अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समग्र व्यवहार को देखते हुए अमेरिकी जनता को उन्हें दूसरी बार राष्ट्रपति चुनने पर पछतावा हो रहा होगा। वैश्विक महाशक्ति के मुखिया होने की बात भूलकर राष्ट्रपति ट्रंप जिस तरह से व्यवहार कर रहे हैं, उससे पूरी दुनिया में अमेरिका का मजाक उड़ रहा है। अमेरिका की गहरी लोकतांत्रिक सोच वाली जनता को अपने राष्ट्रपति के दिन-प्रतिदिन बढ़ते बचकानेपन पर शर्म आ रही होगी। राष्ट्रपति ट्रंप का यह नया बचकानापन नोबेल शांति पुरस्कार के मामले में एक बार फिर सामने आया है। पिछले कुछ महीनों से ट्रंप इसी जिद पर अड़े हुए हैं कि ‘परंपरा टूटे या न टूटे, मुझे नोबेल पुरस्कार मिलना ही चाहिए’ और अब उन्होंने इसे हद से ज्यादा कर दिया है। ट्रंप ने नोबेल पुरस्कार देनेवाले देश नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास स्टोर को सीधे धमकी भरा पत्र भेजा है। ‘आपने मुझे नोबेल शांति पुरस्कार नहीं दिया इसलिए अब मुझसे शांति की उम्मीद मत कीजिए।’ यह पत्र चेतावनी से ज्यादा एक तरह की चेतावनी है कि शांति अब मेरी प्राथमिकता नहीं है और शांति स्थापित करना अब मेरा कर्तव्य नहीं है। राष्ट्रपति ट्रंप का नॉर्वे के प्रधानमंत्री को लिखा यह पत्र बचकानेपन की पराकाष्ठा है। यह कुछ वैसा ही है जैसे जूनियर केजी या किंडरगार्टन के बच्चे खेलते समय आपस में लड़ते हैं और जब कोई चीज उनके मन-मुताबिक नहीं होती तो ‘कट्टी’ कर लेते हैं या जब उन्हें चॉकलेट नहीं मिलती तो नाराज हो जाते हैं।
नोबेल पुरस्कार न मिलने के कारण
नाराज राष्ट्रपति ट्रंप ने अपना गुस्सा जाहिर करते हुए पत्र में आगे लिखा, ‘मैंने हाल के समय में दुनिया में आठ युद्धों को रोका है। फिर भी, आपके देश ने युद्ध रोकने के मेरे प्रयासों पर ध्यान नहीं दिया। शांति के लिए मेरे प्रयासों को देखते हुए भी आपके देश ने मुझे नोबेल शांति पुरस्कार नहीं दिया इसलिए अब से मुझे शांति के बारे में सोचने की जरूरत नहीं है। अब से मैं यह सोचूंगा कि अमेरिका के लिए शांति से बेहतर क्या है।’ ट्रंप ने इस धमकी भरे पत्र में डेनमार्क के नियंत्रण वाले ग्रीनलैंड पर कब्जा करने का इरादा भी जाहिर किया है। अमेरिका आर्कटिक क्षेत्र के इस खूबसूरत द्वीप को, जिसकी आबादी मुश्किल से ६० हजार है, किसी भी कीमत पर हासिल करना चाहता है। दुनिया के सबसे बड़े द्वीप ग्रीनलैंड का ८० प्रतिशत हिस्सा हमेशा बर्फ से ढंका रहता है। ट्रंप का दावा है कि अगर भविष्य में रूस और चीन इस स्वायत्त द्वीप पर कब्जा करने की कोशिश करते हैं तो अपेक्षाकृत कमजोर डेनमार्क इसका विरोध नहीं कर पाएगा। अगर ऐसा होता है तो अमेरिका रूस और चीन जैसे दुश्मनों के अमेरिका के दरवाजे तक आने के डर से ग्रीनलैंड में एक सैन्य अड्डा स्थापित करना चाहता है। ट्रंप ब्रिटेन, जर्मनी, इटली, प्रâांस आदि जैसे ‘नाटो’ देशों के विरोध की परवाह किए बिना ग्रीनलैंड पर कब्जा करना चाहते हैं। एक ओर तो वे इसे शांति पुरस्कार के दावेदार के रूप में पेश करना चाहते हैं, वहीं दूसरी ओर ईरान, ग्रीनलैंड, क्यूबा, कोलंबिया आदि देशों पर हमला करके साम्राज्यवाद और विस्तारवाद का रवैया दिखाना चाहते हैं। ऐसा
भयंकर विरोधाभास
ट्रंप ही हैं जो इसे दुनिया को दिखाते हैं। असल में लोकतंत्र, स्वतंत्रता, समानता और शांति के लिए लड़नेवाले लोग कभी पुरस्कारों के पीछे नहीं भागते, लेकिन ट्रंप का तरीका कुछ अलग है। ‘मुझे वेनेजुएला चाहिए, मुझे ग्रीनलैंड चाहिए, मुझे ईरान पर नियंत्रण चाहिए और मुझे नोबेल शांति पुरस्कार भी चाहिए,’ ऐसी बेतुकी और हास्यास्पद मांगें सिर्फ ट्रंप ही कर सकते हैं। दरअसल, नोबेल शांति पुरस्कार नॉर्वे सरकार द्वारा नहीं दिया जाता। दिवंगत रसायनज्ञ और उद्योगपति अल्प्रâेड नोबेल की वसीयत के मुताबिक हर छह साल में बदलने वाली एक चयन समिति शांति, साहित्य और विज्ञान के नोबेल पुरस्कार विजेताओं का चयन करती है। नॉर्वे सरकार का इस पर कोई नियंत्रण नहीं है। यह बात नोबेल पुरस्कार के लिए ‘बाल हट्ट’ धरनेवाले ट्रंप को नॉर्वे के प्रधानमंत्री ने बार-बार बताई है, फिर भी ट्रंप द्वारा इस तरह का धमकी भरा पत्र लिखना एक विश्व महाशक्ति के लिए शर्मनाक है। अमेरिका का मूल व्यवसाय दुनियाभर में संघर्ष भड़काना और शत्रुता व द्वेष पैदा करके अनगिनत देशों को हथियार मुहैया कराना है। इसके अलावा, डोनाल्ड ट्रंप के शासनकाल में इस देश पर कब्जा करने और उस देश पर हवाई हमले करने का अमेरिका का पारंपरिक धंधा और भी बढ़ गया है, फिर भी श्री ट्रंप किसी भी कीमत पर नोबेल शांति पुरस्कार चाहते हैं और इसके लिए उन्होंने नॉर्वे के प्रधानमंत्री को धमकीभरा पत्र लिखा है। क्या शांति प्रयासों और बचकानेपन की यह हद नहीं है? ‘नोबेल’ पुरस्कार चयन समिति को अब बचकानेपन के लिए ही एक पुरस्कार शुरू कर देना चाहिए और ट्रंप की इस ‘जिद’ को पूरा करना चाहिए।
