संजय राऊत – महेश मांजरेकर
महाराष्ट्र की राजनीति में नया तूफान आया हुआ है। एक नए राजनीतिक अध्याय की शुरुआत हो चुकी है। शिवसेनापक्षप्रमुख उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष राज ठाकरे ने ‘सामना’ के लिए संयुक्त साक्षात्कार दिया। मनपा चुनावों के रणसंग्राम में दोनों ठाकरे बंधु महाराष्ट्र की अस्मिता और मुंबई की रक्षा के लिए एक साथ आए और उन्होंने गरजते हुए कहा कि अभी नहीं तो कभी नहीं। यह महाराष्ट्र और मुंबई की जनता के अस्तित्व की लड़ाई है। हम दोनों भाई एक साथ आए हैं। अब महाराष्ट्र की तमाम जनता को भी एक होना होगा।
राज ठाकरे ने कहा कि महाराष्ट्र में सत्ताधारी भले ही मराठी हों, लेकिन उनके मालिक दिल्ली में बैठकर मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करने का काम कर रहे हैं। हम इस साजिश को कामयाब नहीं होने देंगे। उद्धव ठाकरे ने एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाते हुए कहा कि आज के सत्ताधारी केवल ठेकेदारों के लिए ही काम कर रहे हैं। वास्तव में सत्ताधारियों का प्रेम राज्य के लिए होना चाहिए, सत्ता के लिए नहीं। यहां तो राज्य समाप्त हो जाए तब भी चलेगा, ठेकेदारों के फायदे के लिए सत्ता काम कर रही है। उद्धव और राज ठाकरे ने साक्षात्कार में जोरदार हमला बोलते हुए कहा कि महाराष्ट्र मतलब ‘क्लीन चिट’ देने की फैक्ट्री बन चुका है।
साक्षात्कार की शुरुआत संजय राऊत और महेश मांजरेकर ने की। एक मुंबईकर और ‘कॉमन मैन’ के रूप में मांजरेकर ने सवाल उठाए। वे प्रसिद्ध फिल्म निर्माता, निर्देशक और कलाकार हैं, लेकिन इस बातचीत में उनके भीतर का असंतुष्ट मुंबईकर स्पष्ट रूप से नजर आया। शुरुआत में ही ठाकरे बंधुओं की एकता का विषय सामने आया।
संजय राऊत ने पूछा कि महाराष्ट्र जिस घड़ी की प्रतीक्षा कर रहा था, वह घड़ी अब आ गई है। २० वर्षों के बाद आप दोनों एक साथ आकर महाराष्ट्र और मुंबईकरों पर चर्चा कर रहे हैं, लेकिन महाराष्ट्र के मन में एक प्रश्न है। आप दोनों को उस पर बोलना चाहिए। इस खास दिन के लिए महाराष्ट्र को २० वर्ष तक प्रतीक्षा क्यों करनी पड़ी?
शिवसेना को जिस तरीके से तोड़ा गया, उसके पीछे आखिर उद्देश्य क्या है? राजनीति में दल-बदल होते रहते हैं, लोग एक पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में जाते हैं। लेकिन किसी पार्टी को पूरी तरह समाप्त करना, उसका चुनाव चिह्न छीन लेना, उसकी मान्यता लगभग रद्द कर देना और उसके अस्तित्व को ही मिटा देने की कोशिश करना। महाराष्ट्र में समाज की ताकत को तोड़ना और खत्म करना। यह क्या दर्शाता है? ठीक है, राजनीति में गठबंधन होते हैं, वे टूटते भी हैं और फिर से दो दल एक साथ आ भी सकते हैं। लेकिन किसी पार्टी को ही समाप्त कर देना, यह कौन-सा प्रयोग है? महाराष्ट्र को कमजोर करने के लिए ही उन्होंने शिवसेना को तोड़ा।- उद्धव ठाकरे
एक पुराना घाव है, मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करने का। इस सपने को वैâसे पूरा किया जाए, इसके लिए कुछ लोग लगातार प्रयास कर रहे हैं। इसलिए मुझे लगता है कि संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन के समय जैसा माहौल था। जब मुंबई को अलग करने और गुजरात को सौंपने की मांग थी, वैसा ही वातावरण आज फिर बन रहा है। जो लोग मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करना चाहते हैं, वही आज केंद्र में सत्ता में हैं। वही राज्य की सत्ता में भी हैं। यदि वही लोग मनपा में भी सत्ता में आ गए तो मुझे लगता है कि महाराष्ट्र की जनता कुछ भी नहीं कर पाएगी। इन सभी बातों को मूकदर्शक बनकर देखना हमारे लिए संभव नहीं है, इसी वजह से हम एक साथ आए हैं।- राज ठाकरे
राज ठाकरे – मेरा मानना है कि कुछ बातें क्यों हुईं, वैâसे हुईं, क्या हुआ, इन सबको अब पीछे छोड़ देना चाहिए। मैंने पहले भी महेश मांजरेकर को दिए एक साक्षात्कार में कहा था कि किसी भी झगड़े या विवाद से कही बड़ा महाराष्ट्र है। आज महाराष्ट्र पर संकट है। मुंबई पर है और महाराष्ट्र के कई शहरों पर यह संकट है। यह संकट क्या है, यह महाराष्ट्र की जनता समझ चुकी है। महाराष्ट्र में किस तरह की राजनीति चल रही है, इसकी उसे पूरी जानकारी है। यही सबसे बड़ी वजह है कि हम आज एक साथ आए हैं। आज यह हमारे अस्तित्व का सवाल नहीं है, बल्कि महाराष्ट्र के तमाम समाज के अस्तित्व का सवाल है। इस विषय पर मैं वर्षों से बोल रहा हूं, उद्धव भी बोल रहे हैं।
तो महाराष्ट्र को तोड़ने वाली
ताकतें फायदा उठा लेंगी!

