मुख्यपृष्ठस्तंभहल्का-फुल्का : आईपीएल, धुरंधर और मजदूरी!

हल्का-फुल्का : आईपीएल, धुरंधर और मजदूरी!

मनमोहन सिंह

बधाई हो! हमारा देश तरक्की की उस ऊंचाई पर है, जहां से नीचे देखने पर इंसान नहीं, सिर्फ डेटा नज़र आता है। हमारी अर्थव्यवस्था ट्रिलियन की हो गई है और खुशकिस्मती देखिए कि इस ट्रिलियन के पहाड़ पर चढ़कर हम यह देख पा रहे हैं कि नीचे खड़ा एक मजदूर साल भर पसीने से नहाने के बाद मात्र ३९ रुपए की पगार बढ़वा पाया है।
३९ रुपए! इतने में तो आज के दौर में एक मल्टीप्लेक्स में ठंडे पानी की बोतल भी नहीं मिलती, लेकिन एक मजदूर के पूरे साल की निष्ठा और मेहनत की कीमत यही आंकी गई है। वाह! क्या गजब का मैनेजमेंट है।
एक तरफ आईपीएल है, जहां खिलाड़ियों पर करोड़ों की बारिश होती है। वहां एक छक्के की कीमत लाखों में है। दूसरी तरफ नोएडा की सड़कों पर खड़ा वह मजदूर है, जिसका आर्थिक रन-रेट इतना बिगड़ा हुआ है कि वह बेचारा बीमार पड़ने का रिटायर्ड हर्ट भी नहीं ले सकता। अगर बुखार में एक दिन घर बैठ गया तो मालिक क्लीन बोल्ड करने यानी नौकरी से निकालने की धमकी देता है। हमारी प्राथमिकताएं भी कमाल की हैं। हमें इस बात की चिंता है कि हमारी पसंदीदा टीम प्लेऑफ में पहुंचेगी या नहीं, पर इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि जो मजदूर हमारे जूते और कपड़े बना रहा है, वह रात को भरपेट सो पाएगा या नहीं।
बॉक्स ऑफिस पर फिल्में हजारों करोड़ कमा रही हैं। परदे पर राष्ट्रवाद का ऐसा तड़का लगाया जाता है कि सिनेमा हॉल की कुर्सी पर बैठा आम आदमी जोश से भर जाता है। उसे लगता है देश विश्वगुरु बन गया है। पर जैसे ही वह हॉल से बाहर निकलता है और महंगी पार्किंग या पेट्रोल का बिल भरता है, तब उसे असलियत समझ आती है। परदे के हीरो तो धुरंधर कमाई कर रहे हैं, लेकिन जो मजदूर उन सेटों को खड़ा करते हैं या पैâक्ट्रियों में हाड़-तोड़ मेहनत करते हैं, उनके हिस्से में सिर्फ ३२० रुपए की सालाना बढ़ोतरी आती है यानी एक दिन का लगभग ८७ पैसा! इतने में तो अब कोई दुआ भी नहीं देता, साहब।
आजकल चर्चा के विषय बड़े हाई-प्रोफाइल हैं, एआई आ रहा है, हम चांद पर घर बसाने की सोच रहे हैं और सड़कों पर आक्रोश मोर्चे निकल रहे हैं। ये मोर्चे कभी धर्म के लिए होते हैं, कभी इतिहास के लिए।
काश! कोई एक मोर्चा उस राहुल या नूर आलम के लिए भी निकलता, जिसकी थाली से सब्जी गायब हो चुकी है और जिसकी पगार ३९ रुपए बढ़ी है। लेकिन नहीं, भूखे पेट रहकर नारे लगाना आसान है, पर हक मांगना सिस्टम के खिलाफ माना जाता है।
हम एक ऐसे अद्भुत दौर में जी रहे हैं, जहां विकास केवल एयर कंडीशंड कमरों में बैठकर ग्राफ पेपर पर देखा जाता है। सड़कों पर तो सिर्फ ट्रैफिक जाम है और उन मजदूरों का शोर, जिन्हें लगता है कि शायद गाड़ियां पलटने से उनकी आवाज सत्ता के गलियारों तक पहुंच जाएगी।
पर सच तो यह है कि जब तक टीवी पर क्रिकेट का स्कोर और बॉक्स ऑफिस के करोड़ों का आंकड़ा चमकता रहेगा, तब तक ३९ रुपए की ये चोट किसी को महसूस नहीं होगी। आखिरकार, हम डिजिटल इंडिया हैं, जहां मजदूर के आंसू तो असली हैं, पर उसकी कीमत मात्र एक तकनीकी खराबी बनकर रह गई है।

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