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संपादकीय : मराठी अनिवार्यता का दबाव

महाराष्ट्र के परिवहन विभाग ने जो ठोक बजाकर कहा है, उसे करके दिखाने का संकल्प किया होगा तो वह उचित है। रिक्शा, टैक्सीचालकों को मराठी आनी ही चाहिए। १ मई से मराठी की अनिवार्यता का नियम अमल में आएगा और जिन्हें मराठी सीखनी है, उन्हें १५ अगस्त तक मराठी सीखने की मोहलत दी जाएगी, ऐसा राज्य के परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक ने मंगलवार को घोषित किया। यह निर्णय वैसे मराठी के मामले में सकारात्मक है। परिवहन मंत्री सरनाईक ने कुछ बातें दृढ़ता से कहीं। रिक्शाचालक यदि हड़ताल की धमकी देनेवाले होंगे, तो वे उनकी धमकियों की परवाह नहीं करते, ऐसा उन्होंने कहा; लेकिन रिक्शाचालकों की ओर से सरकार को धमकियां देनेवाले लोग उनके ही दल में थे। महाराष्ट्र की राजधानी में मराठी बोली जानी चाहिए, यह नियम पुराना ही है। मुंबई में आज जो मराठी रुतबे के साथ घूमती है, उसका श्रेय केवल शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे की शिवसेना को ही जाता है। सरनाईक कहते हैं, ‘हम थे इसलिए यह मराठी का कार्य कर रहे हैं। शिवसेना ने क्या किया?’ यह प्रश्न बकवास है। मूलत: मिंधे (शिंदे) गुट यानी शिवसेना और उनका विचार यानी मराठी अस्मिता, यह कोई स्वीकार नहीं करेगा। आप आज जो ‘मराठी’ के रूप में खनकदार बोल सकते हैं और चुनौती की भाषा दे सकते हैं, उस मराठीपन और अभिमान को टिकाए रखने का काम शिवसेना ५८ वर्षों से कर रही है। मुंबई में सर्वप्रांतीय धर्मशाला रोकने के लिए शिवसेनाप्रमुख ने ‘परमिट सिस्टम’ लागू करने की योजना बनाई थी। परंतु उस योजना को विफल करनेवाला उस समय का भाजपा का ही राष्ट्रीय नेतृत्व था इसलिए रिक्शाचालकों की मराठी अनिवार्यता के बारे में भाजपा आज भी मुंह में मूंग दबाकर बैठी है और इस बारे में आश्चर्य होने का कोई कारण नहीं है। सरनाईक ने मराठी का मुद्दा आगे बढ़ाया, यह सच है। उनका यह दबाव यानी महाराष्ट्र की वास्तविक भावना है। महाराष्ट्र में
मराठी के मुद्दे पर
मतभेदों का प्रदर्शन नहीं होना चाहिए। मराठी भाषा की अनिवार्यता कोई बिहार, लखनऊ, पंजाब या अन्य राज्यों में नहीं हो रही है, बल्कि वह महाराष्ट्र की राजधानी में हो रही है। बेलगाम के मराठी भाषियों पर जिस प्रकार वहां के कन्नड़ शासक रोज अत्याचार कर रहे हैं, वैसा कुछ मुंबई के हिंदी भाषी रिक्शा-टैक्सी वालों के साथ नहीं हुआ है। एमआईएम पक्ष के नेता इम्तियाज जलील की भूमिका उस दृष्टि से महत्वपूर्ण है। वे कहते हैं, ‘हम जिस राज्य में रहते हैं, वहां की भाषा आनी ही चाहिए। मुस्लिम समुदाय को अपने बच्चों को मराठी सिखानी चाहिए। स्पर्धा परीक्षा देनी होगी, यहीं नौकरी करनी होगी तो मराठी आनी ही चाहिए।’ इस भूमिका का समर्थन दूसरों को भी करना चाहिए, लेकिन महाराष्ट्र में इसी मुद्दे पर मतभेद हैं। भारतीय जनता पार्टी खुलकर मराठी के मुद्दे पर समर्थन के लिए सामने आती हुई नहीं दिखी। परिवहन मंत्री ने अब १ मई से रिक्शाचालकों के लिए मराठी अनिवार्य कर दी, लेकिन १५ अगस्त तक उन पर कार्रवाई का डंडा नहीं चलाने की बात कह दी। अब मराठी का पाठ पढ़ाने के लिए सरकार उपक्रम शुरू करेगी, पुस्तिकाएं छापेगी, ऐसा बहुत कुछ है। यह सब महाराष्ट्र में जी-तोड़ मेहनत से करना पड़ता है। सिर खपाकर मराठी सिखाने का समय सरकार पर आया है, यह चित्र हास्यास्पद है। रोजगार के लिए मुंबई आनेवालों ने यदि मराठी भाषा सीखी तो वह उनके ही फायदे का है। हजारों परप्रांतीय रिक्शा और टैक्सीचालक मुंबई आते हैं; लेकिन मराठी सीखने का कष्ट नहीं उठाते। हिंदी ही मानो मुंबई की राजभाषा है, ऐसे तेवर में वे बर्ताव करते हैं, बोलते हैं और मराठी में पूछे गए प्रश्नों का हिंदी में टाल-मटोल उत्तर देते हैं। इसी कारण कई बार मारपीट की घटनाएं हुईं। स्थानीय भाषा का ज्ञान न होने से यात्रियों से विवाद होते हैं। गलतफहमी, लड़ाई-झगड़ा यह मुंबई का रोज का ही चित्र है इसलिए रिक्शाचालकों को मराठी सीखनी चाहिए, यह नियम परिवहन मंत्री ने घोषित किया। मात्र, उसे समर्थन देने के बजाय
सरकार पक्ष के ही लोग
बोलने लगे कि ये परप्रांतीय रिक्शा-टैक्सीचालक इतनी जल्दी मराठी वैâसे सीख सकते हैं? अब उनके लिए मराठी के क्लास लेने पड़ेंगे वगैरह-वगैरह। सच तो यह है कि इस पर महाराष्ट्र के मराठी मुख्यमंत्री को उन्हें हड़काना चाहिए था। उप मुख्यमंत्री मिंधे (शिंदे) तो खुद को शिवसेनाप्रमुख का स्वघोषित वारिस कहते हैं। इसलिए उन्हें तो मराठी नकारने वालों का मुंह तोड़ना चाहिए था, लेकिन वैसा कुछ भी नहीं हुआ। तब मराठी का आग्रह करने वाले मंत्री सरनाईक को यह गाड़ी आगे खींचकर ले जानी होगी। महाराष्ट्र की एक भाषा नीति है। उसमें मराठी भाषा का संरक्षण, विकास और मराठी भाषा का प्रशासन में उपयोग बढ़ाएं, ऐसा कहा गया है। उसी के लिए महाराष्ट्र के मराठी राज्य का निर्माण हुआ। मराठी राज्य की अधिकृत राजभाषा के रूप में घोषित हुई। मराठी भाषा छत्रपति शिवराय की, उनके मावलों की थी, वैसे ही वह मुंबई-महाराष्ट्र के श्रमिकों की, किसानों की, मेहनतकशों की भी है। इस भाषा को बाहर से आए लोगों द्वारा नकारा जाना यानी महाराष्ट्र के विरुद्ध खुला विद्रोह ही कहना होगा। केंद्र सरकार द्वारा मराठी भाषा को अभिजात भाषा का दर्जा देने के उत्सव में दिल्ली के मिंधे (गुलाम) बने सभी लोग नाचे; लेकिन मुंबई का रिक्शावाला मराठी बोलने को तैयार नहीं, यह वैâसी अकड़ है? इस उद्दंडता को समाप्त करने के लिए मराठी अनिवार्यता का दबाव और जोर से देना होगा। ‘रिक्शा-टैक्सीचालकों को १ मई से मराठी भाषा की अनिवार्यता होगी यानी होगी ही!’ ऐसी तलवारबाजी राज्य सरकार ने जोर-शोर से की तो सही, लेकिन अंतत: इस अनिवार्यता को १५ अगस्त तक समयसीमा बढ़ाकर सरकार ने तलवार म्यान में कर ली। राणा भीमदेवी ठाठ में बोलनेवालों ने हार मान ली! उसके लिए ‘मराठी सीखने का अवसर’ यह चोर रास्ते ढूंढ निकाला। मराठी के प्रश्न पर सरकार एक बार फिर कमजोर और ढुलमुल साबित हुई है। अब कम से कम १५ अगस्त की तारीख पर तो अडिग रहें। ‘तारीख पर तारीख’ का समय मराठी भाषा पर मत आने दें!

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