आज महाराष्ट्र और यह चुनाव ऐसे मोड़ पर खड़े हैं, जिसे सही मायने में अभी नहीं तो कभी नहीं कहा जा सकता है। यही स्थिति मुंबई, ठाणे और पूरे एमएमआर क्षेत्र पर आकर ठहर गई है। मैं जानबूझकर एमएमआर क्षेत्र का उल्लेख कर रहा हूं। उन्होंने आगे कहा कि इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए आज हमारा एक साथ आना जरूरी है। यदि अब भी हम एकजुट होकर मुकाबला नहीं करते हैं तो महाराष्ट्र हमें माफ नहीं करेगा।
उद्धव ठाकरे – दोनों भाइयों का एक साथ आना भावनात्मक विषय जरूर है, लेकिन हम दो भाई एक साथ आए, इसका मतलब है कि अब महाराष्ट्र को एकजुट होना चाहिए। अगर महाराष्ट्र को बचाना है तो हमें एकता दिखानी ही होगी। राजनीतिक दल और मत अलग हो सकते हैं, लेकिन हम महाराष्ट्र के हैं, महाराष्ट्र हमारा है। अगर हम आपस में अलग-अलग चूल्हे जलाते रहे तो महाराष्ट्र को तोड़ने वाली ताकतें इस पर अपनी रोटी सेंककर फायदा उठा लेंगी।
संजय राऊत – मुंबई सहित महाराष्ट्र की रक्षा के लिए शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे ने शिवसेना की स्थापना की थी। इतने वर्षों बाद भी संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन के उदाहरण दिए जाते हैं, और विशेष रूप से आप दोनों उस बात को याद दिलाते हैं। क्या आज आपको संयुक्त महाराष्ट्र के आंदोलन जैसे माहौल महसूस हो रहे हैं। जैसे संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन के समय लोग एकजुट हुए थे, आज भी यह समाज उसी तरह एकजुट होता दिखाई दे रहा है क्या?
राज ठाकरे – बिल्कुल दिखाई दे रहा है। यदि आप देखें तो उस समय संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन टूटा और उसके बाद माननीय बालासाहेब ठाकरे ने शिवसेना की स्थापना की। तब महाराष्ट्र फिर से एकजुट हुआ था, क्योंकि उसकी आवश्यकता थी। आज भी वही तस्वीर दिखाई दे रही है।
इसका कारण क्या है?
इसका कारण बाहर से आने वाले लोगों की बढ़ती संख्या है, मुंबई में भी उतनी ही संख्या बढ़ रही है। सिर्फ जनसंख्या ही नहीं बढ़ रही है। उनकी दादागीरी देखिए। ‘मुंबई का महापौर हम उत्तर भारतीय बनाएंगे, मुंबई का महापौर हिंदू बनाएंगे।’ ऐसे वाक्य वैâसे बोले जा सकते हैं? ये कब से शुरू हुआ? ये लोग सिर्फ रोजी-रोटी के लिए नहीं आ रहे हैं, बल्कि अपनी खुद का वोट बैंक बना रहे हैं। वही तस्वीर अब भी दिख रही है, पुराना घाव जो है न, मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करने का सपना, उसे पूरा कैसे किया जा सकता है, इसके लिए यह सब चल रहा है। इसलिए, मुझे लगता है कि जिस तरह संयुक्त महाराष्ट्र के समय मुंबई को अलग करने और गुजरात द्वारा मांग करने जैसी स्थिति थी, वैसी ही स्थिति आज भी है। मुंबई को अलग करने की चाह रखने वाले केंद्र में हैं, वे राज्य में भी हैं और अगर वे नगरपालिका में भी सत्ता में आ गए, तो मुझे लगता है कि मराठी लोग कुछ नहीं कर पाएंगे। इन सब बातों को लाचारी से देखना हमारे लिए संभव नहीं है, इसीलिए हम सब एक साथ आए हैं।
संजय राऊत – उद्धव साहब, जब भी मराठी लोग भड़क उठते हैं, उग्र हो जाते हैं…तब महाराष्ट्र में परिवर्तन हुआ है। तब सत्ता परिवर्तन होता है, सामाजिक परिवर्तन होता है। क्या आप आज भी मराठी माणुस को उस तरह उग्र होते हुए देखते हैं?
उद्धव ठाकरे – एक बात याद रखिए, जब मराठी जनता उग्र हुई, तब संयुक्त महाराष्ट्र बना। महाराष्ट्र को मुंबई मराठी मानुष ने ही दिया। यह कालखंड १९६० से १९६६ के बीच का था। राज ने जिस तरीके से कहा वैसे हालात पैदा हो गए थे। मराठी मानुस थक चुका था। उसका आत्मविश्वास टूट चुका था। उस वक्त उसमें ताकत और चेतना जागृत करने और जोश भरने के लिए शिवसेना की स्थापना हुई। कितने सालों तक सब कुछ बढ़िया चला। हम सभी को ऐसा लगा कि अब कोई दोबारा ऐसा करने की हिम्मत नहीं करेगा।
किसने हिम्मत की?
लेकिन जिस तरीके से शिवसेना को तोड़ा गया, उसके पीछे मकसद क्या है? राजनीति में दल-बदल होते हैं। यहां के लोग वहां जाते हैं। लेकिन पार्टी को खत्म करना, पार्टी का चिह्न ले लेना, उसकी मान्यता लगभग मिटा देना। अस्तित्व ही खत्म कर देना। मराठी माणुस की ताकत तोड़ना क्या दर्शाता है? ठीक है, राजनीति में गठबंधन बनते हैं, टूटते हैं, फिर टूटते हैं। पार्टियां फिर से एकजुट हो सकती हैं, लेकिन पार्टी को खत्म करने का प्रयोग क्या है? उन्होंने शिवसेना को सिर्फ महाराष्ट्र को कमजोर करने के लिए तोड़ा।
संजय राऊत – संयुक्त महाराष्ट्र के समय में भी लड़ाई महाराष्ट्र के मराठी शासकों के खिलाफ थी। आज भी शासक मराठी ही हैं। मराठी बनाम मराठी।
उद्धव ठाकरे – भले ही मराठी हैं, लेकिन उनके मालिक दिल्ली में बैठे हैं और वे उन्हीं के लिए काम करते हैं… गुलाम के बच्चे!
राज ठाकरे – आपको एक बात बताऊं…ये सब बाज हैं। बाज का काम मालिक के हाथ पर बैठकर पक्षियों को मारकर लाना होता है। यहां मालिक के हाथ में बैठकर अपने ही आदमियों को तोड़ना आज के लोगों का काम बन गया है। यानी अपने ही लोगों से घात करना केवल आकाश में उड़ने वाले पक्षियों में ही नहीं हो रहा है, बल्कि राजनीतिक दलों में भी हो रहा है। वही बात अब भी हो रही है। यह सारी चीज अपने ही लोगों से करवाई जा रही है। वे जातियों के बीच मतभेद पैदा करना चाहते हैं। जातियों को आपस में भड़काना चाहते हैं। संघर्ष, बहस और झगड़े पैदा कर रहे हैं। उनकी सारी राजनीति सिर्फ इसलिए ही चल रही है, ताकि महाराष्ट्र में मराठी के तौर पर सब एकजुट न रह सकें।
संजय राऊत – आप एकजुट हो गए हैं, महाराष्ट्र खुश है। मराठी लोग एकजुट हो गए हैं, लेकिन मौजूदा भाजपा मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस अपने गठबंधन के बारे में कहते हैं कि यह करप्शन और कन्फ्यूजन का गठबंधन है। यानी वे कहते हैं कि राज ठाकरे कन्फ्यूज हैं और उन्होंने उद्धवजी पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया।
क्या आप कन्फ्यूज हैं?
