मुख्यपृष्ठस्तंभप्यास लगने पर कुआं नहीं खोदा जाता

प्यास लगने पर कुआं नहीं खोदा जाता

अनिल तिवारी

देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से अपील की है कि वे एक वर्ष तक सोना न खरीदें, पेट्रोल-डीजल का कम से कम उपयोग करें, वर्क फ्रॉम होम अपनाएं, डिजिटल बैठकों को प्राथमिकता दें आदि। पहली दृष्टि में इस अपील में कुछ भी अनुचित नहीं लगता। सोने की अनियंत्रित खरीद पर संयम और ईंधन के सीमित उपयोग की प्रेरणा, देश की अहम आवश्यकताएं हैं। परंतु जब ऐसी अपीलें केवल संकट अथवा संक्रमण काल में की जाती हैं और किसी दीर्घकालीन नीति का हिस्सा नहीं होतीं, तब वे सरकारी अपरिपक्वता का प्रमाण भी प्रस्तुत करती हैं।
केंद्र सरकार को ऐसी किसी भी अपील से पहले यह समझना आवश्यक है कि प्यास लगने पर कुआं नहीं खोदा जाता; प्यास लगने से पहले ही पानी का प्रबंध करना पड़ता है, अन्यथा अनर्थ निश्चित हो जाता है।
ठोस रोड मैप क्यों नहीं
आज देश के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि पिछले १२ वर्षों में मोदी सरकार ने ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए किसी ठोस रोडमैप के तहत आधारभूत ढांचा तैयार करने की दिशा में पर्याप्त काम क्यों नहीं किया? यदि ईंधन संकट, विदेशी मुद्रा दबाव, सोने के आयात और वैश्विक अस्थिरता जैसी चुनौतियों की आशंका थी, तो उनके विकल्प पहले से क्यों नहीं तैयार किए गए? जिस तरह ईरान ने अमेरिका-इजराइल के खतरे को ध्यान में रखकर स्वयं को पहले से तैयार रखा, उसी तरह भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए दीर्घकालीन तैयारी क्यों नहीं की? आज देश को यह बताना कि हमारे यहां तेल के पर्याप्त कुएं नहीं हैं, कोई नई जानकारी नहीं है। यह तथ्य पहले भी विदित था। तब ऐसी परिस्थिति उत्पन्न होने की स्थिति में क्या किया जाना चाहिए, यह पहले से तय क्यों नहीं किया गया? अचानक इस तरह की अपील करके क्या सरकार फिर किसी विशेष वर्ग को संकट में नहीं डाल रही है? क्या इससे सोने, आभूषण, परिवहन, ईंधन, पर्यटन, आयोजन और छोटे व्यापार से जुड़े लाखों लोगों की आजीविका पर संकट नहीं खड़ा होगा? जिस तरह अचानक नोटबंदी ने देश में अव्यवस्था और असुरक्षा की स्थिति पैदा कर दी थी, क्या आज सीमित स्तर पर ही सही, वैसा ही इतिहास दोहराने का जोखिम नहीं उठाया जा रहा?
आम नागरिक पर बोझ
जनता की बेहतरी के लिए प्रधानमंत्री को दिशा-निर्देश अवश्य देने चाहिए। आवश्यकता पड़ने पर जनभागीदारी के लिए अपील भी करनी चाहिए। लेकिन ऐसी अपीलों और निर्देशों का स्वरूप ऐसा होना चाहिए कि किसी वर्ग के सामने जीवन-यापन का प्रश्न न खड़ा हो। समाज का कोई वर्ग बेरोजगारी, बेकारी या आर्थिक असुरक्षा की ओर न धकेल दिया जाए। प्रधानमंत्री को अपने हर शब्द के अर्थ, प्रभाव और संभावित परिणाम का मूल्यांकन करके ही उसका प्रयोग करना चाहिए। नोटबंदी के दौरान जो हुआ, वैसी स्थिति दोबारा उत्पन्न न हो, इसका विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए। देश ने नोटबंदी हो या कोरोना काल, राष्ट्रहित में बड़े त्याग किए हैं। जनता ने तंगी भी झेली है और