विजयशंकर चतुर्वेदी
भारतीय लोकतंत्र का सबसे मजबूत स्तंभ मानी जाने वाली न्यायपालिका आज उन सवालों के घेरे में है, जिन्हें कभी हाशिए की फुसफुसाहट मानकर टाल दिया जाता था। अरविंद केजरीवाल द्वारा दिल्ली हाई कोर्ट में जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा से मामले की सुनवाई से अलग होने की मांग केवल एक कानूनी याचिका नहीं, बल्कि संस्थागत अविश्वास की सार्वजनिक अभिव्यक्ति है।
डिस्चार्ज और प्रक्रिया का सवाल
दिल्ली एक्साइज पॉलिसी मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा फरवरी २०२६ में केजरीवाल सहित २३ आरोपियों को डिस्चार्ज किया जाना इस पूरे घटनाक्रम का निर्णायक बिंदु है, क्योंकि इसका अर्थ यही है कि जांच एजेंसियां ऐसा ठोस आधार भी प्रस्तुत नहीं कर सकीं, जिस पर मुकदमा टिक सके।
यहीं से यह मामला केवल एक आपराधिक केस नहीं रह जाता, बल्कि न्याय, जांच और राजनीति के त्रिकोण में बदल जाता है। एक ओर लंबी जांच, बार-बार जमानत का खारिज होना और महीनों तक चलने वाली हिरासत है; दूसरी ओर अदालत का यह कहना कि आरोप प्रथम दृष्टया भी टिकाऊ नहीं है। यह विरोधाभास इस प्रश्न को जन्म देता है कि क्या हमारे यहां प्रक्रिया ही दंड में बदलती जा रही है।
निष्पक्षता बनाम धारणा
केजरीवाल का रिक्यूजल अनुरोध इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाता है। उन्होंने अदालत के पूर्व के आदेशों, टिप्पणियों और न्यायाधीश की कुछ सार्वजनिक गतिविधियों का हवाला देते हुए यह कहा कि उन्हें निष्पक्ष सुनवाई को लेकर ‘उचित आशंका’ है। उनका तर्क सीधा है-न्याय केवल किया ही नहीं जाना चाहिए बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए। यह वही सिद्धांत है- जिसे भारत का सर्वोच्च न्यायालय बार-बार दोहराता रहा है।
लेकिन इस तर्क का दूसरा पक्ष भी है। आलोचकों का कहना है कि इस प्रकार के अनुरोध न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने और सुनवाई को अपनी सुविधा के अनुसार मोड़ने का प्रयास भी हो सकते हैं। इस बहस से यह स्पष्ट होता है कि न्याय अब केवल तथ्य का नहीं बल्कि धारणा का भी प्रश्न बन गया है।
जांच एजेंसियां और मीडिया का त्रिकोण
इस पूरे विवाद का बड़ा आयाम जांच एजेंसियों की भूमिका है। प्रवर्तन निदेशालय और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो की सक्रियता में पिछले वर्षों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। राजनीतिक मामलों में लंबी जांच, व्यापक गिरफ्तारी और अंतत: कमजोर अभियोजन की प्रवृत्ति इस धारणा को बल देती है कि कानून का इस्तेमाल चयनात्मक तरीके से हो रहा है। मीडिया इस त्रिकोण का तीसरा महत्वपूर्ण पक्ष है, जो आरोप लगते ही एक निश्चित नैरेटिव स्थापित कर देता है। ‘भ्रष्टाचार’ का यह नैरेटिव अदालत के अंतिम पैâसले से पहले ही जनमत को प्रभावित कर देता है।
नीति, न्याय और लोकतंत्र का संतुलन
यदि किसी पक्ष को यह लगता है कि उसे निष्पक्ष सुनवाई नहीं मिलेगी तो यह केवल एक व्यक्तिगत शिकायत नहीं बल्कि संस्थागत विश्वास का संकट है। इसके साथ ही नीति और अपराध के बीच की रेखा धुंधली होती दिखाई देती है। यदि हर विवादास्पद नीति को आपराधिक जांच का विषय बनाया जाने लगे तो शासन निर्णय लेने से ही डरने लगेगा। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस प्रकार की चिंताएं दर्ज की जा रही हैं। प्रâीडम हाउस और वी-डेम इंस्टीट्यूट जैसी संस्थाओं ने भारत में संस्थागत संतुलन को लेकर प्रश्न उठाए हैं।
विश्वास का संकट और लोकतंत्र की चुनौती
अंतत: यह विवाद किसी एक व्यक्ति या एक दल का नहीं है। यह उस विश्वास का प्रश्न है, जिस पर लोकतंत्र टिका होता है। यदि संस्थाओं की निष्पक्षता पर लगातार संदेह उठने लगे तो लोकतंत्र की संरचना बनी रह सकती है, लेकिन उसकी आत्मा क्षीण होने लगती है। अदालत में उठी आवाज को केवल एक बयान मानकर खारिज करना आसान है; कठिन यह है कि उसे एक चेतावनी की तरह पढ़ा जाए। संस्थाओं और नागरिकों के बीच बढ़ती दूरी को कम करना अब लोकतंत्र की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
(वरिष्ठ पत्रकार और कवि- लेखक। सार्वजनिक नीति, अंतरराष्ट्रीय संबंधों और सामाजिक-राजनीतिक प्रश्नों पर नियमित लेखन।)
