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ईरान समुद्र में बहा रहा है रोजाना 2800 करोड का तेल, ईरान-अमेरिका युद्ध में तेल की बर्बादी

प्रमोद भार्गव

अमेरिका-ईरान के बीच जंग के मैदान बने समुद्र में तेल अब रणनीतिक हथियार बन गया है। अमेरिकी नाकाबंदी के चलते एक महीने के भीतर ईरान के 58 तेल टैंकर होर्मुज जलडमरूमध्य पार नहीं कर पाए। इस कारण प्रतिदिन 30 लाख बैरल से ज्यादा कच्चा तेल समुद्र में बहाया जा रहा है। हर दिन नष्ट किए जा रहे इस तेल की कीमत करीब 2800 करोड रुपये आंकी गई है।

ईरान को ऐसा इसलिए करना पड रहा है, क्योंकि उसकी तीन करोड बैरल तेल भंडारण क्षमता पूरी हो चुकी है। ईरान के पास 3500 ऐसे तेल कुएं हैं, जिनसे लगातार उत्पादन जारी रखना जरूरी है। यदि तेल निकालना बंद कर दिया जाए तो इन कुओं से हमेशा के लिए उत्पादन रुक सकता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ड्रिलिंग बंद होने पर कुओं में डाली गई पाइपलाइनों में पानी और गैस भर जाती है। इन्हीं पाइपों से कच्चा तेल रिस-रिसकर बाहर आता है। तेल वाली चट्टानों के छिद्रों में वैक्स की परत जमने से तेल का प्रवाह बंद हो जाता है।

ईरान अपने कच्चे तेल का 90 प्रतिशत निर्यात खार्ग द्वीप से करता है। यहीं उसके सबसे बडे तेल भंडार स्थित हैं। तेल की यह बर्बादी पश्चिम एशिया के देशों के लिए ऊर्जा संकट तो पैदा कर ही रही है, साथ ही समुद्री पर्यावरण को भी तेजी से नुकसान पहुंचा रही है। इसी कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी देशवासियों से पेट्रोल, डीजल और गैस जैसे पेट्रोलियम उत्पादों का कम उपयोग करने की अपील करनी पडी है।

यूरोपियन स्पेस एजेंसी के सेंटीनल सैटेलाइट डेटा और अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, फारस की खाडी और होर्मुज स्ट्रेट के आसपास समुद्र की सतह पर तेल की मोटी परतें देखी गई हैं। ये परतें कुवैत के लावन द्वीप, केशम द्वीप और खार्ग द्वीप के आसपास काले धब्बों के रूप में दिखाई दी हैं। इनमें से एक धब्बा लगभग 120 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ बताया गया है। विशेषज्ञों के अनुसार समुद्र की सतह पर तैरता तेल लहरों को शांत कर देता है, जिससे रडार तस्वीरों में काले और चिकने धब्बे दिखाई देते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समुद्र में लगातार तेल बहाया जाता रहा तो समुद्री जीवन और पर्यावरण को भारी नुकसान होगा। फारस की खाडी में मछुआरे, कोरल रीफ और अनेक समुद्री जीवों की आजीविका इस समुद्री तंत्र पर निर्भर है। तेल का रिसाव मछलियों के लिए जहर साबित होता है, समुद्री पक्षियों को नुकसान पहुंचाता है और संवेदनशील समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को तबाह कर देता है। इससे समुद्र में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है और अनेक जीव दम घुटने से मर जाते हैं।

अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच चल रहा संघर्ष अब समुद्री पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है। इससे पहले भी होर्मुज क्षेत्र में पेट्रोलियम पदार्थों से भरे करीब 20 जहाज नष्ट किए जा चुके हैं। अनुमान है कि इन जहाजों में तीन लाख मीट्रिक टन एलपीजी भरी हुई थी। एक बडे गैस टैंकर से लगभग 31 से 32 लाख घरेलू गैस सिलेंडर भरे जा सकते हैं।

पेट्रोलियम पदार्थ जब मिट्टी, पानी और हवा में फैलते हैं तो वे मानव जीवन के लिए वरदान के बजाय अभिशाप बन जाते हैं। दुनिया के कई समुद्री तट पहले ही तेल रिसाव और औद्योगिक कचरे से गंभीर पर्यावरणीय संकट झेल रहे हैं। जापान, रूस, अलास्का, मुंबई हाई और बंगाल की खाडी जैसी कई घटनाएं यह साबित कर चुकी हैं कि तेल का रिसाव समुद्री पारिस्थितिकी को दशकों तक नुकसान पहुंचाता है।

विशेषज्ञों के अनुसार समुद्र की सतह पर तेल की मोटी परत बनने से सूर्य की रोशनी और ऑक्सीजन पानी के भीतर नहीं पहुंच पाती। इससे समुद्री जीवों का जीवन चक्र प्रभावित होता है। पक्षियों के पंखों और समुद्री स्तनधारियों के शरीर पर तेल जमने से उनकी ताप नियंत्रित करने की क्षमता खत्म हो जाती है।

जानकार चेतावनी दे रहे हैं कि मध्य एशिया में जलता और बहता तेल वैश्विक जलवायु संकट को और गंभीर बना सकता है। इससे समुद्र का तापमान बढेगा, मौसम चक्र बिगडेगा और भविष्य में अतिवृष्टि, सूखा, बाढ तथा धूल भरे तूफानों जैसी आपदाएं और तेज हो सकती हैं।

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