राजन पारकर
मुंबई लूटी गई!
मुंबई लूटी गई!!
मुंबई लूटी गई!!!
यह वाक्य अब इतना घिस चुका है कि लगता है किसी ने इसे चुनावी घोषणापत्र में छापकर बेचना शुरू कर दिया है! लेकिन मजे की बात यह है कि इतनी बड़ी लूट हुई बताई जाती है, फिर भी न चोर मिलता है, न चोरी का माल। न एफआईआर, न चार्जशीट, न अदालत का पैâसला! लूट हो गई, लेकिन सबूत अब भी ढूंढे जा रहे हैं! कागज नहीं तो आरोप भी कागजी ही!
कहा जाता है कि २५ साल मुंबई लूटी गई। तो सवाल यह है कि यह लूट कागजों पर क्यों नहीं है? एक भी वैâग रिपोर्ट दिखाइए। एक भी एफआईआर दिखाइए। क्या एक भी दोषी ठहराया गया? आरोपी दिखाइए या यह लूट सिर्फ माइक पर ही होती है और फाइल खुलते ही अचानक ईमानदारी जाग जाती है? सत्ता आपकी, फिर भी जेलें खाली क्यों? २०१४ से दिल्ली आपकी, मंत्रालय आपका, तंत्र आपका, ईडी–सीबीआई आपके हाथ में! फिर भी मुंबई महानगरपालिका का एक भी ‘महाभ्रष्ट’ जेल में क्यों नहीं? क्या भ्रष्टाचार सिर्फ विपक्ष में ही होता है और सत्ता में आते ही सब ‘साधु-संत’ बन जाते हैं? गठबंधन में पुण्य, अलग होते ही पाप! २५ साल की लूट कहते हैं, लेकिन उन २५ सालों में कई साल गठबंधन में थे। है न? तब पैâसले सामूहिक, अब दोष एकतरफा? स्थायी समिति में भाजपा के नगरसेवक सिर्फ चाय-पानी पीने बैठे थे क्या? ठेके, सड़कें, नाले, कचरा इन सब पर क्या सिर्फ एक ही पार्टी की मोनोपॉली थी? क्या हाथ दोनों के और जेब चुनाव के हिसाब से बदलती है?
प्रशासक था, पर जांच नहीं! मनपा पर प्रशासक नियुक्त हुआ। पूरी सत्ता हाथ में किसी का दबाव नहीं। तो गहन जांच क्यों नहीं? लूट उजागर क्यों नहीं? या जांच होती तो आईने में अपना ही चेहरा दिखने का डर था? मुंबई कमाती है, पर मालिक कौन? ९२ हजार करोड़ की एफडी पर राज्य सरकार का अधिकार किस कानून के तहत? मुंबई का पैसा राज्य कोष में विकास है या डवैâती? मुंबईकर कमाएं, दिल्ली-मंत्रालय तय करे, और दोष दूसरों पर डाल दिया जाए! डबल इंजन, पर शहर पटरी पर नहीं! डबल इंजन सरकार कहते हैं! लेकिन सड़कें अब भी गड्ढों में। नाले जाम। ट्रैफिक ठप। आवास सपनों में। इंजन दौड़ रहे हैं, पर दिशा कौन-सी? या इंजन सिर्फ भाषणों की रेलगाड़ी में ही तेजी में है?
मुंबई का युवा बेरोजगार!
उद्योग महाराष्ट्र से बाहर जा रहे हैं, खासकर गुजरात की ओर। मुंबई का युवा बेरोजगार! ‘पहला हक स्थानीय का’ यह सिद्धांत आपके लिए सिर्फ पुराना पोस्टर है क्या? डोमिसाइल, स्थानीय नौकरियां, स्थानीय परमिट कानून बनाएंगे या फिर चुनाव आने तक भूल जाएंगे? वंदनीय बालासाहेब नाम लो, विचार छोड़ो! जब बालासाहेब ठाकरे जीवित थे, क्या उनकी विचारधारा को कभी अपनाया? आज नाम लेना है, तस्वीर लगानी है, लेकिन एक भी सिद्धांत लागू किया है क्या? या बालासाहेब सिर्फ भाषणों में चाहिए और विचार फाइलों में बंद? असली सवाल, क्या जनता मूर्ख है? अगर शिवसेना ने मुंबई लूटी, तो दोषियों को बचाया किसने? और अगर दोषी मिल ही नहीं रहे तो सवाल बचता है कि लूट हुई ही नहीं या हुक्मरानों की लुटेरों को पकड़ने की इच्छा ही नहीं? जहां आरोप पहाड़ जैसे हों और सबूत शून्य, वहां राजनीति सर्कस बन जाती है और जनता दर्शक! मुंबई को लूटने की बरसात बहुत हो गई। मुंबई को लूटने का स्यापा बहुत हो गया। अब सबूत दीजिए वरना इतिहास लिखेगा, ‘आरोप बड़े थे, पर सत्य को आज भी कोई वार्ड नहीं मिला!’