राज ठाकरे – पहली बात तो यह है कि इन सभी का दिखावा सिर्फ नरेंद्र मोदी पर निर्भर करता है। ये सभी उन्हीं के बैठाए गए लोग हैं। इनमें कोई भी पद पर बैठा नहीं है। पद पर बैठा इंसान यानी वो जो अपनी योग्यता के बल पर आगे आया हो और जो बिठाया गया होता है वो इंसान सिर्फ पैसे वालों की सुनता है, मालिकों की ही सुनता है। मालिक जो कहता है उसी तरह काम करता है। इसलिए मुझे नहीं लगता कि उनकी बातों में कोई लॉजिक है।
करप्शन?
भ्रष्टाचार की बात तो फडणवीस को करनी ही नहीं चाहिए। वे तो अजीत पवार के खिलाफ बैलगाड़ी ले गए थे। उन्होंने कहा था कि वे उनके भ्रष्टाचार के सबूत लेकर आ रहे हैं। उनका क्या हुआ? अब वे कहते हैं कि मामला कोर्ट में चल रहा है। अरे, तो फिर उन्हें वो सबूत दे दो…
यह कुछ ऐसा है कि अपना छुपाकर रखना और दूसरों का उचककर देखना। अब ये इस लेवल तक आ गए हैं। एक बार अपनी गिरेबान में झांककर देखो क्या चल रहा है। इस देश की राजनीति में कोई भी सत्ता का अमर कलश लेकर नहीं आया है। सत्ता बदलती रहती है। समय सब कुछ देख लेता है। कल जब ये बदलेगी, सब कुछ सामने आ जाएगा। हमें बस इंतजार करना होगा।
संजय राऊत – उद्धव जी, इस वक्त आप टारगेट पर हैं। सारा ध्यान आप पर है…भाजपा की चाटुकार मंडली, जिन्हें आप चाटम कहते हैं, आप उनके टारगेट बने हुए हैं।
उद्धव ठाकरे – आपके सवाल में ही जवाब आ गया है ना…
संजय राऊत – कई वर्षों से अपनी सत्ता है…
उद्धव ठाकरे – उस सत्ता में भाजपा वाले भी शामिल थे…
संजय राऊत – भाजपा ने आरोप लगाया है कि मुंबई मनपा में ३ लाख करोड़ रुपए का भ्रष्टाचार हुआ है। क्या मनपा के पास इतना पैसा होता है? और अगर इतना पैसा है तो ये विधायक ५०-५० करोड़ के लिए क्यों भाग गए?
राज ठाकरे – एक मिनट… मैं उस बारे में थोड़ी देर बात करना चाहता हूं। जो कुछ हो रहा था वो पचास खोके, पचास खोके, पचास खोके… मुझे लगता है कि लोगों को इसे ठीक से समझाना जरूरी है। ये पचास खोके, पचास खोके मजाक की बात नहीं है। पचास खोके मतलब पचास करोड़ रुपए…४० विधायक मतलब २ हजार करोड़ हुए। ये पैसा आया कहां से? आया कैसे?
लेकिन आज सब भूमि अडानी की हो गई है

संजय राऊत – भ्रष्टाचार से… घोटालों से…
राज ठाकरे – बरोबर ना। मतलब, बैंक से तो कोई लोन नहीं लिया गया था। तो भ्रष्टाचार की बात किसे करनी चाहिए?
महेश मांजरेकर – एक मुंबईकर होने के नाते, आज जब मैं घर से बाहर निकलता हूं तो मुझे शर्म आती है कि मेरे बच्चे इसी शहर में बड़े होंगे। कुछ चीजें हैं, जो मैं नियमित फॉलो करता हूं। आज का एयर क्वालिटी इंडेक्स १८३ है। अगर मुझे कोई दूसरी जगह जाने का ऑप्शन देता है तो मैं तुरंत जाऊंगा, क्योंकि घर से बाहर निकलने पर मुझे तकलीफ होती है। इस मुंबई के लिए क्या किया जा सकता है? मुंबई की हालत इस तरह हो गई है, जैसे किसी गुब्बारे में उसकी क्षमता से ५ गुना ज्यादा हवा भर दी गई हो। आज मुंबई की जनसंख्या २ करोड़ ३१ लाख है। ये मुंबई डीकन्जेस्ट कब होगी?
उद्धव ठाकरे – मैं आपसे एक बात पूछना चाहता हूं। आप इतने वर्षों से मुंबई में रह रहे हैं। राज और मैं मुंबई में ही पैदा हुए हैं। आज जो प्रदूषण दिख रहा है, वायु प्रदूषण सूचकांक चाहे जो भी हो, क्या कभी इतना बुरा था? यह सवाल पूछने की वजह यह है कि अब भाजपा वालों ने विकास के प्रचार को लेकर जो होर्डिंग्स लगाकर रखे हैं, ये विकास की गति नहीं, बल्कि उनके विनाश की गति है। नियोजन शून्य विकास। आपकी तकलीफ की वजह है।
भाजपा के लोग विकास को बढ़ावा देने के लिए जो भी होर्डिंग्स लगा रहे हैं, वह विकास की रफ्तार नहीं है। उनकी रफ्तार तो विनाश की रफ्तार है। अनियोजित विकास। यही आपकी परेशानियों का कारण है। आप जो कहते हैं न ‘आओ आओ घर तुम्हारा है’, उसकी शुरुआत यहीं से होती है। इस सरकार ने यह नहीं समझा कि हम वास्तव में क्या चाहते हैं। अगर आप आज देखें तो हर जगह सड़कें खुदी हुई हैं। जहां जाएं वहां सड़कें खुदी हुई हैं, बड़ी-बड़ी इमारतें बन रही हैं। मेट्रो बनेगी, कुछ जगहों पर पुल बनेंगे। इसमें कोई शक नहीं कि इन सबकी जरूरत है। लेकिन ये सब एक ही बार में बना दिया गया है। कुछ तारतम्य होना चाहिए। मुंबई के खर्चों में भी तालमेल बैठाना चाहिए। वरना, मौजूदा स्थिति लंबे समय तक बनी रहेगी। एक मुंबईकर होने के नाते, आप जो टैक्स देते हैं, उसके बदले में आपको क्या मिलता है… प्रदूषण।
