मनमोहन सिंह
श्मशान के सन्नाटे को चीरते हुए राजा विक्रम ने एक बार फिर बेताल को पेड़ से उतारा और अपने कंधे पर लाद लिया। बेताल हंसा और बोला, `राजन! तुम्हारी जिद सराहनीय है, पर रास्ता लंबा है। चलो, तुम्हें जंबूद्वीप की एक `सुनहरी’ नगरी की कथा सुनाता हूं, जहां के लोग सपनों के सौदागर बन गए हैं।’
बेताल ने कहना शुरू किया, `हे राजन! सुदूर जंबूद्वीप में एक सुंदर नगरी थी, जिसने दुष्ट आत्माओं की गुलामी की जंजीरें तोड़कर आजादी का सूरज देखा था। शुरुआती शासकों ने पसीना बहाया, पर समय के चक्र ने ऐसी बागडोर थमा दी उन लोगों को, जिन्होंने संघर्ष नहीं, सिर्फ `सपनों का विज्ञापनी खेल’ सीखा था। नगरी में अचानक एक चमत्कार हुआ। कुछ मुट्ठीभर परिवार ऐसे बढ़े जैसे सावन में घास! `वेल्थ ट्रैकर’ नामक अर्थशास्त्रियों की रिपोर्ट आई, जिसने बताया कि ५ परिवारों की दौलत ६ साल में ४०० फीसदी बढ़ गई। नगरी की आधी दौलत यानी जीडीपी का ५० फीसदी सिर्फ १,६८८ लोगों की पोटली में समा गई। दूसरी ओर, आधी प्रजा के पास कुल संपत्ति का मात्र ६.४ फीसदी हिस्सा बचा। वहां के एक धनकुबेर की संपत्ति १५३ फीसदी बढ़ी, तो दूसरे की ६२५ फीसदी। अर्थशास्त्रियों का कहना था कि यदि इन पर मात्र २फीसदी वेल्थ टैक्स लगा दिया जाए, तो नगरी के हर बच्चे के पास शिक्षा का यंत्र लैपटॉप होता और हर बीमार को मुफ्त उपचार मिल सकता है। पर सरकार कहती, `पैसे नहीं हैं’, जबकि उन्हीं धनकुबेरों के १९.६ लाख करोड़ के ऋण माफ कर दिए गए।’ कहानी रोककर बेताल जोर से ठिठका और बोला, `ठहर विक्रम! अब मेरे प्रश्न का उत्तर दे। जिस नगरी में १ फीसदी आबादी के पास हेराफेरी के ४० फीसदी संपत्ति हो और सरकार कहे कि जनकल्याण के लिए धन नहीं है, उस नगरी के भविष्य का क्या होगा? क्या यह प्रजातंत्र है या धनवानों का षड्यंत्र? और क्या यह विकास है या विनाश की आहट? `याद रखना राजन, अगर जानते हुए भी तूने उत्तर नहीं दिया, तो तेरे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे!’
विक्रम का उत्तर
राजा विक्रम ने संयम से उत्तर दिया, `सुन बेताल! जहां धन का संचय कुछ हाथों में हो जाए, वह राज्य `स्वर्ण नगरी’ नहीं, बल्कि `मिट्टी का ढेर’ बनने की ओर अग्रसर है। प्राचीन अर्थशास्त्री आचार्य चाणक्य ने `अर्थशास्त्र’ में स्पष्ट कहा था, `कोशमूला हि राजान: अर्थात: राजा की शक्ति का आधार उसका कोष है, लेकिन वह कोष प्रजा के शोषण से नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण वितरण से बढ़ना चाहिए।’ `हे बेताल, जिस प्रकार सूर्य पृथ्वी से जल सोखता है, ताकि वह उसे वर्षा के रूप में हजार गुना करके वापस लौटा सके, वैसे ही राजा को कर लेना चाहिए। यदि राजा केवल अमीरों की तिजोरियां भरने के लिए गरीबों का पसीना सोख रहा है और उसे वापस नहीं लौटा रहा, तो वह शासन `औपनिवेशिक भूत’ का पुनर्जन्म है! यह `विकास’ नहीं, बल्कि `आर्थिक विभीषिका’ है। जब मुट्ठीभर लोग पूरी नगरी के भाग्य विधाता बन जाएं, तो प्रजातंत्र केवल एक मुखौटा रह जाता है। ऐसी स्थिति में `वेल्थ टैक्स’ और `इनहेरिटेंस टैक्स’ विकल्प नहीं, बल्कि राज्य को बचाने की अनिवार्य औषधि हैं।’
`राजा का परम धर्म प्रजा का पालन है’
`सत्य कहा राजन! तूने चाणक्य का जिक्र तो किया, लेकिन शुक्राचार्य को भूल गया। उनकी शुक्रनीति कहती है, `नृपस्य परमो धर्म: प्रजानां परिपालनम। अर्थात राजा का परम धर्म प्रजा का पालन और संरक्षण है, न कि केवल मुट्ठीभर सांठ-गांठ वाले पूंजीपतियों का पोषण। तूने मौन तोड़ा, पर न्याय की बात की। पर अफसोस, तू बोला और मैं चला!’ इतना कहकर बेताल ठहाका मारता हुआ कंधे से उड़ा और वापस उसी डाल पर जा लटका, जहां न्याय और नीति के बीच की खाई आज भी उतनी ही गहरी थी और विक्रम उसके पीछे दौड़ पड़े।
