मुख्यपृष्ठस्तंभबेबाक : सोमनाथ और सामाजिक मंथन... अमृत महोत्सव के ज्वलंत प्रश्न

बेबाक : सोमनाथ और सामाजिक मंथन… अमृत महोत्सव के ज्वलंत प्रश्न

अनिल तिवारी, मुंबई

सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण और पुनर्प्रतिष्ठा के ७५ वर्ष पूरे होना भारतीय समाज के लिए गौरव का विषय है। सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि इतिहास के उन घावों के बाद भी खड़े रहने वाली भारतीय चेतना का प्रतीक है, जिसमें आक्रमण, लूट, विध्वंस और धार्मिक अस्मिता पर प्रहार शामिल रहे। इतिहास में महमूद गजनवी द्वारा सोमनाथ पर आक्रमण आज भी भारतीय मानस में पीड़ा और प्रतिरोध दोनों के रूप में मौजूद हैं।
हमने इतिहास का दंश झेला है, अपने पवित्र स्थलों की वेदना देखी है, इसलिए मंदिरों का पुनर्निर्माण और उनका महोत्सव स्वाभाविक रूप से समाज के लिए गर्व का अवसर है। लेकिन इसी क्षण एक बड़ा प्रश्न भी हमारे सामने खड़ा होता है, क्या मंदिरों के शिखर ऊंचे होने के साथ समाज का चरित्र भी उतना ही ऊंचा उठ रहा है?
सामाजिक, नैतिक संकट
आज धर्म के नाम पर, आस्था के नाम पर और धार्मिक प्रतिष्ठा की आड़ में भी अपराध होते दिख रहे हैं। यह समस्या किसी एक धर्म, पंथ या समुदाय तक सीमित नहीं है। चाहे हिंदू हों, मुसलमान हों, ईसाई हों या कोई अन्य धार्मिक समाज, हर जगह पाखंड, कट्टरता, शोषण और अपराध के उदाहरण मिलते हैं। इसलिए इस प्रश्न को सांप्रदायिक चश्मे से नहीं, सामाजिक और नैतिक संकट के रूप में देखना होगा। आसाराम बापू का मामला हो, गुरमीत राम रहीम की बात हो, नित्यानंद के दुष्कर्मों का इतिहास हो या फिर चिन्मयानंद-नारायण सार्इं के मामले हों, जब धर्मगुरु जवाबदेही से ऊपर समझे जाने लगते हैं, तब आस्था शोषण का साधन भी बन सकती है। धार्मिक अंधविश्वास का एक भयावह उदाहरण असम के कामाख्या मंदिर के पास मानव बलि के आरोपों में भी सामने आया था। इसी प्रकार चर्चों, प्रार्थना सभाओं, आश्रमों, मदरसों, मठों और धार्मिक संस्थानों से जुड़े विवाद समय-समय पर सामने आते रहे हैं। कहीं यौन शोषण, कहीं जबरन धर्मांतरण के आरोप, कहीं कट्टरता, कहीं अंधविश्वास, ये सब बताते हैं कि धर्म का असली संकट बाहर से कम, भीतर के पाखंड से अधिक है।
धार्मिक उत्सव की सार्थकता!
देश में छोटी-छोटी बच्चियों के साथ दुष्कर्म, अपहरण और हत्या की घटनाएं समाज की आत्मा को झकझोर रही हैं। गाजियाबाद, जम्मू, दिल्ली, दरभंगा, लखीमपुर खीरी, कानपुर, आगरा और लखनऊ जैसी जगहों से आने वाली खबरें बताती हैं कि बच्चियां घर, गली, मंदिर, स्कूल, ट्रेन, मेले या परिचितों के बीच भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं रहीं। ये घटनाएं केवल अपराध की खबरें नहीं हैं, बल्कि सभ्यता के पतन की चेतावनी हैं। जो बताती हैं कि अपराधियों के मन से कानून का भय कम होता जा रहा है। किसी भी लोकतांत्रिक सरकार की पहली जिम्मेदारी नागरिकों को सुरक्षित वातावरण देना है। सरकार केवल धार्मिक आयोजनों, सांस्कृतिक प्रतीकों और भावनात्मक अवसरों का राजनीतिक लाभ उठाने तक सीमित नहीं रह सकती। यदि समाज में बच्चियां असुरक्षित हैं, महिलाएं भय में हैं, गरीब महंगाई से टूट रहा है, युवा रोजगार के लिए भटक रहा है और अपराधियों के मन से कानून का भय कम हो रहा है, तो सरकार की नैतिक जवाबदेही सीधे-सीधे तय होती है। ध्रुवीकरण की राजनीति कुछ समय के लिए वोटों का गणित बना सकती है, लेकिन वह समाज की वास्तविक समस्याओं का समाधान नहीं कर सकती। केवल भाषण, उत्सव और प्रतीक समाज को सुरक्षित नहीं बना सकते। मंदिरों का संरक्षण, पुनर्निर्माण और महोत्सव आवश्यक हैं, क्योंकि वे संस्कृति और स्मृति के केंद्र हैं। लेकिन राज्य और समाज की पहली कसौटी नागरिक सुरक्षा है। धार्मिक उत्सव तभी सार्थक हैं, जब उनके साथ बाल सुरक्षा, महिला सुरक्षा, त्वरित न्याय, पुलिस जवाबदेही, अपराध रोकथाम, महंगाई नियंत्रण, रोजगार और सामाजिक समरसता पर ठोस काम हो। केवल शिखर, स्मारक और समारोह समाज को सुरक्षित नहीं बनाते; सुरक्षित समाज बनता है संवेदनशील प्रशासन, सजग नागरिक और निष्पक्ष कानून से।
सामाजिक पुनर्निर्माण की जरूरत
सोमनाथ का असली संदेश केवल मंदिर का पुनर्निर्माण नहीं, समाज के चरित्र का पुनर्निर्माण भी है। यदि मंदिरों में दीप जल रहे हों और बच्चियां भय में जी रही हों, यदि महोत्सवों में जयघोष हो रहा हो और गरीब की रसोई महंगाई से बुझ रही हो, यदि आस्था की रक्षा हो रही हो पर मानवता असुरक्षित हो, तो यह अमृत महोत्सव अधूरा है। अब समय है कि समाज जागे और सरकारें भी समझें कि सच्चा धर्म वही है, जिसमें सबसे कमजोर, सबसे मासूम और सबसे असहाय नागरिक सुरक्षित हो। सोमनाथ जैसे महोत्सवों का सच्चा संदेश केवल अतीत के गौरव का स्मरण नहीं, वर्तमान की जिम्मेदारी का निर्वाह भी है। यदि सरकार सचमुच सांस्कृतिक पुनर्जागरण की बात करती है, तो उसे सामाजिक पुनर्निर्माण का भी नेतृत्व करना होगा। सुरक्षित बच्चियां, निर्भय महिलाएं, सस्ती रसोई, सम्मानजनक रोजगार, निष्पक्ष कानून और समरस समाज, यही किसी भी राष्ट्र का वास्तविक अमृत महोत्सव है।

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