विकास, विकास क्या होता है? हमने यहां कितनी सुंदर सड़क बना दी है, सीधे घर से अस्पताल तक। इसे मैं विकास नहीं कहता। हमें ऐसा विकास चाहिए जहां अस्पतालों की संख्या कम हो और जीवन बेहतर हो।
महेश मांजरेकर – मेरा तो कहना है कि अभी विकास नहीं चाहिए।
उद्धव ठाकरे – यह मानसिकता क्यों बनी? वजह है नियोजन शून्य विकास। आज हमारी भी होर्डिंग्स लगी हुई हैं। मैं २०१२ से होर्डिंग्स लगवा रहा हूं। हां, हमने ये किया! उस बात का मुझे गर्व है और मुझे लगता है कि मुंबईकरों को भी इस बात का गर्व है। उसमें स्कूलों का स्तर होगा। बढ़िया गुणवत्ता वाला पानी होगा। कोस्टल रोड बन ही चुकी है। यह सब हमने किया है, लेकिन मनमाने ढंग से नहीं। अब यह देखिए, मैं कला नगर में रहता हूं। यहां टेढ़े-मेढ़े फ्लाईओवर दिखते हैं। अब एक और वॉकर ब्रिज बनाया जा रहा है। किसके लिए कर रहे हैं? क्यों कर रहे हैं? सारा धूल और सीमेंट के कण हमारे फेफड़ों में जा रहे हैं।
महेश मांजरेकर – मैं भी यही कह रहा हूं, अब मुंबई में विकास का कोई मतलब भी नहीं रहा। मुंबई में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा विश्व में सबसे अधिक है। हम सांस लेते समय ऑक्सीजन से अधिक कार्बन लेते हैं…
राज ठाकरे – इसकी जड़ में वे चीजें हैं, जो विकास के नाम पर हो रही हैं। दूसरी बात यह है कि बड़े पैमाने पर रीडेवलपमेंट। अगर हम मुंबई, ठाणे, पनवेल, नई मुंबई चले गए तो क्या देखते हैं। रीडेवलपमेंट बड़े पैमाने पर चल रहा है। पेड़ काटे जा रहे हैं। दरअसल, होता यह है कि हमारे यहां डीपी तो बनता है, लेकिन टाउन प्लानिंग नहीं होती। मेरे कुछ भाषण हैं २००८ और २००९ के। पुणे के एक भाषण में मैंने कहा था कि मुंबई को खराब होने में एक वक्त लगा, लेकिन पुणे को वह वक्त भी नहीं मिलेगा, पुणे जल्दी बर्बाद हो जाएगा।
महेश मांजरेकर – मैं पुणे चला गया क्योंकि मुंबई में बहुत भीड़ थी, लेकिन छह महीने के अंदर ही वापस आ गया। मुंबई के मामले में मेरी राय यह है कि जो लोग आ चुके हैं उन्हें रहने दिया जाए, लेकिन जो लोग आ रहे हैं, उन्हें रोका जाना चाहिए…
उद्धव ठाकरे – इसमें दो बातें हैं। बुनियादी बातें महत्वपूर्ण हैं। मेरे पास कुछ समाचार क्लिपिंग्स हैं। मुंबई में मैंग्रोव्ज हैं। मैंग्रोव्ज आमतौर पर वहां पाए जाते हैं, जहां समुद्र और खाड़ी होती है। विकास के नाम पर इन मैंग्रोव्ज को काटा जा रहा है। अब सामान्य नियम यह है कि जितने पेड़ काटे जाएं, उतने ही पेड़ लगाए जाने चाहिए। मुंबई के मैंग्रोव्ज को काटने के बाद कहां लगाया जाना चाहिए? क्या आप पुणे गए हैं। क्या चंद्रपुर गए हैं? वहां जाकर देखिए। मुंबई के मैंग्रोव्ज की भरपाई चंद्रपुर में कर रहे हैं, वहां मैंग्रोव्ज लगाए जा रहे हैं। इस विकास का क्या लाभ होगा? यदि आप २०१७ में मुंबई के लिए किए गए मेरे वचननामा को देखें, तो आपको पता चलेगा कि मैंने मुंबई के लिए पानी की व्यवस्था करने हेतु दो बांध, गारगाई और पिंजाल बनाने का वादा किया था। मैं अपने कर्मधर्म संयोग से मुख्यमंत्री बना और मैंने इन बांधों के लिए प्रेजेंटेशन दिया, क्योंकि मैं अपना वादा निभाना चाहता था। तब एक चौंकाने वाली बात मेरे ध्यान में आई कि यदि ये बांध बनाए गए तो लगभग ६ लाख पेड़ काटने पड़ेंगे। इसका मतलब है कि जंगल पूरी तरह से नष्ट हो जाएगा। सामान्यत: बारिश होने पर वह क्षेत्र नष्ट हो जाता है। इसका अर्थ है कि पर्यावरण नष्ट हो जाएगा। इसके लिए खर्च भी आएगा। इसके अलावा, हमें फिर से बारिश पर निर्भर रहना पड़ेगा। कल वह पानी भी कम होगा, क्योंकि दूसरी तरफ से भीड़ आती ही रहेगी। जब मैं मुख्यमंत्री था, तब मैंने समुद्र के पानी को पीने योग्य बनाने के लिए एक पायलट प्रोजेक्ट को मंजूरी दी थी। वह प्रोजेक्ट दिसंबर में पूरा हो जाता। इससे मुंबईवासियों को उतना ही पानी मिलता, जितना आज तानसा से प्रतिदिन मिलता है, यानी ४०० एमएलडी। इस सरकार ने उस प्लांट को दरकिनार कर दिया और सिर्फ कॉन्ट्रैक्ट के लिए एक बार फिर गारगाई, पिंजाल को शुरू कर दिया। मैंने ‘आरे’ वन को संरक्षण दिया था। ऐसा नहीं है कि मैं मेट्रो नहीं चाहता था। मैंने भी मेट्रो का लोकार्पण किया ही था ना। मेट्रो २ का। हमारी सरकार का कहना था कि कारशेड के लिए आरे वन को काटने की कोई जरूरत नहीं है। कारशेड कांजूरमार्ग पर बनाया जा सकता है। तब मेरी आलोचना हुई थी। अब इस सरकार ने क्या किया है? जिद के चलते उन्होंने आरे वन को बड़े पैमाने पर काट दिया है, साथ ही वे कांजूरमार्ग की जमीन का भी इस्तेमाल कर रहे हैं। वे ऐसा क्यों कर रहे हैं?
