रोहित माहेश्वरी, लखनऊ
उत्तर प्रदेश में बच्चों के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों को लेकर आई हालिया एनसीआरबी रिपोर्ट सिर्फ आंकड़ों का पुलिंदा नहीं, बल्कि समाज और सरकार दोनों के लिए गंभीर चेतावनी है। रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश में पॉक्सो एक्ट के ९७.५ प्रतिशत मामलों में आरोपी बच्चे के परिचित, रिश्तेदार या करीबी निकले यानी खतरा अब बाहर की अंधेरी गलियों से कम और घर, मोहल्ले तथा रिश्तों के भीतर ज्यादा छिपा बैठा है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि ‘बेटी बचाओ’ और ‘महिला सुरक्षा’ के बड़े-बड़े नारों के बावजूद उत्तर प्रदेश में बच्चों की सुरक्षा आखिर लगातार कमजोर क्यों होती जा रही है? भाजपा सरकार हर मंच से कानून-व्यवस्था को बेहतर बताती है, लेकिन जमीनी हकीकत अलग तस्वीर पेश करती है। वाराणसी से लेकर उन्नाव और कई अन्य मामलों ने पहले भी दिखाया है कि सत्ता के दावों और पीड़ितों की वास्तविक स्थिति में बड़ा अंतर है। दरअसल, समस्या केवल अपराधियों की नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक ढांचे की भी है जो अक्सर अपराध होने के बाद सक्रिय दिखता है। स्कूलों में जागरूकता अभियान सीमित हैं, पुलिस की संवेदनशीलता पर लगातार सवाल उठते हैं और फास्ट ट्रैक अदालतों में मामलों का लंबा इंतजार पीड़ित परिवारों का मनोबल तोड़ देता है। भाजपा सरकार ने सुरक्षा को राजनीतिक प्रचार का सबसे बड़ा हथियार बनाया, लेकिन बच्चों के खिलाफ अपराधों के आंकड़े उसी दावे की पोल खोल रहे हैं। चिंता की बात यह भी है कि अधिकांश मामलों में आरोपी कोई अजनबी नहीं, बल्कि भरोसेमंद चेहरा होता है। यह सामाजिक विफलता है, लेकिन सरकार इससे पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकती। जब शासन भयमुक्त समाज का दावा करे और उसी दौर में बच्चों के खिलाफ अपराध लगातार बढ़ते दिखें, तो जवाबदेही तय होना जरूरी है। आज जरूरत केवल सख्त कानूनों की नहीं, बल्कि संवेदनशील प्रशासन, तेज न्याय व्यवस्था और सामाजिक जागरूकता की है। अगर सरकारें सिर्फ प्रचार में व्यस्त रहेंगी और जमीनी सुरक्षा कमजोर रहेगी, तो ‘सुरक्षित उत्तर प्रदेश’ का दावा केवल राजनीतिक नारा बनकर रह जाएगा।
अखिलेश के तंज में छिपा राजनीतिक संदेश
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने मंत्रिमंडल विस्तार की चर्चाओं के बीच भाजपा सरकार पर तीखा तंज कसते हुए कहा कि ‘उधर से पर्ची आएगी, यहां सिर्फ पढ़ी जाएगी।’ उन्होंने मुख्यमंत्री की भूमिका पर कटाक्ष करते हुए कहा कि भाजपा राज में सीएम अब सिर्फ ‘संदेश वाहक’ बनकर रह गए हैं। फिल्म देखने और ‘कर्मफल’ समझने वाले बयान को राजनीतिक व्यंग्य के रूप में देखा जा रहा है। अखिलेश यादव का यह बयान केवल हमला नहीं, बल्कि सत्ता के केंद्रीकरण पर सवाल भी है। भाजपा सरकार पर लंबे समय से पैâसलों में स्वतंत्रता की कमी के आरोप लगते रहे हैं। लोकतंत्र में मजबूत नेतृत्व वही माना जाता है, जो जनता के प्रति जवाबदेह हो, न कि केवल आदेशों का पालन करने वाला। जनता अब राजनीतिक संवाद में कटाक्ष नहीं, बल्कि जमीनी बदलाव देखना चाहती है।
क्या असंतोष बनेगा योगी की हार का कारण?
उ त्तर प्रदेश में भाजपा के भीतर बढ़ता असंतोष अब खुलकर सामने आने लगा है। योगी सरकार के संभावित मंत्रिमंडल विस्तार से पहले कई नेताओं और विधायकों की नाराजगी ने पार्टी की अंदरूनी स्थिति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। महमूदाबाद की विधायक आशा मौर्य ने सोशल मीडिया पर अपनी उपेक्षा का दर्द जाहिर करते हुए लिखा कि पार्टी अब समर्पित कार्यकर्ताओं के बजाय बाहर से आए नेताओं को ज्यादा महत्व दे रही है। यह बयान भाजपा के संगठनात्मक ढांचे पर सीधा सवाल माना जा रहा है। इसी बीच पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह की पोस्ट ने भी राजनीतिक हलचल बढ़ा दी। उन्होंने लिखा- ‘शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है, जिस शाख पर बैठे हो वह टूट भी सकती है।’ माना जा रहा है कि अपने बेटे प्रतीक भूषण सिंह को मंत्रिमंडल में जगह न मिलने से वे नाराज हैं। राजनीतिक जानकार इसे योगी सरकार के प्रति असंतोष का संकेत मान रहे हैं। योगी आदित्यनाथ की छवि मजबूत नेता की रही है, लेकिन चुनाव केवल प्रशासनिक सख्ती से नहीं जीते जाते। कार्यकर्ताओं और नेताओं का विश्वास भी उतना ही जरूरी होता है। यदि भाजपा समय रहते इस नाराजगी को नहीं संभालती, तो यही असंतोष २०२७ में योगी सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है।
