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कविता: यह किसका लहू है!

भीड़ कैसे बन गई कातिल,
इंसाफ कैसे बन गया जल्लाद?
आंखों में नफरत का अंगारा,
हाथों में पत्थर, लब पे फरियाद।
कौन था वो, नाम क्या था?
मां का लाल, किसी का प्यारा।
बेकसूर था या खतावार,
पैâसला भीड़ ने सुना डाला।
न अदालत, न गवाही, न दलील,
बस शक का एक अंधेरा था।
इंसानियत को रौंदते कदम,
और खून से तर सवेरा था।
सुनो साजिद की भी ये फरियाद,
मजलूम की चीखों का हिसाब।
कलम से लिखता हूं ये पैगाम,
इंसानियत से बड़ा न कोई नाम।
उठो कि ये दाग मिटाना है,
मोहब्बत का चराग जलाना है।
भीड़ नहीं, हम इंसान बनें,
हर जान की कीमत पहचानना है।

साजिद महमूद शेख, मीरा रोड

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