राजेश विक्रांत
कलाओं में गहरी रुचि रखने वाले कवि, संपादक, संगीत अध्येता और अयोध्या में कला व साहित्य के उत्सव ‘टाइमलेस अयोध्या’ के संस्थापक यतीन्द्र मिश्र की पुस्तक “नैनन में आन- बान” शास्त्रीय और लोक संगीत को समावेशी ढंग से समझने के लिए महत्वपूर्ण कृति है। यह पुस्तक बारह सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायकों- केसरबाई केरकर, उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ, रसूलनबाई, सिद्धेश्वरी देवी, उस्ताद अमीर ख़ाँ, पंडित भीमसेन जोशी, बेगम अख़्तर, पंडित कुमार गंधर्व, गंगूबाई हंगल, गिरिजा देवी, किशोरी अमोनकर और पंडित जसराज के सांगीतिक स्वरूप को गहराई पर रोचकता से पेश करने के साथ संगीत के किस्से, इतिहास, विरासत व समझ को भी समृद्ध करती है।
पुस्तक के पहले खण्ड- अवगुन न कीजिए गुनी संग: शास्त्रीय गायकों का सांगीतिक वैभव में केसरबाई केरकर- जटिल तानों की सुघर अदायगी, उस्ताद अमीर ख़ाँ- विचार और अमूर्तन की गायिकी, रसूलनबाई- बनारस की ठसक, उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ाँ- कहन और बहलाव का बाँकपन, सिद्धेश्वरी देवी- ठुमरी के नैहर की मैना, पंडित कुमार गंधर्व- लोक दृष्टि तक पहुँचने का मार्ग, गंगूबाई हंगल- आवाज़ का वज़न, बेगम अख्तर- आवाज़ की वो दिलकश ‘पत्ती’, पंडित भीमसेन जोशी- हरि का भेद ढूँढ़ती पुकार, गिरिजा देवी- पीलू, खमाज, झिंझोटी का उत्सव, पंडित जसराज- मधुरोपासना गायिकी का बृजमंडल तथा किशोरी अमोनकर- प्रतीक्षा में डूबी विरहिणी की आवाज़ लेख का समावेश है जबकि खण्ड 2 ‘सहेला रे, आ मिल गायें…’ के तहत संगीत के किस्से, इतिहास, विरासत और समझ संगीत व लोक से संबंधित रचनात्मक खजाना है।
यतीन्द्र मिश्र की लेखन शैली अनोखी है, जिसके जरिए वे कलाकार की विशेषता व आत्मा को तकनीकी शुद्धताओं के दायरे में परोसकर पाठक को परितृप्त कर देते हैं। इसके साथ उस प्रसंग से जुड़े रोचक तथ्य या किस्से भी बोनस के रूप में मुहैया कराते हैं।
केसरबाई केरकर के बारे में वे लिखते हैं कि, “उनके गायन की सबसे बड़ी सफलता यह रही कि उनकी गायिकी में गमक और आवाज़ की पुख़्तगी जिस तरह बंदिश का रूप सँवारती है, उसी तरह वह अपने आलाप तानों से रियाज़ का परचम लहराती नज़र आती है।” उस्ताद अमीर खाँ के बारे में लेखक ने लिखा है कि, “उनकी गायिकी स्वयं को संबोधित थी और ऐसा लगता है कि उनका गायन मात्र गायन नहीं है, बल्कि वे अपनी गायकी के प्रति डूबे हुए स्वयं को ही विचार और अमूर्तन का कोई प्रयोग सुना रहे हैं। जैसे, संगीत का कोई सुर, मींड़, मुरकी का संधान, लय, ताल का सचेत उपयोग, आवर्तन करते हुए बंदिश की पंक्ति की निरंतर वैचारिक बढ़त या विस्तार एक नया विचार रच रही हो…। उनके गाए रागों, खासकर जनसम्मोहिनी, मारवा, चारुकेशी, कलावती, हंसध्वनि, बिलासखानी तोड़ी, अहीर भैरव, मुल्तानी, शुद्ध कल्याण, रामदासी मल्हार, शहाना, मालकौंस, मेथ, नंद, गुर्जरी तोड़ी और दरबारी को अपूर्व प्रतिष्ठा मिली।” रसुलनबाई के बारे में “रसूलनबाई का गला सुंदर तरीके से तराशा हुआ था, जिसमें बोल-बनाव की ठुमरी अदायगी में टप्पे का अंग मुखरता से चमकता था। एक तरह से जवारीदार गला, जो उप-शास्त्रीय ढंग के गायन के लिए सर्वदा दुरुस्त माना जाता है।”
अयोध्या राज परिवार के सदस्य यतीन्द्र मिश्र के अनुसार, “तीन प्रकार की आवाजाही के माध्यम से उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ाँ को एक सांगीतिक उपस्थिति के रूप में परखा जा सकता है। एक तरफ ध्रुपद के तत्त्व, दूसरी ओर जयपुर के चलन का द्रुत व चपल अंदाज़ और तीसरे स्तर पर ग्वालियर अंग के बहलावों का मामला… इन जगहों से निकलकर, जो मिश्रण बनता है, वह उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ाँ की अदायगी है।” “सिद्धेश्वरी देवी की अदायगी में बनारसी रंग पूरे लालित्य के साथ उल्लासपूर्ण ढंग से व्यक्त होता था। फिर चाहे वह राग मिश्र तिलक कामोद में उनकी प्रसिद्ध ठुमरी ‘साँझ भई घर आओ नंदलाल’ हो या ‘कौन अलबेली की नार छमाछम’ जैसा दादरा; श्रोता अभिभूत हुए बगैर उनकी महफ़िल से उठकर जा नहीं सकता था। इसी तरह टप्पा में उनकी कलाकारी की रंगत देखते हुए बनती थी, जब राग झिंझोटी में ‘ओ मियाँ मैं तंदे वारी जाऊँ’ गाती थीं या राग भैरवी में ‘साँग चला दिया वे’।”
