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संपादकीय : फसल बीमा का गोलमाल

केंद्र और राज्य के सत्ताधारी किसान हित की बड़ी-बड़ी बातें करते नहीं थकते, उनके शासन में किसानों का कल्याण वैâसे हो रहा है, इसके दावे लगातार किए जाते हैं। वास्तव में स्थिति क्या है? इन लोगों के राज में योजनाओं और घोषणाओं की ‘फसल’ तो भरपूर लहलहा रही है, परंतु किसानों की झोली खाली ही है। व्यापारी, दलाल, अधिकारी और व्यावसायिक कंपनियां मालामाल हो रही हैं। सरकार किसानों के खातों में महीने के बमुश्किल दो हजार रुपए जमा करती है, लेकिन फसल बीमा कंपनियों के खातों में हर साल हजारों करोड़ रुपए जुड़ जाते हैं। फसल बीमा योजना को सामान्य किसान का आर्थिक कवच है एक ऐसा चित्र प्रस्तुत किया गया है। प्राकृतिक और प्रशासनिक संकटों का प्रहार किसानों को हर मौसम में झेलना पड़ता है। हाथ में आई हुई फसल अक्सर तबाह हो जाती है। कभी दोबारा बुवाई की आफत, तो कभी तैयार फसल की बर्बादी। वर्षों से किसानों का यह दुष्चक्र जारी है। इस नुकसान से उन्हें कुछ हद तक आर्थिक सुरक्षा मिले, यही फसल बीमा का उद्देश्य बताया जाता है, जो गलत नहीं है, लेकिन क्या यह उद्देश्य सिद्ध होता है? यह प्रश्न और उसका
नकारात्मक उत्तर
सरकारें बदलने के बावजूद जस का तस बना हुआ है। यह फसल बीमा किसानों के बदले बीमा कंपनियों का आर्थिक कवच बन गया है। एक जानकारी के अनुसार, पिछले नौ वर्षों में फसल बीमाधारक किसानों को जितना आर्थिक लाभ हुआ, उससे कई गुना अधिक राशि फसल बीमा कंपनियों की तिजोरी में जमा हुई। इस अवधि में इन कंपनियों ने लगभग ७३,५०० करोड़ रुपए कमाए। यदि शुद्ध लाभ की बात करें, तो कंपनियों की यह कमाई २० से ३० हजार करोड़ रुपए जितनी विशाल है। देशभर में लगभग २० फसल बीमा कंपनियां हैं, जिनमें से १५ निजी हैं। इसका अर्थ है कि ये हजारों करोड़ रुपए निजी उद्योगों के गले उतर गए हैं। फसल बीमा एक व्यवसाय है और व्यवसाय का मुख्य उद्देश्य लाभ कमाना ही होता है, लेकिन जिस किसान के नाम पर यह व्यवसाय किया जाता है, उस सामान्य और लघु सीमांत किसान को हमेशा खाली हाथ क्यों रखा जाता है? मुआवजे के नाम पर उनका क्रूर मजाक क्यों उड़ाया जाता है? साल-दर-साल किसानों को घाटा और कंपनियों को मुनाफा, यही दृश्य क्यों दिखाई दे रहा है?
कर्जदार हुए बिना
खेती न कर पाने वाला किसान उस स्थिति में भी एक उम्मीद के साथ फसल बीमा की किस्तें भरता है। वास्तव में उसके हाथ क्या लगता है? अनिश्चित प्रकृति हाथ में आई फसल छीन लेती है और बीमा कंपनी उसके हाथ में महज तीन-चार अंकों की राशि का चेक थमा देती है। सरकार और फसल बीमा कंपनियां मुआवजे के मामले में किसानों का क्रूर मजाक ही करती आई हैं। पिछले साल आपदा प्रभावित किसानों को फसल बीमा योजना से प्रति हेक्टेयर १८,००० रुपए मिलेंगे और बीमा राशि तत्काल मिलेगी, ऐसे शब्दों के बुलबुले शासकों ने हवा में छोड़े थे, लेकिन वे हवा में ही फूट गए। एक रुपए वाली फसल बीमा योजना फर्जी लाभार्थियों के नाम पर फडणवीस सरकार ने बंद कर दी थी। उसके बदले ‘कृषि समृद्धि’ जैसी एक आकर्षक योजना घोषित की गई। हालांकि, इससे अपने पेट को काटकर किस्तों के करोड़ों रुपए भरने वाले किसानों की नहीं, बल्कि बीमा कंपनियों की भरपूर ‘समृद्धि’ हुई। सामान्य किसान को न तो सरकारी मुआवजा मिलता है, न ही फसल बीमा की राशि। किस्तें भरने के बाद भी वह खाली हाथ ही रह जाता है। फसल बीमा में गोलमाल करने वाली कंपनियां मालामाल हो रही हैं और हुक्मरान हाथ पर हाथ धरे और मुंह पर ताला जड़कर बैठे हैं।

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