-३००० वर्ष पुराना मानते हैं। सिंधु क्षेत्र में सिंधु लिपि थी। इसी से ब्राह्मी आई।
लैंगडन के अनुसार, सिंधु की चित्र लिपि का समय २८०० ई.पू. है। उन्होंने लिखा-‘इतिहास जितना मानता है, भारत में आर्य उससे कहीं अिधक प्राचीन हैं।’ फिलाडेल्फिया के पुरातत्वविद डेल्स १९६० के दशक में पाकिस्तान में उत्खनन कार्य से जुड़े। उन्होंने ‘द मिथिकल मैस्केयर ऑफ मोहनजोदड़ो‘ (मोहनजोदड़ो के हत्याकांड की कपोलकथा) में व्हीलर, चंद, मार्शल, मैकाय आदि सिद्धांतकारों की बातें काट दीं। रेनप्रâीव ने आर्यों को भारत का मूल निवासी माना, आर्य आक्रमण सिद्धांत को गलत बताया। उन्होंने लिखा-‘ऋग्वेद के दर्जन भर प्रसंगों में से एक में भी आक्रमण का संकेत नहीं मिलता।’ प्रख्यात मार्क्सवादी विचारक डॉ. रामविलास शर्मा ने आर्य आक्रमण को भाषाविज्ञान की कल्पना बताते हुए लिखा- ‘सघोष महाप्राण ध्वनियों वाले भारतीय शब्दों के ईरानी, यूरोपियन प्रतिरूपों में सघोषता और महाप्राणता का संयोग नहीं होता। यह विशेषता केवल भारतीय आर्य भाषाओं की है। यही एक तथ्य आर्य आक्रमण सिद्धांत को ध्वस्त करने के लिए काफी है।’
रेनप्रâीव से लैंगडन, डॉ. रामविलास शर्मा और डॉ. भगवान सिंह तक आर्यों को भारत का मूल निवासी बताते हैं, लेकिन तथाकथित सेकुलर हमारे पूर्वजों की बेइज्जती करते रहे हैं। वे राम और कृष्ण का अस्तित्व उत्खनन में खोज रहे हैं। भारत के किसी भी व्यक्ति के हजारों वर्ष पहले के पूर्वज का अस्तित्व पुरातत्व कहां से खोजेगा? भारत का विरला ही इंसान होगा, जिसे अपने बाबा के बाबा का नाम व काम याद हो। तथाकथित सेकुलरों का कहना है कि व्यास, वाल्मीकि, कंब, तुलसी, वेद, उपनिषद, महाभारत, रामायण, अयोध्या, मथुरा और हजारों वर्ष की प्रतीति, अनुभूति झूठी है। ऋग्वेद के रचनाकाल से लेकर उपनिषद काल, महाभारत तक देश में सांस्कृतिक निरंतरता है। ऐसी सांस्कृतिक निरंतरता किसी अन्य लोकतांत्रिक देश में नहीं मिलती। ऋग्वेद को अलग हटाकर कोई सारवान विवेचन असंभव है।
