सामना संवाददाता / मुंबई
मनपा में सत्ता के समीकरण बनते ही शुरू हुई होटल पॉलिटिक्स के चलते शिंदे गुट अचानक सुर्खियों के केंद्र में आ गया। मुंबई मनपा चुनाव में भाजपा को ८९ सीटें और शिंदेसेना को २९ सीटें मिलीं। बहुमत के आंकड़े तक पहुंचने के लिए भाजपा को शिंदे गुट के समर्थन की जरूरत है, लेकिन नतीजों के ठीक अगले दिन जो हुआ, उसने राजनीतिक गलियारों में भूचाल ला दिया। शिंदे के सभी नवनियुक्त नगरसेवकों को पंचसितारा होटल में ‘शिविर’ के नाम पर वैâद कर दिया गया। अब तीन दिन बाद उन्हें छोड़ने के लिए बिल्कुल जेल से रिहाई की तरह उनके सभी जरूरी कागजात जमा करा लिए गए हैं।
शिंदे ने सभी नगरसेवकों के मूल दस्तावेज अपने पास जमा कर लिए हैं। इनमें १६ जनवरी को चुनाव परिणाम के बाद जारी हुआ निर्वाचन प्रमाणपत्र और सभी नगरसेवकों के आधार कार्ड शामिल हैं। पार्टी सूत्रों के अनुसार, होटल से बाहर निकलने से पहले नगरसेवकों से यह भी लिखवाया गया कि वे कहीं नहीं जाएंगे और पार्टी लाइन से बाहर कदम नहीं रखेंगे। १६ जनवरी को नतीजे आने के बाद १७ जनवरी से शिंदे के सभी नगरसेवक होटल में बंद थे।
किस तोड़नेवाले का था डर
एकनाथ शिंदे ने भले ही नगरसेवकों को टूट से बचाने के लिए यह कदम उठाया हो, लेकिन राजनीतिक हलकों में सवाल यही गूंजता रहा कि आखिर डर किसका था और तोड़ने वाला कौन था? होटल पॉलिटिक्स, दस्तावेजों की जब्ती और हलफनामे की शर्त ने यह साबित कर दिया कि शिंदेसेना के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है।
होटल में नजरबंद नगरसेवक थे बेचैन
लगातार तीन दिन तक होटल में रखे जाने से नगरसेवकों में भारी बेचैनी पैâल गई थी। वे न तो अपने मतदाताओं का आभार जता पाए, न ही जीत का जश्न मना सके। यह पूरा घटनाक्रम साफ तौर पर टूट-फूट की राजनीति के डर को उजागर करता है। जबकि शिंदे गुट की ओर से इसे प्रशिक्षण शिविर बताया गया, लेकिन पर्दे के पीछे मेयर पद के लिए भाजपा पर दबाव बनाने की रणनीति की चर्चा जोर पकड़ने लगी। विपक्ष ही नहीं, खुद महायुति के भीतर भी इस कदम को खुलेआम ब्लैकमेलिंग की राजनीति माना गया।
