समझें मां के घाव

काश दिखावे छोड़कर समझें मां के घाव,
जीते जी ही दे सकें उसको अपना ठांव॥
मातृत्व दिवस पर करें मां का खूब बखान,
लेकिन सूने घर पड़े रोता उसका मान।
पूछे उसकी सिसकियां, उजड़ा उसका गांव
जीते जी ही दे सकें उसको अपना ठांव॥
मां की सूनी आंख में छुपे कई जज्बात,
होठों पर खामोशियां, भीतर लाखों बात।
वृद्धाश्रम के द्वार पर क्यों कांपें वे पांव
जीते जी ही दे सकें, उसको अपना ठांव॥
बूढ़े कांपें हाथ जब, थक जाएं हालात,
तब मत देना सिर्फ तुम बस झूठी सौगात।
जीवनभर जो बन रही सिर पर शीतल छांव
जीते जी ही दे सकें उसको अपना ठांव॥
मंदिर जाकर क्या मिला, क्या पाया भगवान,
यदि घर में ही रो रही ममता की पहचान।
मां के चरणों से बड़ी नहीं कहीं भी छांव
जीते जी ही दे सकें उसको अपना ठांव॥
-डॉ. प्रियंका सौरभ

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