पागल हो क्या?
मम्मी, मुझको भूख नहीं है — कहता मैं चिल्ला कर,
फिर भी थाली परोस देती हो तुम भर कर,
पागल हो क्या?
कहता हूँ मैं, पर्चा नहीं गया है अच्छा, जाने क्या होगा,
सर पर हाथ फेर कर कहती हो — “सब अच्छा होगा”,
पागल हो क्या?
मैं कहता हूँ, मुझको पढ़ना है देर रात तक, तुम जाओ,
जागी रहती हो तुम, जाने क्यों आवाज लगाती — “अब सो जाओ”,
पागल हो क्या?
सारी पूजा-पाठ बस मेरे लिए ही करती हो,
हफ्ते में दो-तीन व्रत-उपवास भी रखती हो,
पागल हो क्या?
करो काम तुम कोई भी, पर नज़र मुझ पर ही रखती हो,
सिवा नाम के, जाने क्या-क्या कहकर पुकारा करती हो,
पागल हो क्या?
तुमको न मिलता है कुछ भी, पर ध्यान सभी का रखती हो,
मेरी हर पसंद को कैसे भी कर के पूरा करती हो ।
पागल हो क्या?
शायद हाँ…
अगर ये पागलपन है,
तो दुनिया की हर माँ पागल ही होती है —
जो खुद को भूलकर,
अपने बच्चों में ही पूरी दुनिया ढूँढ लेती है।
प्रज्ञा पांडेय मनु