“भारतीय शास्त्रीय संगीत के बड़े आकाश में पंडित कुमार गंधर्व अपने शुद्धतम रूप में विद्रोह को स्वर देने वाले गायक थे। सांगीतिक अर्थ में विवादी स्वर की तरह अपनी कला में नवाचार एवं प्रयोगों के लिए दीवानगी की हद तक क़ायल… एक बेहद संवेदनशील प्रयोगकर्ता, शास्त्रीयता के शिल्प में गज़ब तरीके से लोक की घुसपैठ कराकर उसे और भी लचीला और रसभीना बनाने वाले।” “गंगूबाई हंगल के किराना घराना के सिग्नेचर रागों-अहीर भैरव, आभोगी, मालकौंस, हिंडोल, चंद्रकौंस, खंभावती एवं तोडी का राग विस्तार गंगूबाई शुद्ध कल्याण, पुरिया कल्याण, पुरिया धनाश्री, कलावती, भीमपलासी, हंगल की गायिकी में अपनी पूरी शुद्धता के साथ शिखर पर मौजूद है।”
“बेगम अख़्तर के हुनर का यह सबसे उज्ज्वल पक्ष है कि उन्होंने किसी गीत या बंदिश पर अतिरिक्त बोझ वाली गुलतराशी कभी नहीं की। उनकी कला का सौंदर्य गाए जा चुके गीतों के अर्थों की मनोहारी छायाओं के अन्दर से दीप्त होता था।” “भीमसेन जोशी राग को गाते नहीं, बल्कि राग-रागनियों की अदायगी के समय ‘सुर’ और ‘बोलों’ का शिल्प गूंधते रहते थे। एक कुशल शिल्पी की भाँति, जो भवनों पर अलंकरण के क्षण उसके कंगूरों, मेहराबों और ज्यामिति को अपना मनपसंद सौष्ठव देता था। वे विष्णु की तरह प्रकृति का कुशलक्षेम रचते थे और प्रजापति की भाँति उसमें सौदर्य और जीवन का योग करते थे।”
“बनारस में ‘चतुर्मुखी गायकी’ की अपूर्व प्रतिष्ठा रही है, जिसमें चार विशिष्ट गायन प्रकार-ध्रुपद-धमार, ख़याल-टप ख़याल, तराना-टप्पा, कजरी, ठुमरी-लोकगीत गाए, बजाए जाते हैं। गिरिजा देवी इस चतुर्मुखी गायकी की प्रतिनिधि कलाकार मानी गईं। लोकगीतों के अंतर्गत आने वाले बन्ना, शहाना, मुबारकबादी और सुहाग गीतों जैसी लोकप्रिय व साधारण विधाओं को भी उन्होंने बड़ी मोतीबाई से पूरी गंभीरता से सीखा था।”
“पंडित डी.वी. पलुस्कर, पंडित दिनकर कैंकिणी, पंडित जितेन्द्र अभिषेकी की भक्ति गायन परंपरा की याद दिलाता, पंडित जसराज का मधुरोपासना गायन हमारी भारतीय शास्त्रीय संगीत की वह धरोहर है, जो हवेली संगीत, संकीर्तन, नामजप-गायन और भक्ति आधारित उत्सव-गायन की अमूल्य थाती बन चुके हैं।” “किशोरी अमोनकर की गायकी में हमें कुछ साहित्यिक पदों की बिलकुल गैर-पारंपरिक व्याख्या होती नज़र आती है। ‘प्रतीक्षा’, ‘विरह’, ‘आकांक्षा’ और ‘शांति’ ऐसे पद हैं, जिनकी सबसे सफल व मार्मिक अभिव्यक्ति हमें किशोरी जी ही सुलभ कराती हैं।”
“नैनन में आन- बान” के खण्ड दो में काशी और कजरी का संबन्ध, उस्ताद मौजुद्दीन खां, काशी का प्रसिद्ध बुढ़वा मंगल मेला, मीराबाई, राग यमन, बाईयों का ज़माना, अन्नपूर्णा देवी, यामिनी कृष्णमूर्ति, निर्मला देवी, पारसी थिएटर, मन्ना डे, पंडित मल्लिकार्जुन मंसूर, बड़ी मोतीबाई रामलीला, कथिक, अवध की राम- रसिक- भक्ति उपासना, राग भूपाली, राग भैरवी और उपशास्त्रीय गायन के प्रकारों ठुमरी, टप्पा, चैती, कजरी से लेकर ध्रुपद की विवेचना, ओडिसी व राग देव गंधार, अयोध्या की लोक परंपरा आदि पर सारगर्भित, रोचक व उपयोगी टिप्पणियां हैं।
यतीन्द्र मिश्र ने इस पुस्तक में एक जगह पर लिखा है कि “राग की प्यास बंदिशों के कुएं पर जाकर तृप्त होती है।” इसी तरह से अगर आपको भारतीय शास्त्रीय संगीत के बारे में जानने की प्यास है तो वह “नैनन में आन- बान को पढ़ने से अवश्य बुझ जाएगी क्योंकि पुस्तक अपने आप में परिपूर्ण है। इसकी पृष्ठ संख्या 200 तथा मूल्य 399 रुपए है। संस्करण पेपरबैक है।
