श्रीकिशोर शाही
९० का दशक। फ्लोरिडा का पाम बीच। पास में ‘मार-अ-लागो’ क्लब। रात गहराती जा रही थी, लेकिन क्लब के भीतर समय ठहर सा गया था। रंगीन रोशनी लाल से नीली, नीली से बैगनी होती जा रही थी। तेज संगीत की आवाज ऐसी थी कि लोगों को एक-दूसरे के कान के पास आकर बात करनी पड़ रही थी। डांस फ्लोर पर लड़कियां नाच रही थीं। मेजों पर बोतलें खुली थीं। हंसी, शोर और उस शोर के बीच पैसों की होती बारिश। एक टेबल पर करीब ६० साल का एक आदमी आराम से बैठा था। सुनहरे-क्रीम रंग के बाल, ढीला सूट, हाथ में व्हिस्की का ग्लास। वह कमरे को ऐसे देख रहा है जैसे यह कोई नई जगह नहीं, बल्कि उसकी आदत हो। यह डोनाल्ड ट्रंप था, न्यूयॉर्क का एक रसूखदार रियल एस्टेट कारोबारी। उन दिनों होटल, टावर, कैसीनो की उसके नाम से जुड़ी खबरें अखबारों में रोज छपती थीं। अभी वह राजनीति में नहीं आया था इसलिए उसे अपनी रंगीन तबीयत को गुलजार करने के लिए किसी की परवाह भी नहीं थी।
ट्रंप ने ग्लास उठाया और एक सिप लिया। तभी कोई उसकी कुर्सी के पास रुका और बोला, ‘हाय, डोनाल्ड।’
ट्रंप ने नजरें उठाई, सामने खड़े दुबले शरीर वाले आदमी को देखा। चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान। ‘हैलो,’ ट्रंप ने कहा। यह जेफरी एपस्टीन था। उनकी बॉडी लैंग्वेज से साफ था कि वे पुराने परिचित थे। दरअसल, इससे पहले भी कुछ पार्टियों में दोनों आमने-सामने आ चुके थे। न्यूयॉर्क और फ्लोरिडा की यह दुनिया बहुत बड़ी नहीं थी। एपस्टीन पास की कुर्सी खींचकर बैठ गया।
‘अच्छी जगह है,’ वह कहता है।
‘मेरी है,’ ट्रंप हल्की मुस्कान के साथ जवाब देता है।
दोनों हंसते हैं। फिर दोनों के बीच कानों में कुछ खुसुर-फुसुर होने लगी। दोनों क्या बात कर रहे थे, यह किसी को पता नहीं चला क्योंकि वहां तेज संगीत जो बज रहा था। कुछ देर बाद ट्रंप किसी और मेज की ओर बढ़ गया। एपस्टीन वहीं बैठा रह जाता है। मुलाकात खत्म। कोई हाथ मिलाना भी जरूरी नहीं।
ऐसी ही रातें थीं।
ऐसी ही मुलाकातें। अगले कुछ वर्षों में वे कई बार एक ही प्रâेम में दिखे। कभी इसी क्लब की पार्टियों में, कभी न्यूयॉर्क के आयोजनों में। कैमरे क्लिक करते रहे। तस्वीरें बनती रहीं। किसी ने उन्हें ध्यान से नहीं देखा। वे सिर्फ यह बताती थीं कि ये दोनों एक ही दुनिया के लोग थे। उनके बीच कोई कागजी रिश्ता नहीं था। कोई कंपनी साझा नहीं थी। वे बस एक ही दायरे में घूम रहे थे, प्राइवेट जेट, बंद क्लब, सीमित मेहमान। ऐसी दुनिया जहां आज की रात कल किसी को याद नहीं रहती। ट्रंप और एपस्टीन की यह दोस्ती क्या गुल खिला रही थी, इसका पता उस वक्त किसी को नहीं था। न ही यह पता था कि एपस्टीन कमसिन बालाओं का सौदागर है।
(शेष अगले अंक में)
