मुख्यपृष्ठस्तंभगेस्ट रूम : हाईजीन, सैनेट्री पैड और प्रसव पीड़ा

गेस्ट रूम : हाईजीन, सैनेट्री पैड और प्रसव पीड़ा

रत्ना भदौरिया

यह एक अजीब विडंबना है कि जिस समाज में जीवन जन्म लेता है, वहीं उस जन्म देने वाली स्त्री को सबसे अधिक असुविधा, उपेक्षा और चुप्पी का सामना करना पड़ता है। ‘हाईजीन’ के नाम पर सैनेट्री पैड के विज्ञापन चमकते हैं- नीले रंग का तरल, मुस्कुराती हुई लड़कियां, आत्मविश्वास से भरी चाल-लेकिन यह चमकदार दुनिया उस सच्चाई से बहुत दूर है, जहां लाखों महिलाएं आज भी अपने शरीर से जुड़े सबसे बुनियादी अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही हैं।
लक्जरी हाईजीन
मासिक धर्म कोई बीमारी नहीं है, लेकिन इसे बीमारी जैसा बना दिया गया है-शर्म, छुपाव और चुप्पी के जरिए। एक लड़की जैसे ही किशोरावस्था में कदम रखती है, उसे सिखा दिया जाता है कि यह ‘गंदी’ चीज है, इसे छुपाकर रखना है, इस पर बात नहीं करनी है। और फिर उसी चुप्पी के भीतर एक बाजार खड़ा होता है, जो समाधान के नाम पर सैनेट्री पैड बेचता है। यह सवाल उठाना जरूरी है-क्या सैनेट्री पैड वास्तव में स्वतंत्रता का प्रतीक हैं, या यह एक ऐसा उत्पाद है, जिसने एक प्राकृतिक प्रक्रिया को ‘समस्या’ बनाकर अपने लिए जगह बनाई?
और फिर हम ‘हाईजीन’ की बात करते हैं-लेकिन क्या हाईजीन केवल एक उत्पाद से आता है? हाईजीन का मतलब साफ पानी, सुरक्षित शौचालय, सही जानकारी और सम्मानजनक माहौल भी होता है। अगर एक महिला के पास पैड तो है, लेकिन उसे बदलने के लिए सुरक्षित जगह नहीं है तो क्या वह वास्तव में स्वच्छ है? अगर स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग और साफ शौचालय नहीं हैं तो क्या हम सच में उन्हें शिक्षा का अधिकार दे रहे हैं? यहीं से महिलाओं की बुनियादी जरूरतों का असली सवाल सामने आता है। एक महिला को सिर्फ सैनेट्री पैड नहीं चाहिए-उसे चाहिए साफ पानी, पोषणयुक्त भोजन, सुरक्षित और निजी शौचालय, स्वास्थ्य सेवाओं तक आसान पहुंच और सबसे जरूरी-सम्मान और जानकारी।
जब एक किशोरी को यह नहीं बताया जाता कि उसका शरीर वैâसे काम करता है, जब उसे पीरियड के दौरान रसोई से दूर रखा जाता है, मंदिर जाने से रोका जाता है या उसे ‘अशुद्ध’ कहा जाता है-तो यह केवल एक परंपरा नहीं बल्कि उसके आत्मसम्मान पर सीधा प्रहार है।
पोषण की कमी भी इस पूरी समस्या को और गहरा करती है। आयरन और अन्य जरूरी पोषक तत्वों की कमी के कारण कई महिलाएं एनीमिया से पीड़ित रहती हैं, जिससे मासिक धर्म और प्रसव दोनों ही और अधिक कठिन और जोखिम भरे हो जाते हैं। लेकिन कितने घरों में महिलाओं की थाली सबसे पहले भरती है? अक्सर वह सबसे आखिर में खाती है-जो बच जाता है, वही उसका हिस्सा बनता है।
यह समस्या केवल मासिक धर्म तक सीमित नहीं है। जब बात प्रसव की आती है तो स्थिति और भी भयावह हो जाती है। प्रसव पीड़ा को अक्सर ‘प्राकृतिक’ कहकर नजरअंदाज कर दिया जाता है, जैसे यह कोई साधारण अनुभव हो। लेकिन सच्चाई यह है कि यह एक अत्यंत जटिल, दर्दनाक और जोखिम भरी प्रक्रिया है, जिसमें महिला का शरीर और मन दोनों एक असाधारण संघर्ष से गुजरते हैं। और यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है-अस्पताल और सरकार कहां हैं?
सिर्फ लफ्फाजी!
कागजों में योजनाएं हैं, बजट हैं, घोषणाएं हैं- मुफ्त सैनेट्री पैड, जननी सुरक्षा योजनाएं, मातृत्व लाभ- लेकिन जमीन पर अक्सर इनका असर धुंधला पड़ जाता है। कई सरकारी अस्पतालों में न पर्याप्त स्टाफ है, न साफ-सफाई, न जरूरी उपकरण। महिलाओं को घंटों इंतजार करना पड़ता है, कई बार अपमानजनक व्यवहार झेलना पड़ता है और कभी-कभी तो उन्हें यह तक कह दिया जाता है- ‘अभी समय नहीं है, बाद में आना।’
ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और भी कठोर है। अस्पताल दूर हैं, एंबुलेंस समय पर नहीं पहुंचती और कई बार सड़कें ही नहीं होतीं। ऐसे में प्रसव घरों में होता है-बिना प्रशिक्षित सहायता, बिना स्वच्छता के, बिना किसी आपातकालीन सुविधा के। यह केवल एक मजबूरी नहीं, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था की विफलता है, जिसने महिलाओं को उनके सबसे कमजोर क्षण में अकेला छोड़ दिया है।
सरकारें अक्सर योजनाओं का श्रेय लेती हैं, लेकिन जिम्मेदारी से बचती नजर आती हैं। आंकड़ों में सुधार दिखाया जाता है, लेकिन वास्तविक अनुभवों में दर्द जस का तस बना रहता है। अस्पताल, जो सुरक्षित आश्रय होने चाहिए, कई बार डर और असुविधा के स्थान बन जाते हैं-जहां जाने से महिलाएं कतराती हैं और जब संस्थाएं भरोसा खो देती हैं तो लोग उनसे दूर हो जाते हैं-यानी अस्पताल और सरकार, दोनों ही धीरे-धीरे महिलाओं के जीवन से दरकिनार हो जाते हैं।
प्रसव के बाद की देखभाल, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है, भी एक बड़ी बुनियादी जरूरत है। एक नई मां को आराम, पौष्टिक आहार, साफ-सफाई और मानसिक सहारा चाहिए-लेकिन अक्सर उसे तुरंत घर के कामों में लगा दिया जाता है, जैसे उसकी पीड़ा का कोई महत्व ही नहीं हो।
यहां एक और कठोर सच सामने आता है-महिलाओं के दर्द को सामान्य मान लेने की आदत। समाज ने जैसे यह तय कर लिया है कि स्त्री का जीवन ही सहने के लिए बना है। मासिक धर्म का दर्द हो या प्रसव की पीड़ा-उसे सहना है, चुप रहना है और आगे बढ़ जाना है। इस सोच ने न केवल महिलाओं के स्वास्थ्य को नजरअंदाज किया है बल्कि उनके अनुभवों को भी महत्वहीन बना दिया है।
बाजार हावी!
सैनेट्री पैड उद्योग इस पूरी कहानी का एक अहम हिस्सा है। एक ओर यह महिलाओं को सुविधा देता है, लेकिन दूसरी ओर यह एक बड़ा व्यापार भी है। बड़े-बड़े ब्रांड ‘प्रâीडम’, ‘कंफर्ट’ और ‘हाईजीन’ के नाम पर उत्पाद बेचते हैं, लेकिन क्या वे उन महिलाओं तक पहुंचते हैं, जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है? और जो पैड इस्तेमाल होते हैं, उनका पर्यावरण पर क्या असर पड़ता है? एक सैनेट्री पैड को पूरी तरह सड़ने में सैकड़ों साल लग सकते हैं। यानी हम एक समस्या का समाधान करते हुए दूसरी समस्या पैदा कर रहे हैं।
सरकारें योजनाएं बनाती हैं, मुफ्त पैड बांटने की घोषणाएं होती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इन योजनाओं का असर सीमित ही दिखाई देता है। कई बार पैड उपलब्ध होते हैं, लेकिन जानकारी नहीं होती कि उनका सही इस्तेमाल वैâसे किया जाए। कई बार सामाजिक वर्जनाएं इतनी मजबूत होती हैं कि महिलाएं इन्हें अपनाने से हिचकती हैं।
असल सवाल यह है कि हम महिलाओं के शरीर को लेकर कितने ईमानदार हैं? क्या हम उन्हें केवल ‘उपभोक्ता’ के रूप में देखते हैं या एक ऐसे इंसान के रूप में, जिसे सम्मान, स्वास्थ्य और सुविधा का अधिकार है? हाईजीन केवल एक उत्पाद नहीं है-यह एक संपूर्ण व्यवस्था है, जिसमें शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, पोषण, स्वच्छता, और सामाजिक सोच सब शामिल हैं।
जब तक हम मासिक धर्म और प्रसव को लेकर अपनी सोच नहीं बदलते, जब तक अस्पतालों को सच में सुरक्षित और संवेदनशील नहीं बनाया जाता और जब तक सरकारें अपनी जिम्मेदारी को केवल घोषणाओं तक सीमित रखती हैं-तब तक महिलाओं की स्थिति में वास्तविक बदलाव संभव नहीं है।
क्योंकि जब एक समाज अपनी महिलाओं के सबसे बुनियादी दर्द, जरूरतों और अधिकारों को नजरअंदाज करता है तो वह केवल एक व्यक्ति को नहीं बल्कि पूरे भविष्य को कमजोर करता है।
(लेखिका युवा कथाकार- संपादक हैं।)

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