पात्र दरकिनार, ‘अपात्र’ पर बरसा प्यार
सामना संवाददाता / मुंबई
छत्रपति संभाजीनगर के सरकारी डेंटल कॉलेज में गजब ‘सुपरफास्ट भर्ती घोटाला’ सामने आया है, जिसने राज्य की महायुति सरकार के कार्यकाल में भर्ती प्रक्रियाओं की समूची व्यवस्था पर बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है। इस चौंकाने वाले मामले में असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर एक उम्मीदवार ने पद के लिए आवेदन नहीं किया, लेकिन उन्हें इंटरव्यू में टॉप स्कोर देकर सीधे प्रोफेसर बना दिया गया। यह मेहरबानी महायुति सरकार के कार्यकाल में पात्रों को दरकिनार कर ‘अपात्र’ पर हुई है। यह चयन नियमों, पारदर्शिता और योग्यता को ताक पर रखकर किया गया है। इसी के साथ ही आरोप है कि इस ‘गोलमाल’ के पीछे उच्च पदस्थ अधिकारियों की मिलीभगत है, जिससे यह घोटाला सरकार के लिए एक नई परेशानी बन गया है।
सूत्रों के अनुसार, यह भर्ती प्रक्रिया शुरू से अंत तक धांधली की शिकार रही। ७ नवंबर २०२५ तक आवेदन करने की अंतिम तिथि थी। इसी के साथ ही १२ नवंबर को पात्रों की सूची जारी हुई। १३ नवंबर को इंटरव्यू के लिए पात्र उम्मीदवारों के साथ उस डॉक्टर को भी बुलाया गया, जिन्होंने आवेदन किया ही नहीं था। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि चयन समिति ने इस डॉक्टर को सर्वाधिक ६८ अंक देकर सीधे सहायक प्राध्यापक पद पर चुन लिया। इसकी अंतिम चयन सूची २० नवंबर को जारी की गई। इस सूची में इस डॉक्टर को दूसरे स्थान पर रखा गया, जबकि उनसे कम ६४ अंक पाने वाली डॉक्टर का नाम पहले स्थान पर रखा गया।
वेटिंग लिस्ट में रखा
विधिवत आवेदन करके साक्षात्कार देने वाली दो अन्य डॉक्टरों को क्रमश: ६० और ५० अंक देकर वेटिंग लिस्ट में रखा गया। चर्चा है कि पात्रता और नियमों को दरकिनार कर की गई इस नियुक्ति को लेकर डीन डॉ. एमएस इंदूरकर से जब संपर्क किया गया, तो उनसे संपर्क नहीं हो सका। ऐसे में यह मामला सरकारी संस्थानों में व्याप्त भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद का ज्वलंत उदाहरण है।