महेश मांजरेकर – आज मुंबई में जो नई बिल्डिंगें बन रही हैं, उनमें २४ घंटे पानी की सप्लाई होती है। मेरी छोटी-सी बिल्डिंग में दो-तीन घंटे ही पानी आता है। अगर मुझे बाहर जाना हो, जहां पहले १० मिनट लगते थे, अब एक घंटा लग जाता है। इसी में भीड़ का मुद्दा आता है। अब मुंबई को डिकंजेस्ट करना जरूरी है। मेरा कहना यह है कि जो लोग आ गए हैं, उन्हें रहने दीजिए, वे अब मुंबईकर हैं। लेकिन अब हमें यह समझना होगा कि जगह नहीं है…मुंबई में ५१ लाख गाड़ियां हो गई हैं।
राज ठाकरे – मेरा मानना है कि कुछ चीजों को राज्य के नजरिए से देखना चाहिए, न कि किसी राजनीतिक दल के नजरिए से। असल में चार तरह की जगहें होती हैं। एक केंद्र सरकार की जगह, एक राज्य सरकार की, एक मनपा की जगह और एक निजी जगह। मुंबई में गोदरेज की एक निजी जगह है। वहां आपको एक भी झोपड़ी नहीं मिलेगी, लेकिन केंद्र सरकार, राज्य सरकार और मनपा की इन सभी जगहों का कोई माई-बाप नहीं है। आज ऐसी कई अनधिकृत इमारतों को गिराया जा चुका है, लेकिन मूल प्रश्न वही बना हुआ है…इस पर जिस तरह की जांच होनी चाहिए, वह होनी चाहिए। कौन करे? अगर हम सत्ता में आते हैं तो हम करेंगे, राज्य की जनता करे, लेकिन जांच जरूरी है। आप जो कह रहे हैं कि ऐसी जगहें खत्म हो चुकी हैं, वह बिल्कुल सही है। अब प्रदूषण का ही मामला ले लीजिए। मैं मुंबई की स्थिति से सहमत हूं, लेकिन दिल्ली की स्थिति क्या है? अगर आप आज दिल्ली को देखें, तो वहां केंद्र और राज्य दोनों की प्रशासनिक व्यवस्थाएं मौजूद हैं।
उद्धव ठाकरे – मूलत: शासक का प्रेम राज्य के प्रति होना चाहिए, सत्ता के प्रति नहीं। ये लोग सत्ता के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं और गड़बड़ी हो जाने पर हाथ खड़े कर देते हैं। अब बताइए, हम मुंबई में रहने वाले हैं। दुर्भाग्य से, आज के शासक मुंबईकर नहीं हैं। भले ही वे मराठी हों, महाराष्ट्र से हों, लेकिन क्या उनको मुंबईकरों या उनके शहर की कोई फिक्र है? वे तो सिर्फ कॉन्ट्रैक्ट के लिए काम करते हैं।
संजय राऊत – यहां दो अहम सवाल उठे हैं। पहला तो वो मुद्दा है जो राज साहब ने उठाया था कि जमीन केंद्र सरकार की है, राज्य सरकार की है और निजी भी है। लेकिन आज मुंबई समेत महाराष्ट्र की जमीन का मालिक मोदी का लाडला उद्योगपति बन गया है। लगभग वही मालिक। एक ही! एक समय था जब महाराष्ट्र में, पूरे देश में, विनोबा भावे ने नारा दिया था, ‘सब भूमि गोपाल की…!’ आज सब भूमि अडानी की…हो गई है। अगर मुंबई को बचाना है तो महत्वपूर्ण जमीनों को हड़पने का ये सिलसिला, एक उद्योगपति की जेब में डालने का ये सिलसिला रोकना होगा। ये जो मुद्दा आपके वचननामा में भी है, आप इसे वैâसे करेंगे? कैसे रोकेंगे?
उद्धव ठाकरे – आज उन्हें रोकने वाला प्रशासन में कोई भी नहीं है। केंद्र से ऑर्डर मिलते ही जमीन उनकी जेब में डाल देते हैं। वे जहां पर उंगली रख देते हैं, वह जमीन और वह कॉन्ट्रैक्ट उन्हें मिल जाते हैं…जैसा कि राज ने अभी कहा था कि ये बाज बैठे हुए हैं। वह जमीन दिखाते हैं और यह उसे अडानी की झोली में डाल देते हैं। अब मूल मनपा ही वह आखिरी जगह बच गई है, जहां उन्हें दृढ़तापूर्वक ना बोलने वाला कोई तो होना चाहिए।
संजय राऊत – मेरा वही मुद्दा है कि हम कहते हैं, मनपा पर भगवा फहरना चाहिए, मुंबईकर की सत्ता आनी चाहिए। लेकिन क्या यह सत्ता आने से सारे सवाल खत्म हो जाएंगे? जिन सवालों के लिए हम आज एकत्र हुए हैं। और सबसे बड़ा संकट यह है कि अडानी, भाजपा के माध्यम से मुंबई को निगलता जा रहा है।
राज ठाकरे – मैं इस पर एक बात कहना चाहता हूं। मुझे ऐसा लगता है कि मुंबई मनपा का कार्यकाल २०२२ में समाप्त हो गया था और उसी समय शायद उद्धव सरकार भी चली गई थी।
उद्धव ठाकरे – नहीं, उससे पहले ही मनपा भंग कर दी गई थी। जून में मेरी सरकार गिराई गई।
राज ठाकरे – यानी २०२२ के बाद आज जनवरी २०२६ में चुनाव हो रहे हैं। इतने वर्ष क्यों बीत गए? चुनाव क्यों नहीं कराए गए? मेरे आने वाले कुछ भाषणों और इंटरव्यू में मैं यह साफ-साफ बताऊंगा कि इसके पीछे उनकी क्या प्लानिंग चल रही थी। २०२४ से २०२५ के बीच क्या हुआ? मात्र एक ही साल में क्या-क्या हुआ? यह सब मैं आपके सामने रखूंगा। उनकी किस तरह की प्लानिंग थी? किस उद्देश्य से इन चुनावों को टालते-टालते २०२६ तक ले आया गया। यह मैं बाद में विस्तार से बताऊंगा।
संजय राऊत – मतलब, यह सब एक दबाव के तहत चल रहा है।
हां, मैंने अभी कहा ही है। ये जो लोग हैं, वे बैठाए हुए लोग हैं। ये दिशा नहीं दिखाते, बल्कि दिशा देखते हैं। इनके पास सिर्फ फाइलें आती हैं, हस्ताक्षर के लिए और कहा जाता है कि इस पर साइन करो। हमारे ही लोगों को, यहां के लोगों को यह समझ नहीं आ रहा कि हम क्या कर रहे हैं। समय के साथ उन्हें समझ आएगा कि उनसे कितनी बड़ी गलतियां हो गई हैं।
संजय राऊत – इन्होंने महाराष्ट्र का ‘डेथ वारंट’ निकाल दिया है। यहां के आदमी के हस्ताक्षर से ही यही के आदमी का डेथ वारंट निकाला जा रहा है!
