कविता श्रीवास्तव
मौनी अमावस्या के पावन पर्व पर तीर्थराज प्रयाग में संन्यासियों के शीर्ष आचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को पवित्र स्नान से रोके जाने और उनके काफिले में शामिल साधु-संन्यासियों व बटुक ब्राह्मणों के साथ किए गए अमानवीय व्यवहार ने पूरे देश को झकझोर दिया है। यह घटना केवल एक व्यक्ति या एक संत समाज तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक संवेदनशीलता, लोकतांत्रिक मूल्यों और धार्मिक स्वतंत्रता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है। संत, साधना और सहिष्णुता की परंपरा वाली भारत भूमि पर इस प्रकार का दमनकारी दृश्य सामने आना अत्यंत पीड़ादायक है। घटना के प्रत्यक्षदर्शी वीडियो और समाचारों से स्पष्ट होता है कि साधु-संन्यासियों और वेद अध्ययन करनेवाले कोमल हृदय बालकों के साथ अत्यधिक बल प्रयोग किया गया। उन्हें जमीन पर पटकना, शिखा पकड़कर खींचना, लात-घूंसों और बूटों से रौंदना न केवल कानून की मर्यादाओं का उल्लंघन है, बल्कि मानवीय संवेदना के भी खिलाफ है। यह सोचकर मन आहत होता है कि जिन बच्चों का जीवन संस्कार, साधना और शास्त्रों के अध्ययन में बीत रहा है, उनके साथ प्रशासन के प्रतिनिधियों ने इस प्रकार का क्रूर व्यवहार किया। इससे भी अधिक चिंताजनक तथ्य यह है कि पुलिस प्रशासन ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को उनके सहयोगियों से अलग कर, भीड़ में इधर-उधर घुमाते हुए घंटों तक असुरक्षित स्थिति में छोड़ दिया। यह उनकी सुरक्षा के लिहाज से अत्यंत संवेदनशील और खतरनाक स्थिति थी। इसके बावजूद महाराजश्री ने संयम और धैर्य का परिचय दिया। वे बार-बार आग्रह करते रहे कि उनके सहयोगियों को छोड़ दिया जाए और इस घटना को विवाद का विषय न बनाया जाए, किंतु प्रशासन ने उनकी बातों की अनदेखी की। यह घटना हमें मुगलों और अंग्रेजों के शासनकाल के उन प्रसंगों की याद दिलाती है, जब सत्ता के बल पर धार्मिक और सामाजिक स्वतंत्रताओं को कुचला जाता था। आज स्वतंत्र और लोकतांत्रिक भारत में ऐसी घटनाओं का दोहराया जाना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। लोकतंत्र की आत्मा संवाद, सहिष्णुता और संवेदनशीलता में निहित होती है, न कि दमन और बल प्रयोग में। यदि किसी प्रकार की अव्यवस्था या विवाद उत्पन्न हो, तो उसे शांतिपूर्ण और कानून सम्मत तरीके से सुलझाया जा सकता था। संत समाज, धार्मिक संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों द्वारा इस घटना की निंदा स्वाभाविक है। यह प्रकरण धार्मिक स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों की रक्षा के प्रति प्रशासन की प्रतिबद्धता पर गंभीर प्रश्न उठाता है। यह संत समाज के सम्मान और भारतीय संस्कृति की मूल भावना के भी विपरीत है, जिसमें साधु-संतों को सदा आदर और संरक्षण का स्थान दिया गया है। आवश्यक है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच हो तथा दोषियों पर उचित कार्रवाई हो। यही न्याय, संविधान और मानवीय मूल्यों की सच्ची रक्षा होगी।
