सुनील ओसवाल
महाराष्ट्र में हर साल सैकड़ों लोग सांप के काटने से मरते हैं। ये मौतें जंगलों में नहीं, खेतों में होती हैं। ये मौतें पहाड़ों में नहीं, घरों में होती है। और इन मौतों का सबसे बड़ा कारण जहर नहीं, व्यवस्था की देरी, भ्रम और लापरवाही होती है। अब राज्य सरकार ने अचानक एलान किया है कि वह ‘स्नेक वेनम रैपिड टेस्ट किट’ खरीदेगी, जिससे यह तुरंत तय हो सकेगा कि काटने वाला सांप विषैला था या नहीं। सरकार ने इसके लिए करीब ६.१४ करोड़ रुपए खर्च करने का फैसला लिया है और बताया जा रहा है कि करीब १ लाख २० हजार से ज्यादा किट खरीदी जाएंगी, जिनकी कीमत लगभग ४५७ रुपए प्रति किट होगी। कहा जा रहा है कि ये किट मुंबई समेत पूरे राज्य के सरकारी अस्पतालों, जिला अस्पतालों और ग्रामीण प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में दी जाएंगी।
सवाल यह नहीं है कि किट गलत है या सही। सवाल यह है कि जिन मौतों का सिलसिला सालों से चल रहा था, उनके वक्त सरकार कहां थी?
सरकार खुद मान रही है कि अब तक सबसे बड़ी दिक्कत यह थी कि डॉक्टर यह तय नहीं कर पाते थे कि सांप विषैला था या नहीं यानी सालों तक महाराष्ट्र का इलाज-तंत्र अंदाजों पर चलता रहा। कहीं एंटी-स्नेक वेनम दे दी गई, कहीं डर के कारण नहीं दी गई, कहीं देरी हो गई और जब मरीज मर गया, तो रिपोर्ट में ‘सर्पदंश’ लिखकर फाइल बंद। अब अचानक सरकार कह रही है कि एक किट आएगी और तस्वीर बदल जाएगी। इसका मतलब साफ है- सरकार अप्रत्यक्ष रूप से यह स्वीकार कर रही है कि अब तक की पूरी व्यवस्था अधूरी और असफल थी।
जमीन पर हालात आज भी वही हैं। राज्य के सैकड़ों प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र डॉक्टरों के बिना चल रहे हैं। कई ग्रामीण अस्पतालों में एंटी-स्नेक वेनम नियमित रूप से उपलब्ध नहीं है। कई तहसीलों में आज भी एंबुलेंस समय पर नहीं पहुंचती। आज भी आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में सर्पदंश के बाद पहला रास्ता अस्पताल नहीं, ओझा-गुनी का होता है, क्योंकि सरकारी सिस्टम पर भरोसा टूट चुका है। ऐसे में सवाल उठता है- क्या एक रैपिड किट इस पूरे चरमराते ढांचे की भरपाई कर देगी?
सरकार ने यह भी बताया है कि यह किट बंगलुरु की एक निजी कंपनी द्वारा विकसित तकनीक पर आधारित है। लेकिन यह नहीं बताया गया कि इस किट का महाराष्ट्र जैसे ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में बड़े पैमाने पर फील्ड ट्रायल कब और कहां हुआ, इसकी सटीकता का स्वतंत्र वैज्ञानिक मूल्यांकन किस संस्था ने किया और आपात स्थितियों में इसकी विश्वसनीयता कितनी है। करोड़ों रुपए की खरीद का पैâसला हो गया, लेकिन पारदर्शिता अब भी फाइलों में बंद है। क्या यह पैâसला किसी व्यापक सर्पदंश नीति का हिस्सा है या फिर एक और तात्कालिक खरीद, जिससे सरकार यह कह सके कि ‘हमने कुछ किया’?
सवाल सिर्फ पैसों का नहीं है, सवाल जवाबदेही का है। अगर कल यह किट समय पर अस्पतालों तक नहीं पहुंची, अगर मशीनरी ने जवाब दे दिया, अगर गलत रिपोर्ट के कारण इलाज में देरी हुई, तो जिन जिंदगियों की कीमत चुकानी पड़ेगी, उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या कोई मंत्री, कोई सचिव, कोई स्वास्थ्य अधिकारी आगे आकर यह कहेगा कि ‘यह हमारी नाकामी थी’?
असल सच्चाई यह है कि महाराष्ट्र में सर्पदंश कोई नई आपदा नहीं है। यह सालों से जानी-पहचानी त्रासदी है। इसके बावजूद न तो राज्य में विशेष सर्पदंश उपचार नेटवर्क खड़ा किया गया, न ही हर ग्रामीण अस्पताल को पूरी तरह सक्षम बनाया गया, न ही सर्पदंश मौतों का कोई पारदर्शी सामाजिक ऑडिट हुआ। सरकार अब एक तकनीकी उपकरण को समाधान बताकर उस पूरी नाकामी पर पर्दा डालना चाहती है। अगर यह पैâसला ईमानदार है, तो इसके साथ यह भी घोषित होना चाहिए था कि हर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में प्रशिक्षित डॉक्टर अनिवार्य होंगे, हर ग्रामीण अस्पताल में एंटी-स्नेक वेनम की शून्य-कमी नीति लागू होगी, हर सर्पदंश मौत की सार्वजनिक समीक्षा होगी और आपातकालीन रिस्पॉन्स सिस्टम को जमीनी स्तर पर बदला जाएगा। लेकिन अभी तक सरकार ने सिर्फ किट की बात की है, सिस्टम की नहीं। क्योंकि सच्चाई यही है-जहर सिर्फ सांप में नहीं होता। जहर उस व्यवस्था में होता है, जो सालों तक मरने देती है और फिर एक दिन कहती है- अब हमने समाधान ढूंढ लिया है। अगर समाधान इतना ही आसान होता, तो महाराष्ट्र का ग्रामीण इलाका कब का सर्पदंश से होनेवाली मौतों से बच गया होता।