राज ठाकरे – हां, बिल्कुल। और इसमें ऐसा है कि सीएम देवेंद्र फडणवीस नागपुर के हैं, बाकी भी लगभग सभी बाहर के हैं। मैं एक उदाहरण देता हूं। मैं एक बार स्विट्जरलैंड गया था। वहां मैंने उस देश को देखा कि गाड़ियां सुचारु रूप से चल रही थीं। सभी के पास अच्छी नौकरियां थीं, सुंदर सड़कें थीं, बेहतरीन प्राकृतिक वातावरण था। सब कुछ व्यवस्थित और सुंदर। यह सब देखते हुए मेरे मन में सबसे पहला सवाल आया कि वहां का विपक्ष क्या करता होगा? यानी चुनाव के समय वह जनता से क्या कहता होगा कि मैं तुम्हें यह दूंगा, मैं तुम्हें वह दूंगा? वह मेरी कल्पना से ही बाहर था।
मुंबई में मुंबईकरों को क्या चाहिए, इस पर मेरी समझ में यही आता है कि जब तक आप यहां जन्मे नहीं होंगे, तब तक आपको यह समझ ही नहीं आएगा। बाहर से आकर जब आप किसी देश या किसी शहर को देखते हैं तो आपको वहां के वास्तविक सवाल कभी समझ में नहीं आते। उदाहरण के तौर पर मान लीजिए, आपका हाउसिंग मंत्री हो, पीडब्ल्यूडी मंत्री हो या कोई और, जब ये लोग बाहर के होते हैं और मुंबई आते हैं तो उनके मन में सवाल उठता है, अरे, इस शहर की समस्या आखिर है क्या? सड़कें हैं, अस्पताल हैं, बिजली है, स्कूल हैं, कॉलेज हैं, २४ घंटे पानी है। तो समस्या क्या है? ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वे तुलना अपने इलाकों की सड़कों से, वहां की लोडशेडिंग और वहां की परिस्थितियों से करते हैं। इन्हीं तुलनाओं के कारण ये सारी समस्याएं पैदा होती हैं। अंतत: सब कुछ आपकी मानसिकता पर निर्भर करता है।
अस्पतालों के निजीकरण
को भी हमने रोका है!

महेश मांजरेकर – मां भीख मांगने नहीं देती और पिता चोरी करने नहीं देता। मुंबई के मध्यमवर्ग की यही हालत है। उनका क्या? फुटपाथ नहीं हैं, तो चलें कहां? स्कूलों की समस्याएं हैं। क्या शिक्षा का अधिकार केवल अमीरों तक सीमित होना चाहिए? मनपा के स्कूल भी एसी वाले होने चाहिए।
उद्धव ठाकरे – वास्तविकता वैसी नहीं है। इस बारे में मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं। मुंबई मनपा के स्कूलों में हमने जितने सुधार किए हैं, उतने शायद केवल अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली में किए होंगे। पिछले पांच वर्षों में पहली बार ऐसा हुआ है कि मुंबई मनपा के स्कूलों में प्रवेश के लिए लोगों की कतारें लगी हैं। इसका कारण यह है कि हमने शिक्षा की गुणवत्ता का स्तर बढ़ाया है। हां, इमारतों में अभी और सुधार की आवश्यकता है, क्योंकि अंतत: यह बजट का विषय होता है।
महेश मांजरेकर – मेरा कहना है कि किसी को यह कहते हुए शर्म नहीं आनी चाहिए कि वह मनपा स्कूल में पढ़ता है।
उद्धव ठाकरे – शर्म नहीं, बल्कि गर्व होना चाहिए। भले ही सभी स्कूल पूरी तरह एसी न हों, लेकिन देश में मुंबई मनपा शायद एकमात्र ऐसी संस्था है, जिसने २०१० से आधुनिक तकनीक और सुविधाओं का उपयोग शुरू किया। हमने ‘वर्चुअल क्लासरूम’ की व्यवस्था लागू की। इसके तहत हमने यह व्यवस्था की कि किसी विषय का एक अच्छा शिक्षक या शिक्षिका एक ही स्टूडियो से दसवीं के छात्रों को सभी विषय अच्छे से पढ़ा सके। यह पढ़ाई केवल ‘मन की बात’ नहीं होती, बल्कि इसमें प्रश्न–उत्तर होते हैं। यानी छात्रों को सवाल पूछने की पूरी आजादी होती है और शिक्षक उनके उत्तर दे सकते हैं। इस पर हमने एक पूरी पुस्तिका भी तैयार की है। मुंबई में मनपा के लगभग १,३०० स्कूलें हैं। इनमें करीब साढ़े तीन लाख विद्यार्थी आठ अलग-अलग भाषाओं में शिक्षा प्राप्त करते हैं। मराठी तो है ही, साथ ही अंग्रेजी, सेमी-इंग्लिश, हिंदी, उर्दू, गुजराती सहित कुल आठ भाषाओं में पढ़ाई कराई जाती है। इसके बाद २०१४–१५ के आसपास हमने आठवीं से दसवीं कक्षा के लिए ई-लर्निंग की अवधारणा शुरू की। विद्यार्थियों के कंधों पर बोझ कम करने का जो सपना शिवसेनाप्रमुख का था, उसे पूरा करने के लिए हमने कई विषयों को ई-सिस्टम में शामिल किया और उन्हें टैबलेट पर उपलब्ध कराया। इनमें से कई विषय एनिमेटेड थे, जिससे बच्चों को समझना आसान हो गया। पहली बार ऐसा हुआ कि मनपा के स्कूलों में प्रवेश पाने के लिए लोग आवेदन और पर्चियां मांगने आने लगे। एसएससी, सीबीएसई और आईसीएसई ये सभी पाठ्यक्रम हमने मनपा के स्कूलों में शुरू किए।
संजय राऊत – मेरी जानकारी के अनुसार, विदर्भ में कुछ स्कूलें गौतम अडानी को दिए गए हैं। यह सिलसिला मुंबई तक पहुंचा है या नहीं, इसकी जानकारी नहीं है। चंद्रपुर, गडचिरोली में ऐसा हो चुका है। महाराष्ट्र का शिक्षा विभाग इतना भी सक्षम नहीं…
उद्धव ठाकरे – पिछले चार वर्षों से यह सब ज्यादा शुरू हुआ है। चंद्रपुर में एक स्कूल उन्हें दिया गया है। भले ही मुंबई मनपा में उनकी सत्ता न आए, लेकिन निजीकरण किया जा सकता है। अस्पतालों के निजीकरण को भी हमने रोका है।
संजय राऊत – उद्धव साहेब, इस समय ‘धुरंधर’ का माहौल है। लोग ‘धुरंधर’ पर चर्चा कर रहे हैं। मुंबई में रहमान डकैत कौन है, ‘धुरंधर’ कौन है। इस पर बातें हो रही हैं। आप दोनों ही राज्य की राजनीति के धुरंधर हैं।
उद्धव ठाकरे – पाब्लो एस्कोबार को भी ढूंढना चाहिए। वह ज्यादा महत्वपूर्ण है।
संजय राऊत- इसी से जुड़ा मेरा सवाल है। मुंबई, ठाणे और नासिक जैसे शहरों में मादक पदार्थ और विभिन्न प्रकार के ड्रग्स आसानी से उपलब्ध हैं। ठाणे में तो हाल ही में साढ़े पांच करोड़ रुपए का मैंड्रेक्स पकड़ा गया। सातारा में उप मुख्यमंत्री के दरवाजे के पास ड्रग्स की पैâक्ट्री पकड़ी गई। मुंबई में कल ही लगभग ढाई–तीन करोड़ रुपए के ड्रग्स पकड़े गए। ऐसा दृश्य इससे पहले महाराष्ट्र में कभी नहीं देखा गया। ये सभी ड्रग्स गुजरात के रास्ते अडानी के स्वामित्व वाले मुंद्रा पोर्ट से आ रहे हैं। क्या यह स्थिति गंभीर नहीं है?
