अनिल तिवारी
मुंबई
भारत की सबसे बड़ी चुनौतियों में तेजी से बढ़ती आबादी और पहले से मौजूद विशाल जनसंख्या का दबाव है। शहरों में भीड़, ट्रैफिक जाम, प्रदूषण, महंगा आवास, बेरोजगारी, अस्पतालों में लंबी कतारें, स्कूल-कॉलेजों में सीटों की कमी, पानी, बिजली और सार्वजनिक परिवहन जैसी हर सरकारी व्यवस्था पर बढ़ता बोझ इसी अनियंत्रित जनसंख्या का परिणाम है। इसीलिए जब देश में जनसंख्या संतुलन, परिवार नियोजन और संसाधनों के न्यायपूर्ण उपयोग पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए, तब कुछ नेता और धार्मिक-सामाजिक प्रभाव वाले लोग उलटे अधिक बच्चे पैदा करने जैसे बयान देकर बहस को दिशा भटका देते हैं।
सांप्रदायिक स्पर्धा!
ताजा बयान उत्तर प्रदेश के परिवहन राज्यमंत्री दयाशंकर सिंह का है। बलिया में जनसंख्या नियंत्रण कानून पर पूछे गए प्रश्न पर उन्होंने कहा कि यह ईश्वर की कृपा है कि किसी को ज्यादा बच्चे होते हैं, किसी को कम। उन्होंने यह भी कहा कि भारत में किसी पर रोक नहीं है किसी को पांच बच्चे होते हैं, किसी को एक भी नहीं होता। यह बयान व्यक्तिगत आस्था के स्तर पर भले ही सहज लगे, लेकिन सार्वजनिक नीति के स्तर पर यह प्रश्न खड़ा करता है कि क्या जनसंख्या जैसे गंभीर विषय को केवल ‘ईश्वर की कृपा’ कहकर छोड़ा जा सकता है?
यह कोई पहला अवसर नहीं है। हाल ही में बागेश्वर धाम के धीरेंद्र शास्त्री के कथित बयान, ‘चार बच्चे पैदा करो, एक आरएसएस को दो’ पर भी विवाद हुआ। इसी बहस में कई नेताओं ने अपने-अपने राजनीतिक और धार्मिक चश्मे से जनसंख्या को देखने की कोशिश की। जनसंख्या जैसे राष्ट्रीय मुद्दे को जब ‘हमारी संख्या बनाम उनकी संख्या’ के नारे में बदला जाता है, तब समस्या का समाधान नहीं, बल्कि समाज में भय और प्रतिस्पर्धा पैदा होती है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भी २०२५ में भारतीय परिवारों से तीन बच्चे रखने की बात कही थी। उन्होंने घटती प्रजनन दर को दीर्घकालिक जनसांख्यिकीय जोखिम बताया और ‘नियंत्रित, लेकिन पर्याप्त’ आबादी की बात की। दूसरी ओर, भाजपा नेता नवनीत राणा ने हिंदुओं से ‘कम से कम तीन-चार बच्चे’ पैदा करने की अपील की थी, जिसके जवाब में असदुद्दीन ओवैसी ने कटाक्ष करते हुए कहा कि उनके छह बच्चे हैं और ‘८ बच्चे पैदा करने से कौन रोक रहा है?’ यह संवाद नीति विमर्श से ज्यादा राजनीतिक तंज और सांप्रदायिक प्रतिस्पर्धा जैसा प्रतीत होता है। ऐसे बयान केवल एक विचारधारा या एक दल तक सीमित नहीं हैं। एमआईएम के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली ने ‘हम दो, हमारे दो दर्जन’ जैसा नारा देकर मुस्लिम परिवारों से अधिक बच्चे पैदा करने की बात कही। उन्होंने बच्चों को ‘अल्लाह की देन’ बताते हुए कहा कि अधिक आबादी देश को मजबूत करती है। इससे स्पष्ट है कि जनसंख्या का सवाल देशहित से हटकर अलग-अलग समूहों की संख्या बढ़ाने की राजनीति में बदलता जा रहा है।
व्यावहारिक नीति!