घरों में कैद रहकर भी व्यवस्था का साथ दिया है। इसलिए जनता से संयम की अपील करने से पहले सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उसका बोझ केवल आम नागरिक, छोटे व्यापारी, कारीगर और श्रमिक वर्ग पर न पड़े। वर्क फ्रॉम होम, डिजिटल मीटिंग्स और ईंधन बचत केवल किसी निश्चित कालखंड की आवश्यकता नहीं हैं। आज अनियंत्रित शहरीकरण, बढ़ती जनसंख्या, यातायात दबाव और प्रदूषण के दौर में ये साल के ३६५ दिनों की दैनिक जरूरत बन चुके हैं। सरकार को वर्क फ्रॉम होम के साथ-साथ फ्लेक्सिबल ऑफिस टाइमिंग, सार्वजनिक छुट्टियों के पुनर्निर्धारण और स्वेच्छा से छुट्टी चयन जैसे उपायों पर भी गंभीरता से विचार करना चाहिए। इससे सड़कों पर यातायात का दबाव घटेगा, ईंधन की भारी बचत होगी, प्रदूषण कम होगा और कामकाज की गति भी बढ़ेगी। इसके अतिरिक्त सरकार को केवल अपीलों पर निर्भर रहने के बजाय दीर्घकालीन नीतिगत उपाय करने चाहिए। सार्वजनिक परिवहन को अधिक सक्षम, सुलभ और भरोसेमंद बनाया जाए। इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने के साथ उनके चार्जिंग नेटवर्क का तेजी से विस्तार हो। कार्यालयों, सरकारी विभागों और निजी कंपनियों में डिजिटल बैठकों को स्थायी प्रशासनिक संस्कृति का हिस्सा बनाया जाए। सोने के आयात पर निर्भरता घटाने के लिए पुराने सोने की रीसाइक्लिंग, गोल्ड मॉनेटाइजेशन और वैकल्पिक निवेश साधनों को सरल और भरोसेमंद बनाया जाए। छोटे जौहरियों, स्वर्णकारों और कारीगरों के लिए सुरक्षा कवच भी तैयार किया जाए, ताकि किसी भी नीति या अपील का सीधा आघात उनकी रोजी-रोटी पर न पड़े।
लाचारगी क्यों?
आज देश के सामने स्थिति गंभीर है। यह और विकट न हो, इसके लिए सरकार, विपक्ष, उद्योग जगत और जनता, सभी को मिलकर प्रयास करना चाहिए। पिछली सरकारें जब ऐसी विकट परिस्थितियों में फंसती थीं, तब मोदी और भारतीय जनता पार्टी उसका राजनीतिक लाभ लेने से नहीं चूकते थे। अब उस कुप्रथा को बदलने की आवश्यकता है। राष्ट्रीय संकटों को राजनीतिक अवसर नहीं, नीति-सुधार का अवसर माना जाना चाहिए। यदि अतीत में देश में पक्ष और विपक्ष ने साथ मिलकर दीर्घकालीन ऊर्जा नीति, आयात-नियंत्रण नीति, सार्वजनिक परिवहन नीति और शहरी कार्य-संस्कृति पर गंभीरता से काम किया होता, तो वैश्विक संकट के इस दौर में हमें इतनी लाचार स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता। आम गरीब जनता पर महंगाई का अनचाहा बोझ भी कम पड़ता।
आज तेल के कुओं की बात करने वाले नरेंद्र मोदी यदि पिछले १२ वर्षों में समुचित विकल्प, ठोस योजनाएं और टिकाऊ नीतियां तैयार कर देते, तो देश के सामने न र्इंधन के खाली कुएं भरने की लाचारी होती और न महंगाई की खाई पाटने की चुनौती इतनी भयावह रूप में खड़ी होती। राष्ट्रहित में जनता से संयम मांगना गलत नहीं है, लेकिन उससे पहले सरकार का कर्तव्य है कि वह दूरदृष्टि, तैयारी और संवेदनशीलता का प्रमाण दे। संकट आने पर अपील करना आसान है; संकट आने से पहले व्यवस्था बनाना ही असली शासन-कौशल है।
(कल पढ़े- इस संदर्भ में व्यवस्था सुधार और शहरी विकास का क्या होना चाहिए रोडमैप?)

अन्य समाचार