राज ठाकरे – इन सभी बातों का मनपा से सीधा संबंध नहीं है। यह बात समझनी चाहिए। इसके लिए केंद्र और राज्य सरकार जिम्मेदार हैं। ड्रग्स के खिलाफ छापे और कड़ी कार्रवाई पिछले दस वर्षों में बंद हो गई है और अब यह समस्या स्कूलों और बच्चों तक पहुंचने लगी है। यदि इसका सही विश्लेषण किया जाए, तो राजनीति में बढ़ते पैसे और सड़कों पर फैलते ड्रग्स व्यवसाय के बीच क्या संबंध है, इसे जोड़कर देखना चाहिए। चुनावों में होने वाला खर्च और राजनीति में जो चल रहा है, उसी के चलते ड्रग्स सड़कों पर बिक रहा है, लेकिन उन पर न तो छापे पड़ते हैं और न ही कोई रोक लगती है। इस पर केंद्र और राज्य सरकार से सवाल पूछना जरूरी है।
संजय राऊत – हम महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई की बात कर रहे हैं, ठाणे की बात कर रहे हैं, नासिक की बात कर रहे हैं, पर लोगों का सवाल है कि महाराष्ट्र बहुत बड़ा है। सिर्फ मुंबई ही क्यों? हमारे शहरों को भी देखिए, ऐसी पुकार अन्य शहरों से भी हो रही है।
राज ठाकरे – बिल्कुल, लेकिन इन सभी मामलों को देखने वाले विभाग मौजूद हैं। मेरा मानना है कि राज्य सरकार को इन पर स्पष्ट जवाब देना चाहिए।
उद्धव ठाकरे – यहां तो मुख्यमंत्री सबको क्लीन चिट देते हैं, लेकिन कम से कम यह तो बताया जाए कि सातारा में पकड़ी गई वह ड्रग्स पैâक्ट्री आखिर किसकी थी?
संजय राऊत – वहां भी तो क्लीन चिट दे दी गई, है ना?
उद्धव ठाकरे – हम पर आरोप लगाए जा रहे हैं। ये उतना ही कर सकते हैं। लेकिन कभी यह तो देखिए कि उनके खुद के घर में क्या जल रहा है! जब सब कुछ जलकर खाक हो जाएगा, तब देखकर क्या फायदा? उस ड्रग्स मामले में जो लोग शामिल हैं, क्या वे आपके आसपास, आपके साथ उठते-बैठते नहीं हैं? कम से कम यह तो देखिए!
संजय राऊत – हम देख रहे हैं कि राजनीति का जिस तरह से खुलेआम अपराधीकरण हो गया है…
राज ठाकरे – उसके लिए अपराधीकरण से भी बेहतर शब्द है, विकृतिकरण।
संजय राऊत – मैंने अभी ‘धुरंधर’ का उल्लेख किया था। उसमें कराची के लायरी शहर को दिखाया गया है। जिस तरह लायरी शहर के माफियाओं का काम करने का तरीका था, उसी तरह मुंबई, ठाणे, नासिक, पिंपरी-चिंचवड़ और नागपुर जैसे प्रमुख शहरों में भी मिलीभगत से काम किया जा रहा है।
राज ठाकरे – आप केवल बड़े शहरों तक ही सीमित मत रहिए। मराठवाड़ा जाइए, पश्चिम महाराष्ट्र जाइए, विदर्भ जाइए और जो छोटे-छोटे शहर बन रहे हैं, वहां की स्थिति देखिए। हालात बेहद गंभीर हैं।
संजय राऊत – बीड तो है ही, जिसे हम अपराध का ‘बीड पैटर्न’ कहते हैं।
उद्धव ठाकरे – हर तरफ अराजकता ही अराजकता पैâली हुई है। इसीलिए मैंने पहले भी कहा था कि हमारे देश को एक प्रधानमंत्री चाहिए, लेकिन यहां देश को प्रधानमंत्री नहीं मिला है, भाजपा को प्रधानमंत्री मिला है। उसी तरह महाराष्ट्र को मुख्यमंत्री नहीं मिला है। जो है, वह भाजपा का मुख्यमंत्री है। ये सभी लोग सिर्फ अपनी पार्टी और सत्ता में ही डूबे हुए हैं। सत्ता के नशे में चूर हैं। लोग मर जाएं तो भी चलेगा। आम बच्चे ड्रग्स की लत में बर्बाद हो जाएं तो भी चलेगा। ड्रग्स का धंधा करने वाले भी उनके पास बठे हैं तो भी चलेगा। बस उन्हें सत्ता चाहिए। यह जो मानसिकता है, वह अत्यंत घातक है।
संजय राऊत – तो इस पर आप क्या करेंगे? आपके पास तो कानून-व्यवस्था का विभाग भी नहीं है। आपके पास सरकार नहीं है, हां लेकिन आपके पास जन-संगठन तो है ही।
उद्धव ठाकरे – मैं वही तो कह रहा हूं। आखिरकार, जैसा राज ने कहा, सत्ता का हाथ में होना जरूरी है, ताकि कानूनी रूप से प्रतिबंध लगाए जा सकें। मान लीजिए कल हम वहां छापा मारने जाएं और वहां उनके ही पाले-पोसे लोग निकल आएं, तो फिर क्या होगा? नगर परिषद चुनावों के समय मालवण वगैरह उस इलाके में इनके ही एक सहयोगी दल ने दूसरे सहयोगी दल के यहां छापा मारा था। क्या हासिल हुआ? पैसे दिखे, आगे क्या हुआ? क्लीन चिट मिली। फिर इन सबका फायदा क्या?
