सूरज सिंह
आस्था या ‘रेट कार्ड’?
त्र्यंबकेश्वर में जो सामने आया, वह सिर्फ एक घोटाला नहीं, बल्कि एक संगठित ‘सिस्टम’ का संकेत देता है। आधिकारिक तौर पर २०० रुपए का वीआईपी पास होने के बावजूद श्रद्धालुओं को घंटों लाइन में खड़ा रखा जाता था। इसी बीच एजेंट सक्रिय हो जाते, ‘२० मिनट में दर्शन चाहिए? २,००० से ३,००० रुपए दीजिए।’ यानी आस्था के मंदिर में भी ‘तेजी से सेवा’ का अलग रेट तय था।
ट्रस्ट से लेकर एजेंट तक पूरी चेन पर सवाल
मामले में ट्रस्ट से जुड़े लोगों की गिरफ्तारी ने यह साफ कर दिया है कि यह सिर्फ बाहर के दलालों का खेल नहीं था। जांच में सामने आया कि ट्रस्ट के अधिकारों का दुरुपयोग कर पिछले दरवाजे से रोजाना १००-१५० लोगों को सीधे दर्शन कराया जा रहा था। हैरानी की बात यह है कि जहां आधिकारिक शुल्क २०० रुपए है, वहीं वसूली ३,००० से १२,००० रुपए तक पहुंच गई। यह सिर्फ अवैध कमाई नहीं, बल्कि आस्था का खुला ‘व्यापारीकरण’ है।
पुलिस स्टिंग में खुली पोल
लगातार शिकायतों के बाद पुलिस ने श्रद्धालु बनकर स्टिंग ऑपरेशन किया। एक ही दिन में हजारों रुपए की अवैध वसूली का खुलासा हुआ। यह दिखाता है कि यह कोई अपवाद नहीं, बल्कि रोज का ‘रूटीन बिजनेस मॉडल’ बन चुका था।
सवाल जो उठते हैं
– क्या ‘वीआईपी दर्शन’ व्यवस्था ही भ्रष्टाचार की जड़ बन चुकी है?
-क्या मंदिर ट्रस्ट और प्रशासन की मिलीभगत के बिना ऐसा संभव है?
-क्या आम श्रद्धालु सिर्फ ‘लाइन में खड़े रहने वाला ग्राहक’ बनकर रह गया है?
आस्था पर धक्का, सिस्टम पर अविश्वास
भारत में मंदिर सिर्फ पूजा का स्थान नहीं, बल्कि विश्वास और संस्कृति का केंद्र हैं। लेकिन जब दर्शन भी ‘पैसों की बोली’ पर तय होने लगे, तो यह केवल आर्थिक शोषण नहीं, बल्कि सामाजिक विश्वास पर भी बड़ा आघात है। त्र्यंबकेश्वर का मामला उजागर हो गया, लेकिन सवाल यह है कि देशभर के कितने धार्मिक स्थलों पर ऐसा ‘अदृश्य सिस्टम’ अभी भी चल रहा है?
अगर समय रहते सख्त कार्रवाई और पारदर्शी व्यवस्था लागू नहीं की गई, तो आस्था के नाम पर यह ‘करप्शन मॉडल’ और मजबूत होता जाएगा-और सबसे ज्यादा नुकसान उसी आम श्रद्धालु को होगा, जो सिर्फ भगवान के दर्शन के लिए आता है, सौदेबाजी के लिए नहीं।
शिर्डी में भी वही कहानी-बस तरीका अलग
दूसरी तरफ शिर्डी साई बाबा मंदिर में स्थिति अलग होते हुए भी समस्या की जड़ वही है-अव्यवस्था और सिस्टम की असफलता। यहां २०० रुपए का पास लेने के बाद भी श्रद्धालुओं को २-२ घंटे इंतजार करना पड़ रहा है। मतलब पैसे देने के बाद भी सुविधा की कोई गारंटी नहीं।
