मुख्यपृष्ठस्तंभपूर्वांचल पॉलिटिक्स : रोहिणी घावरी : सियासी घाव देने की तैयारी

पूर्वांचल पॉलिटिक्स : रोहिणी घावरी : सियासी घाव देने की तैयारी

हिमांशु राज

उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नया उलटफेर देखने को मिला है, जहां माना जा रहा कि डॉ. रोहिणी घावरी ने समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव से हाथ मिला लिया है। स्विट्जरलैंड में निवास करने वाली रोहिणी घावरी, जो कभी चंद्रशेखर आजाद की करीबी सहयोगी रहीं, अब २०२७ विधानसभा चुनावों से पूर्व समाजवादी पार्टी के लिए दो सौ सभाओं का महत्वाकांक्षी कार्यक्रम तैयार कर रही हैं। सात अप्रैल को अखिलेश से फोन पर हुई बातचीत में उन्होंने चंद्रशेखर के साथ संभावित गठबंधन की जांच की, लेकिन अखिलेश ने स्पष्ट इनकार कर दिया। जून में भारत लौटते ही रोहिणी गैर-जाटव दलित समुदायों जैसे वाल्मीकि, पासी और अन्य को एकजुट करने पर केंद्रित रहेंगी, जिससे पूर्वांचल व कानपुर जैसे दलित-मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में समाजवादी पार्टी की संयुक्त ताकत कई गुना बढ़ जाएगी। यह कदम चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी के लिए करारा प्रहार साबित हो रहा है। २०२४ लोकसभा चुनावों में नगीना जैसी सीटों पर कड़ा संघर्ष करने वाली आजाद समाज पार्टी की पांच से सात संभावित विधानसभा सीटें घटकर महज दो-तीन रह सकती हैं। समाजवादी पार्टी को रोहिणी का वैचारिक अनुभव पल्लवी गौतम जैसे नेताओं के बाद नई गति प्रदान करने की संभावना रहेगी। वर्तमान सरकार पर दलित अत्याचार के आरोपों की बौछार होगी, जिससे भाजपा को भी कठिन चुनौती मिलेगी। चंद्रशेखर को निर्दलीय प्रत्याशी उतारने या वैकल्पिक गठबंधनों की नई रणनीति अपनानी पड़ेगी, वरना राजनीतिक हाशिए पर धकेल दिए जाएंगे। रोहिणी की निजी लड़ाई अब सियासी हथियार के रूप में धार पकड़ चुकी है, जो उत्तर प्रदेश के मतदाता समीकरणों को रेखांकित कर सकती है। आगरा या लखनऊ में आयोजित होने वाली सभा में अखिलेश मुख्य अतिथि बनेंगे, जहां दलित अस्मिता का स्वर्णिम अध्याय रचने की कवायद है। चंद्रशेखर की सियासी गणित पूरी तरह बिगड़ चुका है-सुधार न किया तो २०२७ में सब कुछ दांव पर लग जाएगा।

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