सुनील ओसवाल
मुंबई में आसमान जितना ऊंचा है, उतना ही ऊंचा है जमीन का सौदा। हर गली में पुनर्विकास, हर चौराहे पर परियोजना, हर दफ्तर में फाइल। और इन सबका पहला दरवाजा- सब-रजिस्ट्रार कार्यालय। यहीं सपने रजिस्ट्री बनते हैं और यहीं से कई जिंदगियां मुकदमे बन जाती हैं। संपत्ति के दस्तावेजों का पंजीकरण, खरीद-फरोख्त के एग्रीमेंट, गिफ्ट डीड (दानपत्र), लीज डीड / किराया अनुबंध, डेवलपमेंट एग्रीमेंट, पावर ऑफ अटॉर्नी ( मुख्तारनामा), मॉर्गेज डीड (बंधक), इससे सरकार को स्टांप ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन फीस भारी मात्रा में मिलती है।
राज्य सरकार की ओर से स्टांप ड्यूटी वसूलना, दस्तावेज पर ई-स्टांप/पैंâकिंग की जांच, रजिस्ट्रेशन शुल्क लेना, सरकारी रिकॉर्ड में एंट्री करना ये काम यहां होते हैं। इस व्यवस्था की असली तस्वीर जानने के लिए हमने भाषण नहीं सुने, दावों के पोस्टर नहीं पढ़े- हमने सरकार की अपनी खिड़की खोली। महाराष्ट्र सरकार के पंजीकरण एवं मुद्रांक विभाग के आधिकारिक तक्रार निवारण पोर्टल पर। जो सामने आया, वह चौंकाने वाला नहीं, शर्मनाक है। मुंबई शहर और उपनगर से जुड़ी ५,४५४ शिकायतें। सरकारी पोर्टल पर दर्ज। सरकारी मुहर के साथ। सरकारी व्यवस्था के खिलाफ। इनमें से ४,८६१ शिकायतें निपटाई गई बताई गई हैं और ७,०९३ शिकायतें आज भी अटकी हैं। ये कोई अटकल नहीं। ये वही अंक हैं, जो महाराष्ट्र सरकार की अपनी वेबसाइट पर दिखते हैं। लेकिन यहीं कहानी खत्म नहीं होती। यहीं से असली कहानी शुरू होती है।
इन पांच हजार से ज्यादा शिकायतों में कितनी गलत रजिस्ट्री की हैं? कितनी पुनर्विकास और झोपड़पट्टी पुनर्वसन से जुड़ी हैं? कितनी दलालों की मनमानी, कर्मचारियों की दबंगई और जानबूझकर की गई देरी की हैं? इसका कोई सार्वजनिक जवाब नहीं। सरकारी पोर्टल पर न महीना लिखा है, न साल, न दफ्तर, न कारण। सिर्फ कुल संख्या। यानी सरकार जानती है, लेकिन जनता को नहीं बताती और इसी परदे के पीछे उभरती है मुंबई की सबसे असहज तस्वीर। नई मुंबई, ठाणे और बांद्रा–कुर्ला संकुल के कई सब-रजिस्ट्रार कार्यालयों के बाहर रोज सुबह से शाम तक दलालों की भारी भीड़ देखी जा सकती है। ये दलाल सरकारी तौर पर नियुक्त नहीं हैं। इनके पास कोई अधिकृत पहचान नहीं। फिर भी नागरिकों, दस्तावेज और वकीलों की खुली शिकायत है कि मध्यस्थी के बिना यहां कोई काम आगे नहीं बढ़ता।
तारीख चाहिए, दस्तावेजों में सुधार चाहिए या कागज ‘चलवाने’ हैं- आम धारणा बन चुकी है कि दलालों के बिना फाइल अटक जाती है। इन दलालों का दफ्तरों के भीतर कामकाज में सीधा हस्तक्षेप होने की चर्चा आम है। इस पर शिकायतें भी हुई हैं, लेकिन कार्रवाई नहीं के बराबर। और इससे भी ज्यादा गंभीर एक और बात बार-बार सुनाई देती है। कुछ सब-रजिस्ट्रार कागजों में तो साधारण सरकारी अधिकारी हैं, लेकिन वास्तविक जीवन में बड़े निवेशकों जैसी स्थिति में नजर आते हैं। नाम किसी का नहीं, संपत्ति किसी के नाम नहीं, लेकिन दफ्तरों में पकड़, बाहर प्रभाव और जीवनशैली सवाल खड़े करती है। यह सब गलियारों की हवा नहीं है। इन्हीं आशंकाओं की छाया सरकारी पोर्टल पर दर्ज हजारों शिकायतों में भी दिखाई देती है। सरकार कहती है, तीन-स्तरीय शिकायत व्यवस्था है। पहले दफ्तर, फिर जिला, फिर संभाग और कुछ ही दिनों में समाधान का वादा। लेकिन अगर व्यवस्था सच में इतनी चुस्त होती, तो आज भी सैकड़ों शिकायतें क्यों लटकी होतीं? और उनसे भी बड़ा सवाल, उन शिकायतों का पूरा ब्योरा जनता से क्यों छुपाया गया?