राज ठाकरे – देखिए, इन सभी चीजों पर कहीं न कहीं रोक लगाने की शुरुआत करने के लिए ये मनपाएं बहुत महत्वपूर्ण हैं। जो कुछ भी आज महाराष्ट्र में चल रहा है, उस पर लोगों को अपना ग़ुस्सा जाहिर करना जरूरी है। यह सत्ता हमें अपने लिए नहीं चाहिए, जो कुछ गलत हो रहा है उस पर रोक लगाना है, उसकी शुरुआत करनी है तो मेरा मानना है कि इस समय मनपाएं बेहद जरूरी हैं। खासकर मुंबई, पुणे, ठाणे, नासिक, मीरा–भायंदर, कल्याण–डोंबिवली, संभाजीनगर और अन्य सभी मनपाओं में अब लोगों को अपना आक्रोश व्यक्त करना चाहिए। अगर लोग फिर से इन्हीं सत्ताधारियों को वोट देते हैं। पैसे से वोट खरीदने जैसी बातों पर तो कोई बात ही नही, लेकिन अगर लोग मतदान के जरिए अपना ग़ुस्सा व्यक्त नहीं करते तो फिर वही हालत होगी। राजा मारे या बारिश पीटे, शिकायत किससे करें?
संजय राऊत – फिर आपसे ही शिकायत करेंगे।
राज ठाकरे – यानी हमारे पास सिर्फ शिकायतें होंगी, वोट नहीं। ऐसा थोड़े ही चलता है।
उद्धव ठाकरे – अब उम्मीदवार एक के बाद एक नाम वापस ले रहे हैं। उन्हें नाम वापस लेने के लिए मजबूर किया जा रहा है। आगे की स्थिति शायद ऐसी हो जाए कि जैसे अमेरिका ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति को उठा लिया था, वैसे ही अब नगराध्यक्षों और महापौरों को उठाकर सूरत ले जाया जाएगा। हमारे मंत्री और विधायक तो पहले ही उठा ले गए थे। जैसे उन मंत्रियों को सूरत और गुवाहाटी ले जाया गया। ट्रंप ने भी वही किया था। इसकी शुरुआत महाराष्ट्र से हो चुकी है।
संजय राऊत – वेनेजुएला देश की आबादी २ करोड़ ३० लाख है और मुंबई की आबादी भी २ करोड़ ३१ लाख है। दोनों जगहों के सवाल एक जैसे हैं। किसी भी तरह का विकास नहीं है। ड्रग्स ही दिखाई देते हैं। अपराध है तो फिर यहां से किसे उठाया जाना चाहिए?
उद्धव ठाकरे – जो ये सब करते हैं, उन्हें तो उठाना ही चाहिए। इन्हें सत्ता चाहिए इसलिए उन्हें सहलाते बैठे हैं। ऐसे लोगों का सत्यानाश तो ही होगा। जो सहलाते हैं मैं उनकी बात कर रहा हूं।
महेश मांजरेकर – आप हर बार कहते हैं कि मतदान मेरा अधिकार है, लेकिन अब जो उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए हैं, वहां मतदाता अपनी उंगली पर काला निशान कैसे लगवाएगा? यानी मेरा मतदान का अधिकार ही छीन रहे हैं, है ना? यह परंपरा की तरह शुरू नहीं होनी चाहिए। ऐसे मामलों में अगर ३० प्रतिशत लोग कहें कि हमें यह उम्मीदवार नहीं चाहिए, तो उसे रद्द किया जाना चाहिए।
राज ठाकरे – बात यह है कि वोटिंग पैड पर ‘नोटा’ का अधिकार है। लेकिन इस नोट (पैसा) की वजह से ही यह समस्या पैदा हुई है।
उद्धव ठाकरे – बांटे गए नोटों की वजह से यह समस्या पैदा हुई है।
महेश मांजरेकर – जहां उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए हैं, वहां तो नोटा दबाने का भी मौका नहीं है।
राज ठाकरे – बिल्कुल! क्योंकि नोटें उन्हें मिल चुकी हैं।
उद्धव ठाकरे – इसका उपाय यह है कि जैसे किसी काम के लिए टेंडर निकाला जाता है और उसमें गड़बड़ी लगती है तो री-टेंडर निकाला जाता है। वैसे ही वहां की चुनाव प्रक्रिया दोबारा चुनाव कराया जाना चाहिए, लेकिन चुनाव आयोग ने क्या किया? उसने नतीजे रोक दिए हैं और उन्हें सभी नतीजों के साथ घोषित करेगा, क्योंकि आयोग उनका गुलाम है। निर्विरोध चुनावों में हम दोनों का एक भी उम्मीदवार नहीं है? शरद पवार साहब की राष्ट्रवादी का भी एक भी उम्मीदवार नहीं है? यह महज संयोग है या कुछ और? जेन-जी अब हर जगह असर डालने वाला शब्द बन गया है। इन सभी जगहों पर पहली बार मतदान करने वाले जेन-जी युवा, निर्विरोध चुनावों की वजह से बेहद असंतुष्ट हैं। उनके दिमाग में जो आग है, अगर वह बाहर आ गई तो फिर इनकी हालत खराब हो जाएगी।
संजय राऊत – उद्धव साहब, आप जेन-जी का जिक्र कर रहे हैं, लेकिन नेपाल हो, बांग्लादेश हो या अन्य देश वहां गुस्से और आक्रोश से भरा जेन-जी सचमुच सड़कों पर उतरा। अपने यहां का जेन-जी खास विचारधारा का गुलाम बनता जा रहा है। यह जेन-जी अब आपसे उम्मीद लगाए बैठा है।
राज ठाकरे – मुझे बस इतना लगता है कि जिस तरह का राजनीतिक खेल आज महाराष्ट्र और देश में चल रहा है, उसे देखकर मेरे मन में सच में सवाल उठता है। क्या देवी-देवता हैं? और अगर हैं तो वे सब यह देखकर चुपचाप क्यों बैठे हैं?
संजय राऊत – ३३ करोड़…
राज ठाकरे – अगर वे इतने हैं, तो फिर ये सब कुछ देखकर वे चुप क्यों बैठे हैं?
(क्रमश:)
