सामना संवाददाता / लखनऊ
स्थापना के बाद से ही नाम बदलने को लेकर चर्चाओं में रहा सहारनपुर मेडिकल कॉलेज यह बात अलग है कि वहां बीमारों को सुविधाएं मिल रही है या नहीं इस पर चर्चा होती ही नहीं क्योंकि सुविधाएं सत्ता के गलियारे से होकर गुजरती है और सत्ता का दरवाजा सुविधाओं के नाम पर खुलता ही नहीं वह तो बस अपने एजेंडे पर काम करते हैं जनसुविधाओं से कोई सरोकार नहीं है। खैर नाम को लेकर उठा विवाद हमें एक बार फिर उस पुराने सवाल के सामने खड़ा करता है क्या हम इतिहास को समझते हैं, या उसे अपने-अपने खांचे में ढालना चाहते हैं? शेखुल हिन्द हज़रत मौलाना महमूदुल हसन देवबन्दी रह. का नाम सिर्फ़ एक व्यक्ति का नाम नहीं, बल्कि हिंदुस्खान की आज़ादी की तहरीक का एक जज़्बाती और ऐतिहासिक दस्तावेज़ है यह बात सही है लेकिन बसपा सरकार में काशीराम के नाम पर बना सहारनपुर मेडिकल कॉलेज को सपा कंपनी की सरकार ने सस्ती लोकप्रियता के चलते शेखुल हिन्द हजरत मौलाना महमूदुल हसन रह. के नाम पर कर दिया था जबकि वह बहुत बड़ी अजीम शख्सियत थी उनके नाम ऐसे किसी और के नाम से बने किसी कॉलेज या अन्य का नामकरण करना गलत था जब भी विवाद हुआ था और अब एक नया विवाद 2007 में बसपा से विधायक रहे मनोज चौधरी के उस बयान से पैदा हो गया है जिसमें उन्होंने अपनी जाति गुर्जर समाज के सम्मेलन में यह कहा कि भाजपा हमारे समाज को सिर्फ़ वोटबैंक समझती है उसे सम्मान नहीं देना चाहती है अगर वह हमारे समाज को सम्मान देना चाहती है तो सहारनपुर मेडिकल कॉलेज का नाम महाराजा मिहिर भोज के नाम किया जाना चाहिए और उन्होंने सम्मेलन में मौजूद कैराना सांसद इकरा हसन चौधरी से फोज में गुर्जर रेजिमेंट बनाने के लिए संसद में आवाज़ उठाने की मांग की। शेखुल हिन्द अकैडमी के अध्यक्ष हाजी रियाज़ महमूद ने पूर्व विधायक मनोज चौधरी के द्वारा शेखुल हिन्द मेडिकल कॉलेज सहारनपुर का नाम बदलने की मांग का पुरजोर विरोध किया और कहा कि उनके नाम पर किसी संस्थान का होना महज़ प्रतीक नहीं, बल्कि उस विरासत का सम्मान है, जिसे हमने बड़ी कुर्बानियों से हासिल किया। ऐसे में जब नाम बदलने की बात उठती है चाहे वह किसी भी मंशा से क्यों न हो तो सवाल सिर्फ़ एक नाम का नहीं रहता, बल्कि उस सोच का हो जाता है जो इतिहास को प्रतिस्पर्धा में बदल देती है। राजा मिहिर भोज हों या कांशीराम भारत की धरती पर हर महापुरुष का अपना स्थान है। लेकिन एक को स्थापित करने के लिए दूसरे को हटाना, यह परंपरा नहीं, राजनीति है। हालांकि पूर्व विधायक मनोज चौधरी ने अपनी सफाई देते हुए कहा कि मेरा मकसद किसी महापुरुष का अपमान करना नहीं था बल्कि महापुरुष को सम्मान के लिए कहा था शेखुल हिन्द हजरत मौलाना महमूदुल हसन रह. अजीम शख्सियत है, उनका सम्मान कोई कैसे और क्यों कम कर सकता है पूर्व विधायक मनोज चौधरी की सफाई अपनी जगह सही हो सकती है, लेकिन समाज में जो संदेश जाता है, वही असल सियासत की दिशा तय करता है। यह वह दौर है जहां प्रतीकों की लड़ाई असल मुद्दों को ढक लेती है। सवाल यह भी है कि क्या हम विकास की इमारतों को भी पहचान की जंग में झोंक देंगे? पत्रकारिता के पुरोधा अक्सर कहा करते थे “सत्ता का सबसे बड़ा खेल स्मृति पर कब्ज़ा करना है।” आज वही खेल नामों के बहाने खेला जा रहा है। ज़रूरत इस बात की है कि हम इतिहास को सम्मान दें, न कि उसे विवाद का औजार बनाएं। क्योंकि जब नाम बदलते हैं, तो सिर्फ़ पट्टिकाएं नहीं बदलतीं समाज की संवेदनाएं भी दरकती हैं।