दक्षिण भारत में भी जनसंख्या पर अलग प्रकार की राजनीतिक चिंता सामने आई है। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन जैसे नेताओं द्वारा अधिक बच्चे पैदा करने संबंधी बयानों पर चिंता व्यक्त हो चुकी है। पॉप्यूलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया ने कहा था कि परिसीमन की आशंका के कारण ऐसे बयान महिलाओं की स्वायत्तता, लैंगिक समानता और जनसंख्या स्थिरीकरण की उपलब्धियों को कमजोर कर सकते हैं।
यहां एक और तथ्य समझना जरूरी है। भारत में कुल प्रजनन दर घट चुकी है। सरकार के अनुसार, एनएफएचएफ-५ यानी २०१९–२१ के आंकड़ों में भारत की कुल प्रजनन दर २.० है, जो २.१ के प्रतिस्थापन स्तर के आसपास है। पीआरएस के अनुसार २.१ की प्रजनन दर को वह स्तर माना जाता है, जहां जनसंख्या स्थिरता की दिशा बनती है। यूएनएफपीए के २०२५ के आंकड़ों में भारत की प्रजनन दर १.९ बताई गई है, लेकिन भारत अभी भी लगभग १.४६ अरब आबादी के साथ दुनिया का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश है। यानी समस्या केवल ‘बच्चे ज्यादा पैदा हो रहे हैं’ भर नहीं है। समस्या यह भी है कि पहले से मौजूद विशाल आबादी के लिए संसाधन, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और शहरी ढांचा पर्याप्त नहीं है। उत्तर भारत के कुछ राज्यों में जनसंख्या दबाव अब भी अधिक है, जबकि दक्षिण और शहरी भारत में वृद्ध होती आबादी और घटती जन्मदर की चिंता है। इसलिए भारत को न तो अंधा जनसंख्या-वृद्धि अभियान चाहिए और न ही जबरन नियंत्रण की नीति। देश को चाहिए क्षेत्रवार संतुलित, वैज्ञानिक और मानवीय जनसंख्या नीति।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि अधिक बच्चे पैदा करने की अपीलों का बोझ अंतत: महिलाओं पर पड़ता है। बच्चे पैदा करना कोई राजनीतिक आदेश नहीं हो सकता। यह परिवार, महिला के स्वास्थ्य, आर्थिक स्थिति, शिक्षा, रोजगार और भविष्य की योजना से जुड़ा निर्णय है। जब नेता मंच से ‘तीन’, ‘चार’ या ‘दो दर्जन’ जैसे नारे देते हैं, तो वे महिला को नागरिक नहीं, जनसंख्या बढ़ाने का साधन मानने लगते हैं।
भारत को आज भावनात्मक नारे नहीं, व्यावहारिक नीति चाहिए। परिवार नियोजन को धार्मिक या सांप्रदायिक मुद्दा बनाने के बजाय इसे स्वास्थ्य, शिक्षा, महिला अधिकार, पोषण, रोजगार और संसाधन-संतुलन से जोड़ना होगा। जिन राज्यों में प्रजनन दर अधिक है, वहां लड़कियों की शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, गर्भनिरोधक सुविधाएं और रोजगार अवसर बढ़ाने होंगे। जिन क्षेत्रों में जन्मदर बहुत कम हो रही है, वहां बुजुर्ग आबादी, कार्यबल और सामाजिक सुरक्षा की दीर्घकालिक योजना बनानी होगी।
राजनीतिक बचकानापन
चीन जैसा देश, जो कभी विश्व की सबसे बड़ी आबादी वाला देश था, उसने भी जनसंख्या के दबाव को समझते हुए कठोर नीतियों के माध्यम से अपनी जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण किया। इसके उलट भारत आज दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश बन चुका है और इसके दुष्परिणाम आम नागरिक रोज भुगत रहा है। खेती की जमीन लगातार आवासीय और व्यावसायिक क्षेत्रों में बदल रही है, गांवों का स्वरूप बदल रहा है और शहरों की सीमा बेतरतीब पैâलती जा रही है। जमीन सीमित है, पानी सीमित है, रोजगार सीमित हैं, लेकिन आबादी लगातार बढ़ने से संसाधनों पर संघर्ष बढ़ रहा है। यही दबाव आगे चलकर अपराध, तनाव, अवैध बस्तियों, पर्यावरण विनाश और सामाजिक असंतुलन को जन्म देता है। महंगाई और सामाजिक तनाव का कारण बनता है। ऐसे समय में जिम्मेदार नेताओं से अपेक्षा होती है कि वे परिवार नियोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य और संसाधन-संतुलन पर गंभीर बात करें; लेकिन जब वे अधिक बच्चे पैदा करने जैसे बयान देते हैं, तो यह देश की वास्तविक समस्याओं से आंख मूंदने जैसा है।
जनसंख्या राष्ट्र की शक्ति भी हो सकती है और बोझ भी। युवा आबादी तभी संपत्ति है, जब वह शिक्षित, स्वस्थ, कुशल और रोजगारयुक्त हो। इसलिए जनसंख्या पर नेताओं के गैर-जिम्मेदार बयान लोकतंत्र की गंभीरता को कम करते हैं। बच्चे ईश्वर की कृपा हो सकते हैं, लेकिन उनके भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और भविष्य की जिम्मेदारी समाज और सरकार की होती है। सवाल यह नहीं है कि किस समुदाय के कितने बच्चे हैं; असली सवाल यह है कि भारत अपने हर बच्चे को वैâसा जीवन दे पा रहा है। जब तक इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिलता, तब तक ‘ज्यादा बच्चे पैदा करो’ जैसे बयान देशहित नहीं, राजनीतिक बचकानापन ही माने जाएंगे।
